भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 800 में से

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९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् दूसरे भाव में हो तो प्रिय बोलने वाला, प्रगल्भ, धनी, विनीत विद्वान्, सुन्दर और धार्मिक होता है।।२।। कृपणोऽतिकलाभिज्ञश्चौर्यकर्मरतः सदा। सहजे धनुषि प्राप्ते हीनाङ्गो मत्तसौहदः।।३।। सुखी गोधनधान्यादिराजसन्मानपूजितः। धनुषि सुखसंस्थे तु नीरोगो न तु जायते।।४।। तीसरे भाव में हो तो कृपण, कला को जानने वाला, हमेशा चोरी करने में आसक्त, अंग से हीन और मतवाले साथियों से युक्त होता है।।३।। चौथे भाव में हो तो सुखी, गौ, धन-धान्य से पूर्ण, राजसम्मानयुक्त और नीरोग होता है।।४।। रुचिमान् दीर्घदर्शी च देवभक्तः प्रियंवदः। चापे पञ्चमभे जातो विवृद्धः सर्वकर्मसु ।।५।। पाँचवें भाव में हो तो कांतिमान्, दीर्घदर्शी, देवभक्त, प्रिय बोलने वाला और सभी कामों में वृद्धि करने वाजा होता है।।५।। शत्रुहन्ताऽतिधूर्त्तश्च सुखी प्रतिरुचिः शुचिः। अरिस्थलंगते चापे सर्वकर्मसमृद्धिभाक् ।।६।। छठे भाव में हो तो शत्रु का नाश करने वाला, अत्यंत मूर्ख, प्रेम करने वाला, सुखी, पवित्र और सभी कामों में समृद्धि को प्राप्त करने वाला होता है।।६।। ईश्वरो गुणसम्पूर्णः शास्त्रविद्धार्मिकः प्रियः। चापे सप्तमभावस्थे भवतीति न संशयः।।७।। यदि चाप सातवें भाव में हो तो जातक ईश्वर-सदृश गुणों से पूर्ण, शास्त्र को जानने वाला, धार्मिक और प्रियभाषी होता है।।७।। परकर्मरतः क्रूरः परदारपरायणः। अष्टमस्थानगे चापे करोति विफलान्तिकः।।८।। आठवें भाव में हो तो परकर्म में आसक्त, क्रूर, परस्त्रीगामी और अंतिम समय में अधिक कष्ट भोगने वाला होता है।।८।। तपस्वी व्रतचर्यासु निरतो विद्यायाधिकः। धर्मस्थे यदि चापे च मानज्ञो लोकविश्रुतः।।९।।