बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पातफलम् ९३ अध्यात्मचिन्तकः शान्तो दृढकार्यो दृढव्रतः। धर्मवांश्च ससत्यश्च परिधौ रन्ध्रसंस्थिते।।८।। आठवें भाव में हो तो अध्यात्म (वेदान्त) को जानने वाला, शांत, दृढ़ कार्य करने वाला, दृढ़निश्चयी, धार्मिक और बली होता है।।८।। पुत्रान्वितः सुखी कान्तो धनाढ्यो लोलवर्जितः। परिधौ धर्मगे मानी अल्पसन्तुष्टमानसः।।९।। नवम भाव में हो तो पुत्रयुक्त, सुखी, सुन्दर, धनी, स्थिर, अभिमानी और थोड़े में संतुष्ट होने वाला होता है।।९।। क्वचिदज्ञस्तथा भोगी दृढकायो ह्यमत्सरः। परिधौ दशमे प्राप्ते सर्वशास्त्रार्थपारगः।।१०।। दशम भाव में परिधि हो तो कोई मूर्ख होता है, भोगी, बली और सभी शास्त्र का विशारद होता है।।१०।। स्त्रीभोगी गुणवांश्चैव मतिमान् स्वजनप्रियः। लाभे च परिधौ जाते मन्दाग्निः संसुपद्यते।।११।। एकादश भाव में हो तो स्त्रीभोगी, गुणी, बुद्धिमान्, बंधुप्रिय और मंदाग्नि रोग से पीडित होता है।।११।। व्ययस्थे परिधौ जाते गुरुनिन्दापरायणः। दुःखी क्रोधाधिकश्चैव व्ययाधिक्यं च जायते।।१२।। बारहवें भाव में हो तो गुरु की निंदा करने वाला, दुःखी, अत्यंत क्रोधी और अधिक व्यय करने वाला होता है।।१२।। इति परिधिफलम्। अथ चापफलम् धनधान्यहिरण्याढ्यो कृतज्ञः सम्मतः सताम्। सर्वदोषपरित्यक्तश्चापे तनुगते नरः।।१।। यदि चापलग्न में हो तो जातक धन-धान्य से पूर्ण, सज्जनों के अनुकूल, कृतज्ञ, सभी दोषों से रहित होता है।।१।। प्रियंवदः प्रगल्भाढ्यो विनीतो विद्ययाधिकः। धनस्थे चापसम्प्राप्ते रूपवान् धर्मतत्परः।।२।।