बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 767, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नोध्यायः । ७५५ अथ द्वितीयभावादष्टमभावपर्यन्तं- नृपा मूर्छा शरास्तत्वं तिथिशोड़श पंच च । द्वितीयेत्वष्टमे भावस्त्वंतरे त्वनुपाताः ॥३७॥ द्वितीय भाव में १६, तृतीय भाव में २१, चतुर्थभाव में ५, पंचम भाव में २५, षष्ठभाव में १५, सप्तम भाव में १६, अष्टम भाव में ५ ये रश्मियां होती हैं। अन्य भावों का अनुपात द्वारा पीछे कह चुके हैं॥३७॥ नागाब्देषु गुणा रूद्रा वाजिवेदांगपंक्तयः । दशपंचाष्टका मेषाद्रश्मयः संप्रकीर्त्तिता ॥३८॥ मेषादि राशियों में क्रम से ८, ८, ५, ३, ११, ७, ४, ६, १०, १०, ५, ८ होती हैं॥३८॥ एकयोगे तु सर्वेषु व्याधिर्द्धाभ्यां भवेन्मृतिः । लक्ष्मियोगेषु सर्वेषु व्याधिस्तस्यनवाऽपि वा ॥३९॥ पीछे जो मरण योग कहे हैं उनमें यदि लक्ष्मी योग भी हो तो कभी मरण होता है कभी नहीं होता है॥३७-३९॥ अथ रोगिणः मृत्युसंबंधी प्रश्नः- वैधृतौ च व्यतीपाते सार्पभैंतिमसंज्ञिते । कुलीरे विषनाडीषु सूर्यदुष्टेषु पंचसु ॥४०॥ यदि प्रश्न समय वैधृति, व्यतीपात, श्लेषा, रेवती, कर्काश, विषनाडी भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि ये सूर्य से दूषित हों॥४०॥ पापयुक्ते तु नक्षत्रे राशौ तत्संयुतेऽपि च । सन्धौ च मासशून्यार्था तिथिराशिषु जन्मभे ॥४१॥ पापयुक्त नक्षत्र हो राशि पापग्रह से युत हो, राशि संधि हो, मास की शून्य राशि तिथि नक्षत्र हो, जन्म का नक्षत्र हो॥४१॥ व्ययाष्टमे च क्षीणेन्दौ शत्रुग्रहनिरीक्षिते । पादं पृष्ठं च जंधां च जानु नाभिं च गुल्फके ॥४२॥ लग्न से १२।८ भाव में क्षीण चन्द्र हो और शत्रुग्रह से दृष्ट हो, पैर, पीठ, जंघा, जानु, नाभि, गुल्फ (एड़ी)॥४२॥ कर्णौ च चक्षुषी भालमास्यं कंठं स्पृशेद्यदा । व्याधिर्वाम्रियते तद्गन्भृतिं राशिं स्पृशेत्तु वा ॥४३॥