बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ गुलिकफलम् ९७ नित्यलाभः सुधर्मी च लाभे शिखिनि पूज्यते। धनाढ्यः सुभगः शूरः सुयज्ञश्चातिकोविदः॥११॥ एकादश भाव में हो तो नित्य लाभ से युक्त, धर्मात्मा, धनी, सुन्दर, शूरवीर, यशस्वी और पंडित होता है॥११॥ पापकर्मरतः शूरः श्रद्धाहीनोऽघृणो नरः। परदाररतो रौद्रः शिखिनि व्ययगे सति॥१२॥ बारहवें भाव में हो तो पापकर्म में आसक्त, शूर, श्रद्धाहीन, निर्लज्ज, परस्त्रीगामी और भयंकर होता है॥१२॥ इति शिखिफलम्। अथ गुलिकफलम् रोगार्त्तः सततं कामी पापात्माधिगतः शठः। मूर्त्तिस्थे गुलिके मन्दः खलभावोऽतिदुःखितः॥१॥ यदि गुलिक लग्न में हो तो जातक निरंतर रोग से पीड़ित, कामी, पापात्मा, मूर्ख, दुष्ट स्वभाव और अत्यंत दुःखी होता है॥१॥ विकृतो दुःखितः क्षुद्रो व्यसनी च गतत्रपः। धनस्थे गुलिके जातो निःस्वो भवति मानवः॥२॥ दूसरे भाव में हो तो विकृत, दुःखी, क्षुद्र, दुर्व्यसनी, निर्लज्ज और निर्धन होता है॥२॥ चार्वङ्गो ग्रामपः पुण्यसंयुक्तः सज्जनप्रियः। गुलिके तृतीयगे जातो जायते राजपूजितः॥३॥ तीसरे भाव में हो तो सुन्दर शरीर, ग्रामपति, पुण्यवान्, सज्जनों का प्रिय और राजपूजित होता है॥३॥ रोगी सुखपरित्यक्तः सदा भवति पापकृत्। यमात्मजे सुखस्थे तु वातपित्ताधिको भवेत्॥४॥ चौथे भाव में हो तो रोगी, सुख से हीन, सदा पाप करने वाला और अधिक वायु-पित्त वाला होता है॥४॥ विस्तुतिर्विधनोऽल्पायुर्द्वेषी क्षुद्रो नपुंसकः। सुते सगुलिको जातो स्त्रीजितो नास्तिको भवेत्॥५॥ पाँचवें भाव में हो तो निन्दा करने वाला, निर्धन, अल्पायु, द्वेषी, क्षुद्र, नपुंसक, स्त्री से जीता हुआ और नपुंसक होता है॥५॥