बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । प्रव्रज्यायांनिष्टायोगः- षष्ठ्यंशे ऋक्षसन्ध्यंशे सार्पे पौष्णेन्द्रभांशके ।।८५।। षष्ठ्यंश में, नक्षत्र संध्यंश में, आश्लेषा, रेवती, ज्येष्ठा के अंश में।।८५।। त्रिंशांशे कालहोरांशे तत्तदंशांशेऽपि च । नवमूर्च्छासुरांशे तु यथा षष्ठितमे युतः ।।८६।। त्रिंशांश में, कालहोरांश में, नवांश में, मूर्ना ४९ अंश में ३३वें अंश, ६०वें अंश ।।८६।। शतांशेखाब्धितिथ्यंशे द्वादशांशे नवांशके । राश्यंतांशे तु सप्तांशे ऋक्षसंधिमृगांतिके ।।८७।। १०० वें अंश में, १५४० वें अंश में, द्वादशांश में, राशि के अतिमांश में, सप्तांश में नक्षत्र संधि में।।८७।। मृगकर्कालिसिंहादिर्मीनतौल्यंशकादिमे । अंत्यांशेऽपि च जातस्य षष्ठ्यर्थाक्षिजिनैरदे ।।८८।। मकर, कर्क, वृश्चिक, सिंह, मेष, मीन, तुला के आदि या अंतिम अंश में उत्पन्न होने वाले, ६, ५, २, २४, ३२ अंशों में।।८८।। द्रेष्काणेचार्द्धहोरायां त्रिसप्ते च नखेषु तु । जातः प्रव्रजितश्चैषु सर्वत्रैकयुतेष्वपि ।।८९।। द्रेष्काण में अर्द्धहोरा में ७३, २० वें अंश में वा पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने से जो अंक हो उन अंशों में उन अंकों में उत्पन्न होनेवाले सन्यास धर्म में श्रद्धा रखनेवाले होते हैं।।८९।। अथ अंशविशेषजातायांस्त्रीलक्षणम् - पापाप्रकाशसंयोगे कलत्रेत्वशुभं भवेत् । रवौवंध्या तु शीतांशौ क्षीणे तु व्यभिचारिणी ।।९०।। सातवें भाव में पापग्रह हो अथवा अप्रकाशग्रह हो तों स्त्रीदुष्टा हो, सूर्य हो तो बंध्या, क्षीणचन्द्र हो तो व्यभिचारिणी।।९०।। कुजे तु प्रियते मन्दे दुर्भगा राहुसंयुते । परदाररतिः स्वीयनिषेकाभावतोऽसुताः ।।९१।।