भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ शिखिफलम् ९५ नवें भाव में हो तो मानी, लोक में प्रसिद्ध, तपस्वी, व्रतादि करने में आसक्त, विद्वान् होता है।।९।। बहुपुत्रधनैश्वर्यो गोमहिष्यादिभाक् भवेत्। कर्मस्थे चायसंयुक्ते जायते लोकविश्रुतः॥१०॥ दशम भाव में हो तो बहुपुत्र, धन, ऐश्वर्य, गौ, भैंस से युक्त और लोक- प्रसिद्ध होता है।।१०।। लाभगे चापसम्प्राप्ते लाभयुक्तो भवेन्नरः। नीरोगो दृढकर्माग्निर्मन्त्रस्त्रीपरमार्थवित् ।।११।। ग्यारहवें भाव में हो तो लाभ से युक्त, नीरोग, क्रोधी, मंत्र, स्त्री और परमास्त्र को जानने वाला होता है।।११।। खलोऽतिमानी दुर्बुद्धिर्निर्ल्लज्जो व्ययसंस्थितः। चापे परस्त्रीसंयुक्तो जायते निर्धनः सदा।।१२।। बारहवें भाव में हो तो दुष्ट, अभिमानी, दुर्बुद्धि, निर्लज्ज, परस्त्री युक्त और निर्धन होता है।।१२।। इति चापफलम्। अथ शिखिफलम् कुशलः सर्वविद्यासु सुखी वाङ्निपुणः पुमान्। मूर्त्तिस्थे शिखिसम्प्राप्ते सर्वकामान्वितो भवेत् ।।१।। यदि लग्न में शिखि (केतु) हो तो सभी विद्याओं में निपुण, सुखी, वाक्चातुर्य, प्रवीण और सभी कार्यों में चतुर होता है।।१।। वक्ता प्रियंवदः कान्तो धनस्थानगते शिखी। काव्यकृत्पण्डितो मानी विनीतो वाहनान्वितः ।।२।। दूसरे भाव में हो तो वक्ता, प्रिय बोलने वाला, सुन्दर, कविता करने वाला, मानी, नम्र और वाहन युक्त होता है।।२।। कदर्यः क्रूरकर्मा च कुशाङ्गो धनवर्जितः। शिखिनि सहजस्थे तु तीव्ररोगी प्रजायते।।३।। तीसरे भाव में हो तो कृपण, क्रूर कर्म करने वाला, कृश शरीर वाला, धनहीन और कठिन रोगवाला होता है।।३।।