बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें30 जन्म-मूलोच्छेद करने की, सद्रत ग्रहण करने की और चञ्चल चित्त को संयत करने की इच्छा से उसने नैष्ठिक मार्ग पर चलने की इच्छा की। 31 शान्ति-मार्ग पर चलने की, भव-सागर में त्राण पाने की और सदा उदार रहने की इच्छा से उसने जन्म-उच्छेद करना चाहा। 32 उस समय जब कि मुनि निर्वाण प्राप्त करने की इच्छा कर रहे थे, उस सिंह ने दान दिया और अभिमान-परित्याग किया, धर्म का ध्यान किया और शान्ति प्राप्त की, और इस तरह उसने पृथ्वी को शून्य पद समझा। 33 तब गजराज के समान अपना सारा शरीर घुमाकर नगर की ओर देखते हुए, मुनि ने यह वचन कहे :- 34 "हे वैशाली, अपने जीवन के शेष भाग में मैं तुम्हें फिर न देखूँगा; क्योंकि, मैं निर्वाण की ओर जा रहा हूँ।" *35 श्रद्धापूर्वक और धर्म की इच्छा से वे पीछे-पीछे आ रहे हैं, यह देखकर मुनि ने उन्हें विदा किया, जिनका चित्त उस समय तक प्रवृत्ति में ही लगा हुआ था। 36 तब यथाक्रम विनायक भोगनगर की ओर बढ़े और वहाँ ठहरकर सर्वज्ञ ने अपने अनुचरों से कहा:- 37 "आज मेरे चले जानेपर तुम्हें धर्म में अपना श्रेष्ठ ध्यान लगाना चाहिए। यही तुम्हारा चरम लक्ष्य है; इसके अतिरिक्त सब कुछ केवल श्रम है। 38 जो कुछ सूत्रों में समाविष्ट न हो या विनय में दिखाई न पड़े वह सब मेरे सिद्धान्त के प्रतिकूल है और उसे किसी भी प्रकार ग्रहण न करना चाहिए। 39 क्योंकि वह न तो धर्म है, न विनय, और न मेरे वचन; यद्यपि बहुत से लोग उसे कहते हों, तो भी अज्ञान-जन्य वचन की तरह उसे अस्वीकार करना चाहिए। 40 जो पवित्र हैं उनका उपदेश ग्राह्य है, क्योंकि वही है धर्म, विनय और मेरे वचन; और इसके अनुसार नही चलना गड्ढे में गिरना है। 41 इसलिए जो कुछ श्रद्धा के योग्य है वह संक्षेप से मेरे सूत्रों में कहा गया है। जो कोई उनके अनुसार चलता है, वह विश्वसनीय है, और इसे छोड़कर दूसरा कोई प्रमाण नही (= तस्मादृते नास्ति प्रमाणमन्यत्)। 42 मोह-वश अधर्म का प्रतिपादन करनेवाले धार्मिक शास्त्रों की उत्पत्ति होगी, मेरे इन सूक्ष्म विचारों के विषय में अज्ञान और अनिश्चय होने से, 43 या अज्ञान-मिश्रित विचारों के कारण या विभेदों का ज्ञान नही होने से, जैसे कि सोने के समान दिखाई पड़नेवाले पीतल से लोग ठगे जाते हैं। 44 इस प्रकार जो धर्म नही है, किन्तु धर्म का कपट-रूपमात्र, वह वञ्चना है, जिसकी उत्पत्ति होती है प्रज्ञा के अभाव से या तत्त्व को न समझ सकने के कारण। 45 इसलिए विनय एवं सूत्रों की सहायता से तुम्हें इसकी उचित रीति से (= न्यायतः) परीक्षा करनी चाहिए, जैसे कि सुनार सोने को तपाकर, काटकर और तार बनाकर परखता है। 46 वे मनुष्य बुद्धिमान् नहीं, जो शास्त्रों को नहीं जानते; वे अनुचित (अन्याय) मार्ग को उचित (न्याय) मार्ग समझते हैं और उचित मार्ग को अनुचित। 47 इसलिए शब्द और अर्थ के अनुसार ठीक-ठीक सुनकर इसे ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि जो कोई शास्त्र को अनुचित रीति से ग्रहण करता है वह अपने को ही क्षति पहुँचाता है, जैसे कि तलवार को अनुचित रीति से ग्रहण करनेवाला अपने को ही काटता है। 48 जो शब्द को ठीक ठीक नही समझता है उसके लिए अर्थ दुर्लभ हो जाता है, जैसे कि रात्रि काल में किसी आदमी के लिए उस घर को पाना (खोजना) कठिन हो जाता है, जहाँ वह पहले कभी न गया हो और जहाँ का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा हो। 49 जब अर्थ नष्ट हो जाता है तो धर्म (शास्त्र) नष्ट हो जाता है और धर्म के नष्ट होनेपर योग्यता (पात्रता) नष्ट हो जाती है; इसलिए वह बुद्धिमान् है जिसका चित्त अर्थ को ठीक ठीक समझता है।" 50 जब भगवान् ये वचन कह चुके, तब वह यथासमय पापानगर में गये, जहाँ मल्लों ने उनका पूरा सम्मान किया। 51 तब भगवान् ने अपने भक्त चुन्द के घर-उसी के लिए, न कि अपने सहारे के लिए-अन्तिम भोजन किया। 52 तब अपनी शिष्य-मण्डली के साथ भोजन कर चुकनेपर तथागत ने चुन्द को धर्मोपदेश दिया और फिर कुशीनगर चले गये। 53 इस तरह चुन्द के साथ उन्होंने इरावती नदी पार की और स्वयं उस नगर के एक उपवन में शरण ली, जहाँ कमलों का एक शान्त सरोवर था।⁹⁰ 54 उन्होंने, जो सोने के समान चमक रहे थे, हिरण्यवती नदी में स्नान किया और तब शोकाकुल आनन्द को, जो संसार का आनन्द (= लोकानन्द) था, इस प्रकार आदेश दिया:- 55 "आनन्द, इन जोड़े शाल-वृक्षों के बीच मेरे लेटने के लिए स्थान तैयार करो; आज रात्रि के उत्तर भाग में तथागत निर्वाण प्राप्त करेगा।" ⁹⁰- "इरावती" के अन्य वैकल्पिक रूप "अचिरावती" "अजिरावती" और "ऐरावती" हो सकते हैं। चीनी अनुवाद में "कुकु" शब्द है, जो पालि के "ककुत्था" के लिए आया है। बुद्धचरित 107