भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 800 में से

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पृष्ठ 758

७४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यदि ग्रह भाव से न्यून हो तो ग्रह के अंश को ४ से गुणने से और यदि अधिक अंश हो तो भाव संधि से घटाने से शेष भाव फल होता है।।१।। ऊर्ध्वमुखो रवियुक्तोराशिसमेतस्त्वधोमुखोज्ञेयः । तिर्यङ्मुखोऽखिलयुतो राशिर्भावाः परेण्येवम् ।।२।। यदि भाव में सूर्य हो उसे ऊर्ध्वमुख, जो भावग्रह रहित हो उसे अधोमुख और जो चन्द्रादि ग्रहों से युक्त हो उसे तिर्यक् मुख कहते हैं।।१-२।। भावानांफलम् - अन्य जातीय योगे तु तत्तद्भावफलं वदेत् । स्वजातीय योगेषु त्रिंशाद्यंशा भवंत्युत ।।३।। भावों में अन्य जातीय ग्रहों के योग हों तो उनके अनुसारि भाव के फल को कहना चाहिये। यदि स्वजातीय ग्रह युक्त हो तो सम्पूर्ण तीस अंश फल होता है।।३।। भावानांस्थानांकसंख्यामाह- तत्त्वमाकृतिरेकाक्षिछंदस्तत्वं चतुस्त्रयः । एकोनविंशतिच्छन्दो नवाक्षी षट् त्रयस्तथा ।।४।। तनु आदि १२ भावों के क्रम से २५, २२, २१, २६, २५, ३४, १९, २६, २९, ३६, ५४, १६ ये भाव स्थानांक संख्यायें हैं।।४।। भावानांकरण (रेखा) संख्यामाह- वेदेषवो नृपाः स्थाने भावसंख्याःप्रकीर्त्तिताः । एकत्रिंशत्त्रयस्त्रिंशद्दानि त्रिंशत्तथैव च ।।५।। एकत्रिंशद्द्विनेत्रे च मुनिरामाः खपावकाः । मानि त्रिंशतिरेकद्वौ खवेदाः करणस्य तु ।।६।। तनु आदि १२ भावों के क्रम से ३१, ३३, २७, ३०, ३१, २२, ३७, ३०, २७, २०, २१, ४० करणांक है।।५-६।। पूर्वोक्त स्थान-करण संख्यानां शुभाऽशुभत्वम् - विषमायां क्रमादोजे युग्मे स्यातां शुभाशुभे । समायां भवतस्तद्वत्यापसौम्य फल क्रमात् ।।७।। विषम राशि में स्थान संख्या विषम हो तो शुभ फल और सम राशि में स्थान

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