बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 772, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें७६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चरण से किन्तु गुरु पूर्ण दृष्टि से देखता है।।६६।। सर्वेऽर्धबंधुमृत्यु च पूर्णं पश्यति भूमिजः । परे त्रिपादं पूर्णं च सर्वे पश्यंति सप्तमम् ।।६७।। ४।८ स्थान को भौम को छोड़कर सभी ग्रह तीन चरण से देखते हैं किन्तु भौम पूर्णदृष्टि से देखता है और सप्तम को सभी पूर्णदृष्टि से देखते हैं।।६७।। अथ ग्रहाणां स्थानदिग्बलम् - उच्चमूलसुहृत्स्वर्क्षस्वद्रेष्काणनवांशके । स्थितस्य स्थानवीर्यं स्यात्कुजार्कौंदशमेशानिः ।।६८।। प्रश्न में जो ग्रह अपने उच्च, मूलत्रिकोण, मित्र, अपनी राशि, अपने द्रेष्काण, अपने नवांश में हो तो वह स्थानवली होता हैं। भौम, सूर्य दशम स्थान में।।६८।। सप्तमेऽज्ञगुरुर्लग्ने चन्द्रशुक्रौ तु वेश्मनि । दिग्वीर्य संयुता एते नान्यत्र प्रश्न कर्मणि ।।६९।। सातवें स्थान में शनि, बुध, गुरु लग्न में, चन्द्र, शुक्र चौथे भाव में दिग्बली होते हैं।।६८-६९।। अयनबलम् - मृगादिराशिष्ट्कस्थाश्चंद्रार्कज्ञार्यभार्गवाः । बलवंतः कुजार्कीतु कर्कटादिगतौ तथा ।।७०।। मकर से ६ राशि तक चंद्र, सूर्य, बुध, गुरु और शुक्र अयन बल को प्राप्त करते हैं। कर्क से ६ राशि के अन्दर भौम शनि अयन बल से युक्त होते हैं।।७०।। अथ पक्ष चेष्टा दिवा-रात्रि बलम् - पूर्वपक्षे शुभे कृष्णे पापास्तुवलिनस्तथा । वक्रिणो बलिनः खेटाश्चेष्टावलसमन्वितः ।।७१।। शुक्ल पक्ष में शुभग्रह और कृष्णपक्ष में पापग्रह बली होते हैं। वक्रीग्रह चेष्टावली होते हैं।।७१।। शुभाः पापादिवारात्रौ वलिनः स्युः क्रमात्स्मृताः । निसर्गवलिनः प्राग्वदेवं स्युः प्रश्नकर्मणि ।।७२।। शुभग्रह दिवावली और पापग्रह रात्रिबली होते हैं। निसर्गबल पूर्वोक्तवत् जानना चाहिये। इस प्रकार प्रश्नकाल में बलों को जानना चाहिये।।७२।।