बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१७ पंचाशच्च शतं पूर्वयुताः मृतसुता स्मृता । पुत्राणां तु कलांशे तु शेषे जाता मृता द्विज ॥७९॥ ३।४।७।९।१३।१४।२०।२६।२४।२।५०।१०० इनमें पूर्व अंकों को जोड़ने से जो संख्या हो तत्तुल्य अंश में सूर्य हों मृतसुता उत्पन्न होती है। उक्तांश से शेष अंशों में सूर्य हों तो उत्पन्न पुत्रों में मृत पुत्र भी होंगे॥७८-७९॥ अथ संन्यासयोगः- द्वादशे च चतुर्विंशे चतुस्त्रिंशे सुरांशके । द्विसप्तांशे नवांशे षष्ठयुत्तरशतांशके ॥८०॥ यदि १२।२४।३३।७२।९।१६० ॥८०॥ षट्शते च सहस्रे च खखाहीन्द्वंशके पुनः । खांशातिथ्यंशके जातो भवेत्प्रव्रजितो नरः ॥८१॥ ६००।१०००।१८०।१५।१० संख्यक अंश में जन्म हो तो सन्यासी होता है॥८१॥ परमहंसादियोगाः- गुरुशुक्रोदये राशौ तयोः परमहंसकः । शत्रुराशिगतौ तौ चेदप्रकाशयुतौ तु वा ॥८२॥ गुरु शुक्र के उदय की राशि में जन्म हो तो परमहंस होता है। यदि वे शत्रुराशि में हों अथवा धूमादि अप्रकाश ग्रह से युक्त हों तो॥८२॥ भ्रष्टः स्यात्तु तथा ज्ञेतु त्रिदंडी वा वहूदकः। रवौ जटाधरः शैवः कुजे नग्नोऽटनः स्मृतः॥८३॥ भ्रष्ट परमहंस होता है। ऐसे ही बुध हो तो त्रिदंडी सन्यासी होता है वा वहूदक- होता है। सूर्य हो तो शिवभक्त, भौम हो तो नग्न घूमने वाला॥८३॥ मंदे बौद्धोऽथ वाग्मी स्याद्राहौ केतौ तथैव च । धूमे कापालिकाश्चापे काले तु परिवेषके ॥८४॥ गूढ़पापो यथा लिंगी कुलमार्गतस्तथा । शनि हो तो बौद्ध धर्मावलम्बी, राहु वा केतु जन्मराशि में हों तो बौद्ध सन्यासी, धूमग्रह हो तो कापालिक, चाप, काल, परिवेष हो तो गुप्तपापी, पाखंडी, कुलमार्गानुकूल चलने वाला होता है॥८४॥