बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंबृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् रोगसन्तापिताङ्गश्च प्राणपदेऽष्टमे सति। पीडितः पार्थिवैर्दुःखैर्भृत्यबन्धुसुतोद्भवैः ॥८८॥ अष्टम भाव में हो तो रोग से पीडित, राजा, रोग, बन्धु, पुत्र और शत्रु से पीडित होता है॥८८॥ पुत्रवान् धनसम्पन्नः सुभगः प्रियदर्शनः। प्राणे धर्मस्थिते भृत्यः सदाऽदुष्टो विचक्षणः ॥८९॥ नवम भाव में हो तो पुत्रवान्, धनी, भाग्यवान्, दर्शनीय, नौकर से युक्त, पंडित होता है॥८९॥ वीर्यवान् मतिमान् दक्षो नृपकार्येषु कोविदः। दशमे वै प्राणपदे देवार्चनपरायणः ॥९०॥ दशम भाव में हो तो बलवान्, बुद्धिमान्, राजकार्य में चतुर, पंडित; देवपूजन में संलग्न होता है॥९०॥ विख्यातो गुणवान् प्राज्ञो भोगी धनसमन्वितः। लाभस्थानस्थिते प्राणे गौराङ्गो मानवत्सलः ॥९१॥ एकादश भाव में हो तो प्रसिद्ध, गुणी, बुद्धिमान्, भोगी, धनी, गौरवर्णी, मानी होता है॥९१॥ क्षुद्रो दुष्टस्तु हीनाङ्गो विद्वेषी द्विजबन्धुषु। व्यये प्राणे नेत्ररोगी काणो वा जायते नरः ॥९२॥ बारहवें भाव में हो तो क्षुद्र, दुष्ट, हीनांग, ब्राह्मण-बंधुओं का द्वेषी, नेत्ररोगी अथवा काना होता है॥९२॥ इति प्राणपदफलम्। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डेऽप्रकाशग्रहफलाध्यायः षष्ठः ॥६॥ अथाऽर्गलाध्यायः अथातः सम्प्रवक्ष्यामि अर्गलार्गलमुत्तमम्। यस्य विज्ञानमात्रेण ग्रहाणां च फलं वदेत्॥१॥ अब मैं अर्गला योग के लक्षण और फल को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान से ग्रहों के फलों का ज्ञान होता है॥१॥ चतुर्थे च धने लाभे विद्यमानग्रहार्गला। तस्य दृष्ट्यादिकं ज्ञेयं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ॥२॥