भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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७५१ प्रश्नाध्यायः । सर्वज्ञश्च शिवो देवो गायत्रीछंद ईरितत् । अनुष्टुप् च षडंगं स्याद्वाग्भावेन हृदयादि च ॥१०॥ विनियोग— अनयोऽमन्त्रयोः दक्षिणामूर्त्तिर्ऋषिः गौरी परमेश्वरी सर्वज्ञः शिवश्च देवते गायत्र्यनुष्टुभौ छंदसी ज्योतिःशास्त्रज्ञानप्रादाये जपे विनियोगः, इसके बाद "ऐं" इस बीज से षडंगादि न्यास करे जो आगे कह रहे हैं॥९-१०॥ ध्यान- उद्यानस्यैकवृक्षाधः परे हैमवते द्विज । क्रीडंती भूषितां गौरीं शुक्लवस्त्रां शुचिस्मिताम् ॥११॥ हिमालय पर्वत के ऊपर बगीचे में एक वटवृक्ष के नीचे सफेद वस्त्र को धारण की हुई प्रसन्न मुख क्रीडा करती हुई बैठी हुई हैं॥११॥ देवदारुवने तत्र ध्यानस्तिमितलोचनम् । चतुर्भुजं त्रिनेत्रं च, जटिलं चन्द्रशेखरम् ॥१२॥ और इसी प्रकार उसी बगीचे में देवदारु वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न आंखों को मूंदे हुये चार भुजाओं वाले तीन आंखों वाले जटा धारण किये हुये मस्तक में चन्द्रमा को धारण किये हुये शंकर जी बैठे हैं॥१२॥ शुक्लवर्णं महादेवं ध्यायेत्परममीश्वरम् । अनेनाभ्यां द्विजश्रेष्ठ बुद्धिस्तु विमलाभवेत् । जयमात्रेण सिद्धिः स्याद्दैवज्ञत्वं प्रकाशते ॥१३॥ इस प्रकार पार्वती और शुक्लवर्ण शंकर का ध्यान करके यथाशक्ति जप को करे। हे मैत्रेय! इन दोनों मंत्रों के पुरश्चरण करने से निर्मल बुद्धि होकर ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान होने से वह दैवज्ञ होता है॥१३॥ दैवज्ञ लक्षणम् - द्विविधं गणितं ज्ञात्वा शाखास्कंधं विमृश्य च । होरा स्कंधत्य शकले श्रुत्वार्थमवधार्य च ॥१४॥ जो द्विज श्रेष्ठ दोनों गणितों को जानकर तथा जातक के दोनों भागों को गुरु से पढ़कर उसको धारण करता है॥१४॥ वाग्मी द्विजवरो यः स्यान्न वंध्या तस्य भारती ॥१५॥ वही उत्तम दैवज्ञ होता है और उसकी वाणी मिथ्या नहीं होती है॥१५॥ ५।।