भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

छब्बीसवाँ सर्ग

महापरिनिर्वाण

1 तब त्रिदण्डी सुभद्र ने, जो सद्गुणों से सम्यक् युक्त था और जो किसी जीव को क्लेश नही देता था, भिक्षु होकर निर्वाण प्राप्त करने के उद्देश से मुनि को देखना चाहा। अतः उसने सबको आनन्दित करनेवाले आनन्द से कहा:— 2 “मैंने सुना है कि मुनि की निर्वाण-प्राप्ति की घड़ी (वेला) आ गई है और इसलिए मैं उन्हें देखना चाहता हूँ; क्योंकि इस जगत् में प्रतिपदा के चाँद के समान परम धर्म में प्रवेश पाये हुए का दर्शन दुर्लभ है। 3 मैं आपके विनायक को देखना चाहता हूँ, जो सब दुःखों के अन्त की ओर जानेवाले हैं; बादलों में छिपकर डूबते हुए सूरज के समान वह मेरे देखे बिना ही व्यय (अस्त) को प्राप्त न हों।” 4 धर्म-पिपासा के बहाने यह परिव्राजक विवाद करने आया है, इस विचार से आनन्द का चित्त भावाविष्ट हो गया; और अश्रु-पूर्ण मुख से उसने कहा, “यह (उपयुक्त) समय नही।” 5 तब, परिव्राजक की दृष्टि (फूल की) पंखुड़ी के समान विकसित हो रही है, यह देखकर मनुष्यों के आशय जाननेवाले चन्द्रोज्ज्वल मुनि ने कहा, “हे आनन्द द्विज को न रोको, क्योंकि मेरा जन्म जगत् के हित के लिए हुआ था।” 6 तब आश्वस्त एवं परम प्रसन्न होकर सुभद्र श्रेय-विधायक श्रीघन के समीप गया; और अवसर के अनुकूल शान्त भाव से उन्हें अभिवादन कर उसने ये वचन कहे:— 7 “कहा जाता है कि आपने निर्वाण-मार्ग प्राप्त किया है जो मेरे जैसे दार्शनिकों (=परीक्षक) के (मोक्ष-) मार्ग से भिन्न है; अतः मुझसे इसकी व्याख्या कीजिए, क्योंकि मैं इसे ग्रहण करना चाहता हूँ। आपको देखने की मेरी इच्छा का कारण स्नेह है, न कि विवाद करने की चाह।” 8 तब समीप आये द्विज से बुद्ध ने अष्टाङ्गिक मार्ग की व्याख्या की और उसने इसे ध्यानपूर्वक सुना, जैसे कि मार्ग से भटका हुआ मनुष्य सही आदेश को ध्यानपूर्वक सुनता है, और उसने इसपर .... ..... अच्छी तरह विचार किया। 9 तब उसने देखा कि जिन रास्तों पर पहले वह चला था उनपर चलने से श्रेय प्राप्त नही होता है, और अदृष्टपूर्व मार्ग प्राप्तकर उसने दूसरे रास्तों का परित्याग किया जो कि हृदय के अन्धकार से युक्त हैं। 10 क्योंकि उन मार्गों पर, कहते हैं, रजस्-युक्त तमस् प्राप्त करने से अकुशल कर्म एकत्र होते हैं, और सत्त्व-युक्त रजस् द्वारा कुशल कर्म बढ़ते हैं।


11 विद्या, बुद्धि व प्रयत्न द्वारा सत्त्व की वृद्धि होने से तथा रजस् व तमस् का तिरोभाव होने से कर्म-फल का नाश होने के कारण कर्म-फल क्षीण हो जाता है (ऐसा वे कहते हैं), और उस कर्म-शक्ति को, जिसे वे मानते हैं, स्वभाव का परिणाम कहते हैं। 12 संसार में चित्त को मोह में डालनेवाले रजस् और तमस् का कारण वे स्वभाव बताते हैं। क्योंकि स्वभाव नित्य माना जाता है इसलिए वे दोनों (रजस् और तमम्) भी नित्य हैं, और उनका अभाव नही हो सकता। 13 यदि किसी व्यक्ति के सत्त्वयुक्त होनेपर उन दोनों का अभाव हो भी जाय, तो काल-वश उनका फिर प्रादुर्भाव होगा, जैसे कि पानी, जो रात को धीरे-धीरे बर्फ बन जाता है, काल-क्रम से फिर अपनी स्वाभाविक अवस्था को लौट जाता है। 14 क्योंकि सत्त्व स्वभावतः नित्य है, इसलिए विद्या, बुद्धि व प्रयत्न इसे बढ़ा नही सकते; और क्योंकि इसकी वृद्धि नही होती, इसलिए उन दोनों का नाश नही होता और क्योंकि उनका नाश नही होता, इसलिए (उन मार्गों पर चलने से) नैष्ठिक शान्ति नही होती। 15 पहले उसका मत था कि जन्म स्वभाव से होता है, अब उसने देखा कि उस मत में (वस्तुतः) मोक्ष नही है; क्योंकि यदि जीवन स्वाभाविक है, तो मोक्ष वैसे ही असम्भव है जैसे कि प्रज्वलित अग्नि से निकलते हुए प्रकाश को रोकना। 16 बुद्ध के मार्ग को सत्य देखकर उसने संसार को इच्छा पर आश्रित समझा, इच्छा का नाश होनेपर शान्ति (= शम) मिलती है, क्योंकि कारण का विनाश होने से कार्य का भी विनाश होता है। 17 पहले उसका मत था कि आत्मा शरीर से भिन्न है और विकारवान् (परिवर्तनशील) नही है, अब मुनि के वचन सुनने से उसने जाना कि जगत् अनात्म है और (जगत्) आत्मा का परिणाम नही है। 18 यह जानकर कि जन्म अनेक धर्मों के पारस्परिक सम्बन्ध पर आश्रित है, और कुछ भी अपने पर आश्रित नही है, उसने देखा कि प्रवृत्ति दुःख है और निवृत्ति है दुःख से मुक्ति। 19 संसार को एक परिणाम समझकर उसने प्रलय का सिद्धान्त छोड़ा, और संसार का व्यय होता है, यह जानकर उसने नित्यता का मत धैर्यपूर्वक शीघ्र ही छोड़ा। 20 महामुनि का उपदेश सुनकर और ग्रहण कर, उसने अपने पूर्व मतों का तुरत परित्याग किया; क्योंकि उसने पहले ही अपने को तैयार कर लिया था, जिससे सद्धर्म में वह शीघ्र ही लग गया। 21 उसका चित्त श्रद्धा-युक्त हो गया और परम (धर्म) को पाकर उसने शान्त और अविकारी पद प्राप्त किया; और इसलिए, वहाँ लेटे हुए मुनि की ओर कृतज्ञतापूर्वक देखते हुए, उसने यह निश्चय किया:—

बुद्धचरित 109