बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें56 जब आनन्द ने ये वचन सुने, तब आँसुओं से उसकी आँखें भर गई, उसने बुद्ध के लेटने के लिए स्थान तैयार किया और वैसा कर चुकनेपर, विलाप करते हुए उन्हें इसकी सूचना दी। 57 तब वह नर-श्रेष्ठ चिरनिद्रा के निमित्त तथा सब दुःखों का अन्त करने के लिए अपनी अन्तिम शय्या के समीप गये। 58 अपने शिष्यों के सम्मुख हाथीरूप उपधानपर शिर तथा एक पाँवपर दूसरा पाँव रखते हुए वह दाईं करवट लेट गये। 59 तब उस समय पक्षियों ने शब्द नहीं किया और वे (पक्षी) शिथिल-शरीर हो बैठे रहे, जैसे ध्यानावस्थित हों। 60 तब वृक्षों ने, जिनके पत्ते हवा से प्रेरित हुए बिना ही हिल रहे थे, विवर्ण फूल गिराये, मानो रो रहे हों। 61 जैसे दिवाकर के अस्ताचलपर आनेपर, पथिकों को विश्रामभूमि दिखाई पड़ती है, वैसे ही अन्तिम शय्यापर मुनि को देखकर उन्हें (शिष्यों को) शीघ्र ही उत्तम लक्ष्य दृष्टिगोचर हुआ। 62 तब अन्तिम विश्राम-भूमिपर पड़े हुए सर्वज्ञ ने अश्रु-आविल आनन्द से दयापूर्वक कहाः- 63 “मल्लों से, हे आनन्द, मेरे निर्वाण-प्राप्ति के समय के बारे में कहो; क्योंकि यदि वे निर्वाण न देखेंगे, तो पीछे बहुत पछतायेंगे।” 64 तब आँसुओं से मूर्छित होते आनन्द ने आज्ञा-पालन किया और मल्लों से कहा- “मुनि अन्तिम शय्यापर पड़े हुए हैं।” 65 तब उस समय आनन्द के वचन सुनकर, दुःख से अभिभूत हो, शोक करते हुए और आँखों से आँसू बहाते हुए वे नगर से ऐसे निकले, जैसे सिंह से डर से साँड़ पर्वत से निकल रहे हों। 66 आनन्द-रहित होने के कारण उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और पगों के संक्षोभ से उनके शिरोवस्त्र काँप रहे थे। तब वे उस उपवन में उन देवों के समान दुःखी होकर आये, जिनके पुण्य क्षीण हो गये हों। 67 इस तरह वहाँ आकर उन्होंने मुनि को देखा और देखने के बाद उन्हें प्रणाम करते समय उनके मुख आँसुओं से भर गये। सम्मान प्रकट करनेपर संतप्त हृदय से वे वहाँ खड़े रहे और मुनि ने उन्हें कहाः- 68 “आनन्द के समय शोक करना उचित नहीं। नैराश्य 'अस्थाने' है, शान्ति प्राप्त करो। वह अतिदुर्लभ लक्ष्य, जिसकी मैंने कल्पों से अभिलाषा की है, अब मेरे समीप आ गया है। 69 वह लक्ष्य अति उत्तम है, भूमि जल अनल-अनिल व शून्य-इन तत्त्वों से रहित है, सुखमय व अविकारी है, अतीन्द्रिय शान्त और अहार्य है, उदय एवं व्यय से रहित है। यह सुनकर शोक के लिए स्थान नहीं।
70 पूर्व में बोधि के समय गया में मैंने अकुशल जन्म के कारणों को सर्पों के समान काट डाला; किन्तु अतीत में एकत्र हुए कर्मों का यह निवास-गृह-यह शरीर-आज तक बचा हुआ है। 71 क्या मेरे लिए शोक करना उचित है जो तुम सब रो रहे हो, जब कि यह समष्टि-दुःख का महा-कोषगृह-व्यय को प्राप्त हो रहा है, जब कि जन्म का महाभय उन्मूलित हो रहा है और जब कि मैं महादुःख से विदा हो रहा हूँ?” 72 जब उन्होंने शाक्यमुनि को बादल की-सी आवाज में यह कहते सुना कि उनके लिए शान्ति (निर्वाण) प्राप्त करने का समय आ गया है, तब बोलने की इच्छा से उनके मुख विकसित हुए और उनमें से वृद्धतम ने ये वचन कहे:- 73 “क्या शोक करना उचित है जो तुम सब रो रहे हो? मुनि उस मनुष्य के समान हैं जो आग- लगे घर से बच निकला हो, और जब कि देवों के अधिपति भी इसे ऐसा ही समझें तब मनुजों का क्या कहना? 74 किन्तु इससे हमें दुःख हो रहा है कि शास्ता तथागत निर्वाण प्राप्तकर लेनेपर फिर दिखाई न पड़ेंगे; मरुभूमि में उत्तम पथ-प्रदर्शक के मरनेपर किसे अत्यन्त दुःख न होगा? 75 सोने की खान से दरिद्र होकर आनेवालों के समान वे लोग अवश्य ही उपहास के पात्र हैं जो महर्षि सर्वज्ञ गुरु का साक्षात् दर्शनकर सन्मार्ग (= विशेष) न प्राप्त करें।” 76 इस तरह मल्लों ने पुत्रवत् हाथ जोड़कर बहुत कुछ युक्ति-युक्त कहा और श्रेष्ठ महात्मा ने उत्तम- अर्थ-भरे शब्दों में परम श्रेय एवं शान्ति के उद्देश से यों उत्तर दियाः- 77 “सच तो यह है कि कठोर योगाचार के बिना केवल मेरे दर्शन से ही मुक्ति (निर्वाण) नहीं मिलती; जो कोई मेरे इस धर्म को ठीक-ठीक समझता है वह मेरे दर्शन के बिना भी दुःख के जाल से मुक्त हो जाता है। 78 जैसे कोई मनुष्य ओषधि-सेवन किये बिना केवल वैद्य को देखकर ही रोगमुक्त नहीं हो जाता, वैसे ही जो कोई मेरे इस धर्म की भावना नहीं करता वह मेरे दर्शन से ही दुःख-मुक्त नहीं हो जाता है। 79 इस जगत् में मेरे धर्म को देखनेवाला संयतात्मा मनुष्य दूरवर्ती होनेपर भी मुझे देखता है; और जो श्रेय-परायण नहीं है वह मेरे बगल में रहकर भी बहुत दूर में रहता है। 80 इसलिए सदा आलस्य-रहित (वीर्यवान्) रहो और मन को वश में रक्खो; परिश्रमपूर्वक श्रेयस्कर कार्य करो, क्योंकि हवा में जलती दीप-शिखा के समान जीवन चञ्चल और महादुःख के वशीभूत है।” 81 इस तरह मुनि द्वारा, श्रेष्ठ प्राणी द्वारा, उपदिष्ट होकर वे, जिनके चित्त संतप्त थे और जिनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, अनिच्छा एवं दीनतापूर्वक कुशीनगर की ओर लौट गये, जैसे प्रतिकूल धारा में नदी का मध्य भाग पार कर रहे हों। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “निर्वाण-पथपर” नामक 25वाँ सर्ग समाप्त ॥
108 अश्वघोष