भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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तब माता के समान प्रभावशालौ मौसी ने सुर-सन्तान-तुल्य कुमार को वैसे ही भाव और स्नेह से अपने पुत्र के समान पाला ॥19॥ ततः स बालार्क इवोदयस्थः समीरितो वह्निरिवानिलेन । क्रमेण सम्यग्ववृधे कुमारस्ताराधिपः पक्ष इवातमस्के ॥२.२० तब उदयाचल पर स्थित सूर्य के समान, हवा से प्रेरित अग्नि के समान और शुक्ल-पक्ष के चन्द्रमा के समान कुमार धीरे-धीरे अच्छी तरह बढ़ने लगा ॥20॥ ततो महार्हाणि च चन्दनानि रत्नावलीश्रौषधिभिः सगर्भाः । मृगप्रयुक्तांश्चरथांश्च हैमानानाचक्रिरेऽस्मै सुहृदालयेभ्यः ॥२.२१ वयोऽनुरूपाणि च भूषणानि हिरण्मयान् हस्तिमृगाश्वकांश्च । रथांश्च गोपुत्रकसंप्रयुक्तान् पुत्रीश्च चामीकररूप्यचित्राः ॥२.२२ तब उसके लिए लोग बहुमूल्य चन्दन, ओषधियों से भरे रत्न-हार, मृग-युक्त छोटे-छोटे स्वर्ण रथ, वयस के अनुरूप भूषण, सोने के बने छोटे-छोटे हाथी, मृग और घोड़े, गो-वत्स-युक्त रथ, तथा चाँदी-सोने से रङ्ग- विरङ्गी पुतलियाँ मित्रों के घरों से ले आये ॥21-22॥ एवं स तैस्तैर्विषयोपचारैर्वयोऽनुरूपै रुपचर्यमाणः । बालोऽप्यबालप्रतिमो बभूव धृत्या च शौचेन धिया श्रिया च ॥२.२३ वयस के अनुरूप उन-उन विषयों से इस प्रकार सेवित होता हुआ वह बालक होनेपर भी धैर्य, पवित्रता, बुद्धि और विभूति में बालक नही था ॥23॥ वयश्च कौमारमतीत्य सम्यक् सम्प्राप्य काले प्रतिपत्तिकर्म । अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्या जग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः ॥२.२४ कुमारावस्था बीतनेपर, समय पर उसका (उपनयन-) संस्कार विधिवत् हुआ और अपने कुल के अनुरूप विद्याएँ, जो बहुत वर्षों में सीखी जाती हैं, उसने कुछ ही दिनों में सीख लीं ॥24॥ नैःश्रेयसं तस्य तु भव्यमर्थं श्रुत्वा पुरस्तादसितान्महर्षेः । कामेषु सङ्गं जनयाम्बभूव वनानि यायादिति शाक्यराजः ॥२.२५ शाक्य-राज ने महर्षि असित से पहले ही उसका परम कल्याण-प्रद भविष्य सुना था; इसलिए उसने विषयों में उसकी आसक्ति उत्पन्न की, जिससे वह वन को न जाय ॥25॥ कुलात्ततोऽस्मै स्थिरशीलयुक्तात्साध्वीं वपुर्ह्रीविनयोपपन्नाम् । यशोधरां नाम यशोविशालां वामाभिधानां श्रियमाजुहाव ॥२.२६ तब स्थायी शीलवाले कुल से यशोधरा नामक कन्यारूपी लक्ष्मी को उसके लिए बुलाया। वह यशस्विनी और साध्वी थी। रूप, लज्जा और विनय से युक्त थी ॥26॥ विद्योतमानो वपुषा परेण सनत्कुमारप्रतिमः कुमारः । सार्धं तया शाक्यनरेन्द्रवध्वा शच्या सहस्राक्ष इवाभिरेमे ॥२.२७

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सनत्कुमार के समान अत्यन्त सुन्दर आकृति से चमकते कुमार ने शाक्यराज की उस वधू के साथ वैसे ही रमण किया, जैसे इन्द्र शची के साथ ॥27॥ किञ्चिन्मनः क्षोभकरं प्रतीपं कथं न पश्येदिति सोऽनुचिन्त्य । वासं नृपो व्यादिशति स्म तस्मै हर्म्योदरेष्वेव न भूप्रचारम् ॥२.२८ मन को क्षुब्ध करनेवाला कुछ भी प्रतिकूल वह (कुमार) कैसे न देखे-ऐसा सोचकर राजा ने उसके लिए महलों के भीतर रहने का आदेश दिया, पृथ्वी पर घूमने का नही ॥28॥ ततः शरत्तोयदपाण्डरेषु भूमौ विमानेष्विव रञ्जितेषु । हर्म्येषु सर्वर्तुसुखाश्रयेषु स्त्रीणामुदारैर्विजहार तूर्यैः ॥२.२९ तब शरत्काल के मेघ के समान श्वेत तथा पृथ्वी पर उतरे विमानों (=देवप्रासादों) के समान रञ्जित महलों में, जो सब ऋतुओं में सुखदायी थे, उसने स्त्रियों के उदार तूर्य-वाद्यों से मनोविनोद किया ॥29॥ कलैर्हि चामीकरबद्धकक्षैर्नारीकराग्राभिहतैर्मृदङ्गैः । वराप्सरोनृत्यसमैश्च नृत्यैः कैलासवत्तद्भवनं रराज ॥२.३० जिनके अब्वल सुवर्ण से बँधे थे और जो स्त्रियों की अङ्गुलियों से बजाये जा रहे थे उन मृदङ्गों से, (उनकी) मधुर ध्वनि से और उत्तम अप्सराओं के नृत्य के समान नृत्य से, वह भवन कैलास के समान शोभित हुआ ॥30॥ वाग्भिः कलाभिर्ललितैश्च हावैर्मदैः सखेलैर्मधुरैश्च हासैः । तं तत्र नार्यो रमयाम्बभूवुर्भ्रूवञ्चितैश्चौन्नितैर्निरक्षितैश्च ॥२.३१ मीठी बोली से, ललित हाथ-भाव से, क्रीड़ापूर्ण मद (=मदत्ता) से, मधुर हाथ से, भ्रू-भङ्गों से और कटाक्षों से, नारियों ने उसे वहाँ आनन्दित किया ॥31॥ ततः स कामाश्रयपण्डिताभिः स्त्रीभिर्गृहीतो रतिकर्कशाभिः । विमानपृष्ठान्न महीं जगाम विमानपृष्ठादिव पुण्यकर्मा ॥२.३२ तब कामोद्दीपन में निपुण तथा रति में दृढ़ स्त्रियों से गृहीत होकर, वह महल पर से भूतल पर नही आया, जैसे पुण्य कर्मवाला (व्यक्ति) स्वर्ग से (नीचे नही उतरता है) ॥32॥ नृपस्तु तस्यैव विवृद्धिहेतोस्तद्भाविनाथैन च चोद्यमानः । शमेऽभिरेमे विरराम पापाद्भजे दमं संविबभाज साधून् ॥२.३३ पुत्र की बढ़ती के लिए और उसके (उत्तम) भविष्य से प्रेरित होता राजा शम में आनन्दित हुआ और पाप से विरत हुआ, (इन्द्रिय-) दमन का आश्रय लिया और साधुओं के बीच धन बाँटा ॥33॥ नाधीरवत्तामसुखे ससञ्जे न संररञ्जे विषमं जनन्याम् । धृत्येन्द्रियाश्वांश्चपलाग्विजिग्ये बन्धूंश्च पौरांश्च गुणैर्जिगाय ॥२.३४