बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कान, नेत्र, ललाट, मुख, कंठ को स्पर्श करता हो, तो व्याधि वा मृत्यु होती है अथवा काल राहु स्पर्श करे।।४३।। अष्टमर्क्षं स्पृशेद्यद्वा कालांशादिषु वा तथा । विपद्वधप्रत्यरृक्षे च वैनाशं ऋक्षमेव वा ।।४४।। आठवीं राशि को स्पर्श करे, षोडशांश को अथवा विपत्तारा वैनाशिक नक्षत्र को।।४४।। संस्पृशेत्प्रश्नकाले तु व्याधिर्वा तस्य वा मृतिः ।।४५ ।। स्पर्श करे तो व्याधि वा मृत्यु हो।।४५।। नक्षत्रक्रमेणकालांस्यावयवाः- शिरोललाटभ्रूनेत्रनासाकर्णकपोलकाः । ओष्ठं च त्रिवुककंठमंशौहृदयमेव च ।।४६।। पार्श्वौ च वक्षः कुक्षिश्चनाभिश्चकटिरेव च । जघनं च नितंबं च लिङ्गमंडं च वस्ति च ।।४७।। ऊरू च जानु जंघा च गुल्फांघ्रीचाश्विभात्क्रमात्। अश्विनी से आरम्भ कर रेवती पर्यन्त २७ नक्षत्रों का क्रम से शिर आदि २७ अंग होते हैं।।४६-४७।। प्रश्नकर्त्तुः अशुभलक्षणं तथा शुभप्रश्नः- तैलाभ्यक्तोऽथवाशुद्धोजलगर्तसमीपगः । प्रष्टा दैवविदे वाथ मरणं तस्यनिर्दिशेत् ।।४८ ।। यदि प्रश्नकर्त्ता तेल लगाये हुये हो, अशौच में हो, जल के गड्ढे के समीप होकर प्रश्न करें और इसी स्थिति में ज्योतिषी हो और प्रश्न का उत्तर दे तो मृत्यु कहना।।४८।। लग्नत्रिसुतकामारिधर्मार्ययगः शुभः । रोगशांतिकरा नो चेद्रिपुनीचग्रहस्थिताः ।।४९।। प्रश्न लग्न से ३।५।७।६।९।११ स्थानों में शुभग्रह हो तो रोगप्रश्न में रोग शांत होगा ऐसा कहे।।४९।। एषु पापा मृतिकरानोचेत्स्वर्क्षोच्चमित्रगाः । यस्य यस्य शुभं वाथ रिःफस्थानगता शुभाः ।।५०।। यद्वा त्रिकोणकेन्द्रस्थास्तस्य तस्य शुभप्रदाः ।