बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें22 “मेरे लिए यह उचित नही कि यहाँ रहकर मैं पूज्य एवं श्रेष्ठ शास्ता की निर्वाण-प्राप्ति देखूँ; करुणामय शास्ता की निर्वाण-प्राप्ति से पूर्व ही मैं स्वयं सीधे नैष्ठिक अन्त को प्राप्त होऊँगा।” 23 तब मुनि को प्रणाम कर, वह साँप की तरह निश्चल हो गया और हवा से विलीन हुए बादल के समान एक ही क्षण में निर्वाण की शान्ति में प्रविष्ट हुआ। 24 तब संस्कार के जाननेवाले मुनि ने उसके दाह-संस्कार के लिए यह कहते हुए आदेश दिया, “उत्तम शिष्यवाले महामुनि का यह अन्तिम शिष्य अन्त को प्राप्त हुआ।” 25 जब रात का पूर्व भाग बीत गया, चन्द्रमा ने ताराओं का प्रकाश ग्रस लिया, और उपवन ऐसे नीरव हो गये जैसे सोये हुए हों, तब महाकारुणिक ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया:- 26 “मेरे उस पार चले जानेपर तुम्हें प्रातिमोक्ष को अपना आचार्य, अपना प्रदीप और अपना कोष समझना चाहिए। वही तुम्हारा उपदेशक है, जिसके अधीन तुम्हें रहना चाहिए और तुम्हें इसकी आवृत्ति करनी चाहिए, जैसे कि मेरे जीवन-काल में करते थे।⁹¹ 27 शारीरिक और वाणी के कर्मों की शुद्धि के लिए सब सांसारिक कार्यों (= व्यवहार) को छोड़ो तथा भूमि, जीव, अन्न और कोष आदि लेने से (= √ग्रह) वैसे ही बचो जैसे कि आग पकड़ने से (= √ग्रह)। 28 पृथ्वी पर जो कुछ पैदा होता है उसे काट गिराने से, धरती को खोदने व जोतने से तथा ओषधि एवं ज्योतिष (के व्यवसाय) से विरत रहना जीविका का उचित उपाय है। 29 घटक (मध्यस्थ) का ज्ञान प्राप्त करने में, तन्त्र-मन्त्र के प्रयोग में, कुटिल एवं कपटी होने में या शास्त्र-सम्मत सिद्धियों में, न संयम है न संतोष और न जीवन ही। 30 इस प्रकार प्रातिमोक्ष शील का सार है, मुक्ति का मूल है; इससे समाधि, समस्त ज्ञान एवं अन्तिम लक्ष्य प्राप्त होते हैं। 31 इसलिए वही धर्मवान् है जिसका शील विशुद्ध व अखण्ड है, अविच्छिन्न व अविनष्ट है, क्योंकि शील ही सद्गुणों का आश्रय है। 32 शील के अक्षुण्ण व विशुद्ध रहनेपर इन्द्रिय चञ्चल नहीं रहते; क्योंकि जैसे लाठी लेकर पशुओं को फसल से दूर रखते हैं वैसे ही दृढ़तापूर्वक छः इन्द्रियों की (विषयों से) रक्षा (= संवरण) करनी चाहिए। 33 विषयों के बीच इन्द्रियरूपी घोड़ों को (स्वतन्त्र) छोड़नेवाला मनुष्य (सन्मार्ग से) बहकता है और उन (विषयों) से तृप्ति नही पाता है। कुमार्ग-गामी घोड़ों के कारण मार्ग-भ्रष्ट हुए के समान वह उनके कारण विपत्ति भोगता है। 34 इस जगत् में कुछ लोग महाशत्रुओं के हाथ में पड़कर दारुण दुःख भोगते हैं, किन्तु मोहवश विषयों के वशीभूत होनेवाले लोग विवश होकर इस जन्म में और जन्मान्तरों में दुःख के अधीन होते हैं। 35 अतः इन्द्रियों से वैसे ही दूर रहना चाहिए, जैसे कि बुरे (=विषम) विपक्षी राजाओं से; क्योंकि इस जगत् में इन्द्रिय-सुख भोगने के बाद मनुष्य जगत् में इन्द्रियों के जल्लाद को देखता है। 36 संसार में बाघ, साँप, जलती आग या शत्रु से उतना नही डरना चाहिए जितना कि अपने ही चञ्चल चित्त से, जो मधु को देखता है किन्तु खतरे को नही।⁹² 37 लोहे के अङ्कुश से अनियन्त्रित मतवाले हाथी के समान या वृक्षों पर कूदनेवाले शाखामृग के समान चित्त स्वेच्छानुसार सब दिशाओं में घूमता रहता है; इसे चञ्चलता का अवसर ही न देना चाहिए। 38 चित्त के स्वतन्त्र रहनेपर शान्ति नही मिलती, किन्तु इसके स्थिर होनेपर कार्य पूरा होता है। इसलिए यथाशक्ति यत्न करो जिससे तुम्हारे ये चित्त चञ्चलता से विरत हो जायँ। 39 ओषधि की मात्रा के समान भोजन की उचित मात्रा का पालन करो, और इससे अनुराग या घृणा न करो, उतना ही खाओ जितना कि क्षुधा-शान्ति और शरीर-रक्षा के लिए आवश्यक है।⁹³ 40 जैसे उद्यान में रस-पान करते हुए भौंरे फूलों को नष्ट नही करते, वैसे ही अन्य मतावलम्बियों का विनाश नही करते हुए (अन्य मतावलम्बी गृहस्थों के लिए भार-स्वरूप नही होते हुए) उचित समयपर भिक्षाटन करो।⁹⁴ 41 अत्यन्त भारी बोझ नही रखना चाहिए, यह नियम बैल और दाता दोनों के लिए ही लागू है, इस संसार में अत्यन्त भारी बोझ से दबकर बैल गिर पड़ता है और जो हाल बैल का है वही दाता का भी।⁹⁵ 91- प्रातिमोक्ष = भिक्षु-जीवन के पापनिशेधक नियम। 92- “यथा पश्यति मध्वेव न प्रपातमवेक्षते।”—सौन्दरनन्द ग्यारह 29। 93- “भोजने भव मात्राज्ञ ”—सौन्दरनन्द 14.1 भोजन और नींद के लिए देखिये—सौन्दरनन्द सर्ग 14 94- “यथापि भ्रमरो पुष्पं वण्णगन्धं अहेठयं। पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे॥”—धम्मपद 4.6 “जिस प्रकार फूल के वर्ण या गन्ध को बिना हानि पहुँचाये भ्रमर रस को लेकर चल देता है, उसी प्रकार मुनि गाँव में विचरण करे।” 95 - पूर्वार्ध का अनुवाद स्वतन्त्र है और उत्तरार्ध का चीनी अनुवाद के आधार पर। 110 अश्वघोष