भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 756, कुल 800 में से

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पृष्ठ 756

७४४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पापेष्वेवमथापि पापनिरतः शत्रुध्वथो शत्रुभि- वीर्येणाथ पराजयो जय इमान्यर्यायतः प्राप्नुयात् ॥९०॥ यदि शुभग्रह इष्टबल में अधिक हों तो धनी, मित्रों के प्रति सुशीलता गुणी, धर्मरत, दाता सुखी और बलवान् होता है। यदि पापग्रह इष्टबल में अधिक हों तो शत्रुओं के बल द्वारा पराजय होती है।।९०।। फलान्तरम् - अधिकेष्वशुभेष्वेवमनिष्टाख्यफलानितु । व्याधिभिः कलहैर्मित्रैः पीड्यते नात्र संशयः ॥९१॥ यदि पापग्रह अधिक बली हों तो ज्वरपीडित, कलह और मित्रों से पीड़ित रहता है।।९१।। एवं पापेषु दुश्चेष्टः पातकी भवति ध्रुवम् । शत्रुंष्वेवं सदा रोगी मित्रैर्बन्धुविवर्जितः ॥९२॥ पापग्रह अधिक वली हों तो दुष्ट चेष्टा वाला पातकी होता है। शत्रुग्रह अधिक बली हों तो सदा रोगी, मित्र तथा बंधु वर्ग से रहित हो।।९२।। सर्वद्वेष्टबलाधिक्ये सर्वत्राफलदोग्रहः । शुभेषु च फलेष्वेव स्पष्टमेव फलप्रदः ॥९३॥ जो ग्रह सर्वद्वेषी हो और बलाधिक्य हो तो वह निष्फल होता है।।९३।। अत्यनिष्टफलः खेटः शुभेषु त्वफलप्रदः । अनिष्टफलदोऽन्येषु खेटः सर्वत्र सर्वदा ॥९४।। और जो शुभवर्ग में शुभ फल देने वाला है यदि अन्य ग्रहों से मिश्रित है तो अनिष्ट फल देने वाला होता है।।९४।। स्वोच्चादिस्थानदृस्थाःस्युस्तथादिगवर्गा अपि । क्षेत्रपुत्रकलत्रादि धनधान्यसमृद्धिदाः यदि मित्रादिवर्गस्थाधनधान्यविवर्धनाः ॥९५।। जो ग्रह अपने उच्च, मूलत्रिकोण स्वक्षेत्र, मित्रक्षेत्र, अधिमित्रक्षेत्र, उदासीन क्षेत्र में हो वा अपने दशमवर्ग में हो वह स्त्री पुत्र धन धान्य की वृद्धि करने वाला होता है।।९५।।

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