बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नाध्यायः । ७४९ विना मनु तपस्ये च शास्त्रज्ञानेन केवलम् । हस्तामलकवत्सर्वं जगतां लोकयेत्फलम् ॥७॥ इस शास्त्र का उत्तम ज्ञान होने से मंत्र तथा देवता की आराधना के बिना ही हाथ में रखे हुये आंवला के समान ही संपूर्ण जगत् का शुभ अशुभ देखा जा सकता है॥७॥ पुत्राय शिष्याय च धीमते च तपस्विने मंत्रविदे च दात्रे । दद्यादिमं शास्त्रमहासमुद्रं यथैव शम्भुः शिशवेपयोधिम् ॥८॥ इस महासमुद्र शास्त्र को पुत्र, शिष्य, बुद्धिमान्, तपस्वी, मंत्रवेत्ता और दाता को देना चाहिये। जैसे शिवजी ने तपस्वी उपमन्यु को पयोधि को दिया था॥८॥ बुद्धिहीनाय दम्भाय दांभिकायत्वमर्षिणे । न दद्यादादि दद्याच्चेद्द्विधा स्वस्य विनश्यति ॥९॥ इस शास्त्र को दंभी, क्रोधी, दुष्ट को नहीं देना चाहिये ऐसे लोगों को देने से विद्या नष्ट हो जाती है। पूर्वोक्त दोष से रहित बालक भी हो तो उसे इस शास्त्र को पढ़ाना चाहिये।।९।। एवं ते कथितं शास्त्रं त्वयिस्नेहाद्द्विजोत्तम । जातकांशं च विद्यांशं किं भूयस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥१०॥ हे मैत्रेय! तुम्हारे ऊपर स्नेह के कारण मैंने जातकांश को कहा। अब तुम्हारी क्या सुनने की इच्छा है सो कहो।।६-१०।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे सप्तदशोऽध्यायः॥१७॥ प्रश्नाध्यायः ॥१८॥ मैत्रेय उवाच- भगवन्प्रश्नशास्त्रं तु सूचिकानां प्रकाशितम् । कलौ युगे तु मंदानां यज्ज्ञातुं तद्वदस्व मे ॥१॥ मैत्रेय जी बोले— हे भगवन्! आपने बुद्धिमानों के लिये प्रश्न शास्त्र को कहा है किन्तु कलियुग में मन्दबुद्धि वालों को जैसे ज्ञान हो उसे कहिये॥१॥ उपास्य विवेचनम् - कृतेयुगे तु धर्मस्य पूर्णत्वात्तपसान्विताः । सर्वे जानन्ति भूतं च भवद्भावि द्विजोत्तम ॥२॥