भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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अथ प्राणपदफलम् ९९ अथ प्राणपदफलम् मूकोन्मत्तो जडाङ्गस्तु हीनाङ्गो दुःखितः कृशः। लग्ने प्राणपदे क्षीणो रोगी भवति मानवः॥१॥ यदि प्राणपद लग्न में हो तो गूँगा, उन्मत्त, स्तब्ध, अंगहीन, दुःखी, कृश, रोगी और दुर्बल शरीर का होता है॥१॥ बहुधान्यो बहुधनो बहुभृत्यो बहुप्रजः। धनस्थानस्थिते प्राणे सुभगो जायते नरः॥२॥ दूसरे भाव में हो तो धन-धान्य से पूर्ण, अनेक भृत्य एवं अनेक संतति वाला और भाग्यशाली पुरुष होता है॥२॥ हिंस्रो गर्वसमायुक्तो निष्ठुरोऽतिमलिम्लुचे। तृतीयगे प्राणपदे गुरुभक्तिविवर्जितः॥३॥ तीसरे भाव में हो तो हिंसा करने वाला, गर्व से युक्त, निष्ठुर, अत्यंत मलिन और गुरुभक्तिहीन होता है॥३॥ सुखस्थे तु सुखी कान्तः सुहृद्रामासु वल्लभः। गुरौ परायणः शीलः प्राणे वै सत्यतत्परः॥४॥ चौथे भाव में हो तो सुखी, सुन्दर, मित्र एवं स्त्री का प्रिय, गुरुभक्त, सुशील और सत्यवक्ता होता है॥४॥ सुखभाक् च क्रियोपेतस्त्वषचारदयान्वितः। पञ्चमस्थे प्राणपदे सर्वकर्मसमन्वितः॥५॥ पाँचवें भाव में हो तो सुख भोगने वाला, क्रिया से युक्त, दयायुक्त और सभी कामों में अनुरक्त होता है॥५॥ बन्धुशत्रुवशस्तीक्ष्णो मन्दाग्निर्निर्दयः खलः। षष्ठे प्राणोऽल्परोगश्च वित्तपोऽल्पायुरेव च॥६॥ छठे भाव में हो तो बन्धु एवं शत्रु के वशं में रहने वाला, तीक्ष्ण स्वभाव, मंदाग्नि से युक्त, निर्दयी, दुष्ट, धनी और अल्पायु होता है॥६॥ ईर्ष्यालुः सततं कामी तीव्ररौद्रवपुर्नरः। सप्तमस्थे प्राणपदे दुराराध्यः कुबुद्धिमान्॥७॥ यदि सातवें भाव में प्राणपद हो तो ईर्ष्यालु, कामी, भयानक शरीर, दुष्ट स्वभाव और मूर्ख होता है॥७॥