भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 764

७८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । प्रश्नकर्तुः नियमः- अलुब्धो नैष्ठिकः शुद्धो विनय प्रश्रयान्वितः । रत्नं स्वर्णं धनं वस्त्रं पुष्पमूल फलानि तु ॥१९६॥ दैवज्ञपुरतो दत्वा पृच्छेदिष्टं प्रियान्वितः । त्यागी, निष्ठावान्, निष्कपट, विनयादि गुणों से युक्त जो प्रश्नकर्ता वह रत्न, वस्त्र, सुवर्ण धन पुष्प, फलादि को दैवज्ञ के सामने रख के मीठे वचनों से अपने अभीष्ट को पूछे॥१९६॥ दैवज्ञस्य कर्त्तव्यः- अथ प्राङ्मुख आसीनः शुचिर्दैवविदग्रतः ॥१९७॥ दैवज्ञ प्रश्न के समय पवित्र होकर पूर्व मुख बैठकर ॥१९७॥ तिर्यगूर्ध्वाश्चतस्रस्तु रेखा रज्जुसमालिखेत् । एकीकुर्यात्तु चत्वारि मध्यस्थानि पदानि च ॥१९८॥ चार रेखा तिरछी और चार खड़ी रेखा को लिखे। ऐसा करने से १६ कोष्ठ का चक्र होगा। मध्य के चार कोष्ठों में ॥१९८॥ तत्र पद्मं लिखेद्रखामध्ये सकर्णिकम् । ईशान्यकोष्ठादारभ्य मीनाद्या राशयः क्रमात् ॥१९९॥ कर्णिका के साथ कमल को बनावे इसमें ईशान कोण से आरम्भ कर मीनादि राशियों को लिखे॥१९९॥ मेषवीथी वृषाद्यास्तु कौर्प्याद्या मिथुनस्य तु । वीथयो मीनमेषौ तु तुलाकन्ये वृषस्य तु ॥२००॥ चक्र में वृष से सिंह पर्यन्त चार राशियों की मेषवीथि, वृश्चिक से चार राशियों की मिथुन वीथि और मीन, तुला, कन्या राशियों की वृषवीथि संज्ञा जानकर ॥२००॥ आरूढात् वीथिभं यावत्तावच्छत्रं तु लग्नतः । आरूढराशिल्लग्नं चेच्छत्रं चापि भवेत्तथा ॥२०१॥ आरूढ़ लग्न का ज्ञान करे। प्रश्नकर्त्ता जिस दिशा में बैठा हो उस दिशा के नाम को आरूढ़ लग्न कहते हैं अथवा प्रश्नकर्त्ता से राशिचक्र में अंगुली को धरावे राशि में अंगुली धरै वही आरूढ़ लग्न होती है। आरूढ़ लग्न से वीथि की पर्यन्त छत्र होता है। यदि आरूढ़ राशि ही प्रश्नलग्न हो तो वही छत्र होता ।