भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ मासचर्याप्रकरणम् । ७४७ संख्या सम हो तो अशुभ फलदायक। विषम राशि में करण संख्या सम हो तो अशुभ फलदायक होता है।।७।। विशेषफलम् – ओजे व्याधिः समे हानिर्यावत्तुदशकं भवेत् । परतः पञ्चकं चौजे समे व्याधिरथांन्यथा ।।८।। विषम राशि में यदि स्थानकरण की संख्या १० हो तो व्याधि का नाश और सम राशि में हानि होती है। इसके बाद १५ पर्यन्त व्याधि इसके बाद २५ तक सम राशि में व्याधि और विषम राशि में हानि होती है।।८।। शिरोरोगाक्षिरोगाश्च रक्तासृक्कामलाज्वरीः । ग्रहणी शीतको मेहप्लीहो गुल्मलतः क्रमात् ।।९।। इसके बाद पुनः ३५ पर्यंत क्रम से शिरोरोग, नेत्ररोग, रक्तविकार, कामलारोग, ज्वररोग, संग्रहणी, शीतरोग, प्रमेहरोग, प्लीहारोग, गुल्मरोग होता है।।९।। रत्नैर्धान्यैश्च हेमैश्च गोभिः क्षेत्रैश्च राजभिः । दासैश्च महिषैरुष्ट्रैर्गजाश्वैर्वृद्धयः स्मृताः ।।१०।। इसके बाद ४५ पर्यन्त क्रम से रत्नवृद्धि, धान्यवृद्धि, सुवर्णवृद्धि, गौ आदि की वृद्धि, क्षेत्रादि की वृद्धि, राजा से लाभ, दासों से लाभ, महिषी आदि की वृद्धि, ऊंट आदि की वृद्धि, हाथी घोड़े की वृद्धि होती है।।९-१०।। जातिदेशानुसारेणफले तारतम्यम् – जात्या देशस्य कालस्य स्वानुरूपं फलं वदेत् । तत्तद्भावानुसंज्ञं च ग्रहात्भावात्फलं वदेत् ।।११।। इस प्रकरण में स्थान करण का जो फल कहा गया हैं उसे जाति देश काल के तारतम्य से स्वरूप के अनुसार कहना चाहिये।।११।। उच्चादिषु नवस्वेव कालांशादिषु यत्फलम् । भाग्याध्यायोक्तमप्यत्र योजयेत्तु विशेषतः ।।१२।। पहले कहे हुये उच्चादि फल, कालांशादि फल और भाग्याध्यायोक्त फल का विचार भी स्थान करण में संयोजित करके फलादेश करना चाहिये।।११-१२।। इति पाराशर होरायामुत्तरार्धेमासचर्याफलवर्णननाम षोडशोऽध्यायः।