भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् रूपवान् गुणसम्पन्नः सात्त्विको विश्रुतिप्रियः। सुखस्थे तु शिखीजाते सदा भवति सौख्यभाक् ॥४॥ चौथे भाव में हो तो रूपवान्, गुण से युक्त, सात्त्विक, वेद को जानने वाला और सदा सुखी होता है॥४॥ सुखी भोगी कलाविच्च पञ्चमस्थानगः शिखी। युक्तिज्ञो मतिमान् वाग्मी गुरुभक्तिसमन्वितः॥५॥ पाँचवें भाव में हो तो युक्ति को जानने वाला, वक्ता, चतुर, गुरुभक्ति युक्त, सुखी, भोगी और कला को जानने वाला होता है॥५॥ मातृपक्षक्षयकरः रिपुहा बहुबान्धवः। रिपुस्थाने शिखिप्राप्ते शूरः कान्तो विचक्षणः॥६॥ छठे भाव में हो तो मातृपक्ष (माया आदि) को नाश करने वाला, शत्रु को नाश करने वाला, बहु बांधवों वाला, शूरवीर, सुन्दर और विचक्षण होता है॥६॥ रक्तपीडाभिरतः कामी भोगसमन्वितः। शिखी तु सप्तमस्थाने वेश्यास्तु कृतसौहृदः॥७॥ यदि शिखी सातवें भाव में हो तो रक्तपीडा से युक्त, कामी, भोगयुक्त, वेश्या से मित्रता करने वाला होता है॥७॥ नीचकर्मरतः पापो निर्लज्जो निन्दकः सदा। मृत्युस्थाने शिखिप्राप्ते गतस्त्र्यपरपक्षकः॥८॥ आठवें भाव में हो तो नीचकर्म में आसक्त, पापी, निर्लज्ज, निंदा करने वाला, स्त्रीहीन, शत्रुपक्ष से युक्त होता है॥८॥ लिङ्गधारी प्रसन्नात्मा सर्वभूतहिते रतः। धर्मभे शिखिनि प्राप्ते धर्मकार्येषु कोविदः॥९॥ नवम भाव में हो तो चिह्नधारी (तिलक-विशेष), प्रसन्न आत्मा, सभी प्राणियों के हित करने में आसक्त, धार्मिक कार्यों में पटु होता है॥९॥ सुखसौभाग्यसम्पन्नः कामिनीनां च वल्लभः। दाता द्विजसमायुक्तः कर्मस्थे शिखिनी भवेत्॥१०॥ दशम स्थान में हो तो सुख-सौभाग्य से संपन्न, स्त्रियों का प्यारा, दाता, ब्राह्मणों से आवृत होता है॥१०॥