बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ मासचर्याप्रकरणम् । ७४५ दशाफलम् - व्याधि दुर्गतिदा प्रोक्ता दशारम्भे तु शीतगोः । स्वोच्चादि संस्थिता दाय प्रारम्भे शुभदादशा ।।९६।। आरम्भ में चन्द्रमा की दशा व्याधि और दुर्गति को देती है। उच्चादि छ स्थान में गये हुये ग्रह की दशा प्रारम्भ में शुभ फल देने वाली अन्यथा अशुभ फल देने वाली होती हैं।।९६।। अन्यथाऽशुभदा प्रोक्ता प्रारम्भे ज्योतिषां दशा । केन्द्रधूप्रगताःखेटा दशायां शुभदाः सदा ।।९७।। केन्द्र में गये हुये ग्रह की दशा शुभद होती है।।९७।। द्रव्यकर्मगुणा यस्य स्वभावाः कथिताः पुरा । ते सर्वे स्वदशाकाले योज्या भावदृगादिषु ।।९८।। पूर्व में जिस ग्रह का जो स्वभाव और गुण कहा गया है वह सभी उसके दशाकाल में योजना करना।।९८।। भावदृष्टिवलेष्टानि फलानि कथितानि च । भावाध्यायोक्त ख्यादिफलान्यत्रैव योजयेत् ।।९९।। और भावों अथवा भावेशों के दृष्टिवश से जो फल कहे गये हैं और भावस्थ सूर्यादि के फलों को भी तारतम्य से योजना कर फल कहना चाहिये।।९६-९९।। इति बृहत्पाराशर होरायामुत्तरार्धे पंचदशोऽध्यायः।।१५।। अथ मासचर्याप्रकरणम्। भावसधिस्थग्रहाणांफलम् - भावांशैः समतां गतः खलु खगः पूर्णं विधत्ते फलम् - संधिस्थो न फलप्रदोऽन्तरगतैस्त्रैराशिकेनैव च । भावन्यूनमथग्रहस्य गुणयेदंशादिकं चार्णवैर्हित्वा- चास्य च संधितोऽधिकमथो प्रोक्तं फलं भावजम् ।।१।। ग्रह जिस भाव में वैटा है उस भाव का राशि अंश यदि ग्रह के राशि अंश के तुल्य हो तो उस भाव का पूर्णफल प्राप्त होता है। यदि ग्रह संधि में हो तो उस ग्रह का फल नहीं होता है, दोनों के मध्य में हो तो त्रैराशिक द्वारा फल लाना चाहिये,