भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 800 में से

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पृष्ठ 96

९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् वीतशत्रुः सुपुष्टाङ्गो रिपुस्थाने यमात्मजे। सुदीप्तः सम्मतः स्त्रीणां सोत्साहः सुदृढो हितः।।६।। छठे भाव में हो तो शत्रु से रहित, पुष्ट शरीर, तेजस्वी, स्त्रीप्रिय, उत्साही और दृढ़ विचार का हितकारी होता है।।६।। स्त्रीजितः पापकृज्जारः कृशाङ्गो गतसौहृदः। जीवितः स्त्रीधनेनैव सप्तमस्थे रवेः सुते ।।६।। यदि गुलिक सातवें भाव में हो तो जातक स्त्री से पराजित, पाप करने वाला, दुर्बल शरीर वाला, मित्रहीन, स्त्रीधन से जीविका वाला होता है।।७।। क्षुधालुर्दुःखितः क्रूरस्तीक्ष्णशेषोऽतिनिर्घृणः। रन्ध्रे प्राणहरो निःस्वो जायते गुणवर्जितः ।।८।। आठवें भाव में हो तो भूख से पीड़ित, दुःखी, क्रूर, अधिक क्रोधी, अत्यंत निर्लज्ज, दरिद्र और गुण से हीन होता है।।८।। बहुक्लेशी कृशतनुर्दुष्टकर्मातिनिर्घृणः। मन्दे धर्मस्थिते मन्दः पिशुनो बहिष्कृतिः ।।९।। नवम भाव में हो तो अत्यंत दुःखी, दुर्बल शरीर, दुष्टकर्म को करने वाला, अत्यंत निर्लज्ज, मंदप्रकृति, कृपण और चुगलखोर होता है।।९।। पुत्रान्वितः सुखी भोक्ता देवाग्न्यर्चनवत्सलः। दशमे गुलिके जातो योगधर्माश्रितः सुखी ।।१०।। दशम भाव में हो तो पुत्र से युक्त, सुखी, सुख भोगने वाला, देवता एवं अग्नि का उपासक, योगसाधन में संलग्न होता है।।१०।। सुखी भोगी प्रजाध्यक्षो बन्धूनां च हिते रतः। लाभे यमानुजो जातो नीचांशः सार्वभौमकः ।।११।। एकादश भाव में हो तो सुखी, भोगी, प्रजा का अध्यक्ष, बंधुओं के हित में आसक्त, नीचे अंगों वाला और सार्वभौम के समान रहने वाला होता है।।११।। नीचकर्माश्रितः पापो हीनाङ्गो दुर्भगोऽलसः। व्ययभे गुलिके जातो नीचेषु कुरुते रतिम् ।।१२।। बारहवें भाव में हो तो नीच कर्म में आसक्त, पापी, अंग से हीन, दरिद्र, आलसी और नीचों से प्रेम करने वाला होता है।।१२।। इति गुलिकफलम् ।