बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 773, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नाध्यायः । ७६१ दशवर्गबलम् - लग्नहोराद्रेष्काणार्कनवांशाः सप्तमांशकः । कलांशः कालहोरा च त्रिंशांशःषष्ठिभाजकः ।।७३।। पूर्वपूर्वोवलीप्रोक्ता न बली चोत्तरोत्तरः । लग्न, होरा, द्रेष्काण, द्वादशांश, नवांश, सप्तांश, षोडशांश, कालहोरांश, त्रिंशांश और षष्ठ्यंश यह उत्तरोत्तर हीनबली होते हैं।।७३।। प्रश्नलग्नाज्जन्मलग्नादीनांज्ञानम् - प्रश्नलग्नं कलीकृत्य नवघ्नं भेन भाजितम् ।।७४।। प्रश्न लग्न का कला करके नव से गुणाकर २७ का भाग देने से।।७४।। लब्धं नवांशकं ज्ञेयं शिष्टमेकत्रसंस्थिते । लब्धं सप्तगुणं वेदभक्तं शिष्टमिहांशकः ।।७५।। लब्धिनवांश होता है शेष को पृथक् रखना, लब्धि को सात से गुणाकर ४ से भाग देना लब्धि नवांश होती है।।७५।। नवांशसदृशं लग्नं यद्वा त्रिघ्नार्कभाजितम् । सप्ताप्तशिष्टं लग्नं च सप्तमे मासि निश्चिते ।।७६।। सौम्येतदेव कर्मक्षं जन्मक्षं वा भवेद्वलम् । इसी के समान जन्मलग्न होता है। अथवा त्रिगुणित करके १२ से भाग देना जो शेष हो वही जन्मलग्न होता है। अथवा शेष को सात से भाग देने से जो आवे वह सातवें मास का लग्न जानना। शुभग्रह की राशि हो तो वही कर्मनक्षत्र वा जन्मनक्षत्र जानना।।७६।। शास्त्रस्य वेदांगत्वप्रतिपादनम् - इदं शास्त्रं मया प्रोक्तमाद्यंतं तव सुव्रत ।।७७।। हे मैत्रेय! मैंने जो यह आद्यंत ज्योतिष शास्त्र को कहा है।।७७।। नाशिष्याय प्रदातव्यं नापुत्राय कदाचन । गुणशीलयुतायैव शिष्यायैव द्विजातये । दातव्यं तु प्रयत्नेन वेदांगमिदमुच्यते ।।७८।। वह कुपुत्र, कुशिष्य को कभी नहीं देना। जो गुणी, शीलसंयुक्त शिष्य हो और द्विजाति हो उसे प्रयत्नपूर्वक देना चाहिये क्योंकि यह वेदांग है।।७८।। इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽष्टादशोऽध्यायः ।।१८।।