भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

पच्चीसवाँ सर्ग

निर्वाण-पथपर

**** 1 जब मुनि निर्वाण के लिए चले तब वैशाली निष्प्रभ हो गई, जैसे कि सूर्य ग्रहण होनेपर अन्धकार से ढँका हुआ आकाश (निष्प्रभ हो जाता है)। **** 2 सुन्दर और निरभिमान होनेपर भी, सर्वत्र रमणीय होनेपर भी यह (वैशाली) संताप के कारण शोभित नही हुई, जैसे कि पति के मरनेपर पत्नी, **** 3 जैसे कि विद्या के बिना सुन्दरता, जैसे कि गुण के बिना ज्ञान, जैसे अभिव्यक्ति (की शक्ति) के बिना बुद्धि, जैसे संस्कार के बिना अभिव्यक्ति (की शक्ति), **** 4 जैसे सदाचार के बिना श्री, जैसे श्रद्धा के बिना स्नेह, जैसे उद्योग के बिना लक्ष्मी, जैसे धर्म के बिना कर्म। **** 5 ...उस समय शोक के कारण यह शोभित नही हुई, जैसे शरदऋतु में वर्षा न होनेपर सूखी हुई धान की फसल के साथ पृथ्वी शोभा नही पाती है। **** 6 वहाँ शोक के कारण न किसी ने रसोई बनाई, न भोजन ही किया; यशस्वी मुनि का यश बखानते हुए वे रोते रहे। **** 7 दूसरे लोग न कुछ बोल रहे थे; न कर रहे थे और न सोच रहे थे; नगर में एक ही काम हो रहा था--शोक और क्रन्दन। **** 8 तब सेनापति सिंह अत्यन्त दृढ़ होनेपर भी शोकाकुल हुआ और... ...सोचते हुए यों विलाप किया:-- **** 9 “विधर्मी दर्शनों को पराजित कर, उन्होंने सन्मार्ग का उपदेश दिया और स्वयं उस मार्ग पर चले। अब वह सदा के लिए जा रहे हैं। **** 10 वह नाथ, दुःखी और निष्प्रभ जगत् को छोड़ते हुए, लोगों को अनाथ कर रहे हैं; इस तरह वह शान्ति (= शम) प्राप्त करने जा रहे हैं। **** 11 जैसे काल-क्रम से (बुढ़ापे में) शारीरिक ओज क्षीण होता है, वैसे ही मेरा धैर्य नष्ट हो रहा है, क्योंकि गुरुवर योगाचार्य अन्तिम शान्ति के मार्ग पर हैं। **** 12 अपनी दिव्य शक्ति खोकर स्वर्ग से च्युत हुए नृपति नहुष के समान पृथ्वी उनके बिना दया का पात्र है, और मैं “किंकर्तव्यविमूढ़” हूँ। **** 13 जैसे आतप से पीड़ित व्यक्ति पानी की शरण में जाता है या शीत से पीड़ित आग की शरण में, वैसे ही अपनी शंकाएं मिटाने के लिए लोग अब किसकी शरण जायेंगें? **** 14 मुनि के नष्ट होनेपर-मुनि जो संसार के आचार्य (=लोकाचार्य) हैं और जो आग सुलगानेवाली भाथी की तरह श्रेय की भाथी हैं-धर्म भी नष्ट हो जायगा। **** 15 उनके समान दूसरा कौन हैं जो स्वभावतः रोग व मौत के वशीभूत तथा शील के अभाव या दुःशील से बँधे प्राणियों का महादुःख-चक्र तोड़ सके? **** 16 जैसे वसन्त के अन्त में बादल सूखे हुए सिन्दुवार पौधों को जीवन-दान करता है, वैसे ही कौन दूसरा अपनी वाणी द्वारा काम से अत्यन्त जले हुए मनुष्यों को जिला सकता है? **** 17 जब मेरु के समान ठोस सर्वज्ञ गुरु चले जायेंगे, तब जगत् में किसे वह बुद्धि होगी, जिससे वह विश्वास-पात्र बनेगा? **** 18 मूढ़ जीव-लोक मरने के लिए ही पैदा होता है, जैसे दण्डनीय अपराधी को मद पिलाकर वध-स्थल की ओर ले जाते हैं। **** 19 जैसे तेज आरे से वृक्ष चीरा जाता है, वैसे ही विनाशरूपी आरे से यह संसार चीरा जा रहा है। **** *20 यद्यपि जगत् के श्रेष्ठ आचार्य को ज्ञान-बल प्राप्त है और उन्होंने दोषों को निःशेष जला डाला है, तो भी वह विनाश की ओर जा रहे हैं। **** 21 जो ज्ञानरूपी महानौका द्वारा संसार-सागर से-इच्छाएँ जिसकी तरंगें हैं, अज्ञान जिसका जल है और जिसमें कुदृष्टिरूपी प्राणी तथा काम (=रजस) रूपी मछलियाँ रहती हैं-लोगों को उबारते हैं; **** 22 जो ज्ञानरूपी महाशस्त्र से संसाररूपी वृक्ष को-बुढ़ापा जिसकी शाखाएँ हैं, रोग जिसके फूल हैं, मौत जिसका मूल है और जन्म जिसके अङ्कुर हैं-काटते हैं; **** 23 जो ज्ञानरूपी शीतल जल द्वारा, अज्ञानरूपी अरणियों से उत्पन्न दोषरूपी अग्नि को-काम जिसकी ज्वालाएँ हैं और विषय जिसके ईंधन है-शान्त करते हैं; **** 24 जिन्होंने शान्ति मार्ग ग्रहण किया है, जिन्होंने अज्ञानरूपी महा-अन्धकार का परित्याग किया है, परम नैष्ठिक ज्ञान प्राप्तकर जिन्होंने इसका प्रेमपूर्वक उपदेश दिया है; **** 25 जिन्होंने सब दोषों को अन्त कर लिया है, जो सब जीवों पर दया-दृष्टि रखते हैं और जो सबका उपकार करते हैं, वह सर्वज्ञ सब कुछ छोड़ने जा रहे हैं। **** 26 यदि महामुनि भी, जिनकी भुजाएँ बड़ी बड़ी हैं और जिनकी वाणी मृदु एवं स्पष्ट है, नाश को प्राप्त हो रहे हैं, तो नाश को प्राप्त होने से कौन बच सकेगा? **** 27 अतः बुद्धिमान् मनुष्य को शीघ्र ही धर्म की शरण में जाना चाहिए, जैसे कि जङ्गल में भटका हुआ काफिले का सौदागर, पानी देखकर, तेजी से उसकी शरण में जाता है। **** 28 अनित्यता एक बुराई है जो विनाश-कार्य में भेद-भाव नही रखती है, ऐसा जानकर जो मनुष्य धर्म के विषय में प्रसुप्त नही रहता, वह पड़े रहनेपर भी प्रसुप्त नहीं हैं।” **** 29 तब ज्ञानोपभोक्ता नरसिंह सिंह ने जन्म की बुराइयों की निन्दा की और जन्म-विनाश की प्रशंसा।


**** 106 अश्वघोष