बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके राज्य में गाएँ बहुत थीं। वे पुष्ट व सन्तुष्ट, साध्वी और निर्मल, उत्तम तथा बहुत दूध देनेवाली और उन्नत बछड़ों से युक्त थीं ॥5॥ मध्यस्थतां तस्य रिपुर्जगाम मध्यस्वभावः प्रययौ सुहृत्त्वम्। विशेषतो दार्ढ्यमियाय मित्रं द्वावस्य पक्षावपरस्तु नास ॥२.६ उसका शत्रु मध्यस्थ (= निष्पक्ष), मध्यस्थ मित्र, और मित्र विशेषतः दृढ़ हो गया। उसके दो ही पक्ष रहे, तीसरा पक्ष (शत्रु) नही रहा ॥6॥ तथास्य मन्दानिलमेघशब्दः सौदामिनीकुण्डलमण्डिताभ्रः। विनाश्मवर्षाशनिपातदोषैः काले च देशे प्रवर्ष देवः ॥२.७ और उसके लिए (वृष्टि-) देव ने, जिनके बादल विद्युन्मण्डल से मण्डित थे, मन्द अनिल और मेघ-गर्जन के साथ अश्म-वर्षा और वज्रपात के दोषों के बिना ही (उचित) समय और स्थान पर वृष्टि की ॥7॥ रुरोह सस्यं फलवद्यथर्तु तदाकृतेनापि कृषिश्रमेण। ता एव चास्यौषधयो रसेन सारेण चैवाभ्यधिका बभूवुः ॥२.८ (अति) कृषि-श्रम किये बिना ही फल-युक्त सस्य उचित ऋतु में बढ़ा। और, उसके लिये वे ही ओषधियाँ रस एवं सार से खूब भर गईं ॥8॥ शरीरसन्देहकरेऽपि काले सङ्ग्रामसम्मर्द इव प्रवृत्ते। स्वस्थाः सुखं चैव निरामयं च प्रजज्ञिरे कालवशेन नार्यः ॥२.९ यद्यपि (प्रसव-) काल शरीर के लिए उतना ही सन्देह-जनक (विपत्तिपूर्ण) है जितना कि युद्ध-सङ्घर्ष, तथापि स्त्रियों ने स्वस्थ रहते हुए, सुखपूर्वक और बिना किसी रोग के समय पर प्रसव किया ॥9॥ पृथग्व्रतिभ्यो विभवेऽपि गर्हे न प्रार्थयन्ति स्म नराः परेभ्यः। अभ्यर्थितः सूक्ष्मधनोऽपि चार्यस्तदा न कश्चिद्विमुखो बभूव ॥२.१० व्रतियों को छोड़कर (अन्य) लोगों ने, चाहे उनका विभव कितना ही तुच्छ क्यों न हो, दूसरों से कुछ नही माङ्गा। और साथ ही कोई भी आर्य (सज्जन), चाहे उसका धन कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, माङ्गे जानेपर विमुख नही हुआ ॥10॥¹⁶ नागौरवो बन्धुषु नाप्यदाता नैवानृतो नानृतिको न हिंस्रः। आसीत्तदा कश्चन तस्य राज्ये राज्ञो ययातेरिव नाहुषस्य ॥२.११ उस समय उसके राज्य में, जैसे नहुष के पुत्र ययाति के राज्य में बन्धुओं का असम्मान करनेवाला, अदाता, अव्रती, झूठ, और हिंसक कोई नही था ॥11॥¹⁷ उद्यानदेवायतनाश्रमाणां कूपप्रपापुष्करिणीवनानाम्। चक्रुः क्रियास्तत्र च धर्मकामाः प्रत्यक्षतः स्वर्गमिवोपलभ्य ॥२.१२ धर्म के अभिलाषियों ने स्वर्ग का मानो प्रत्यक्ष दर्शन कर उद्यान, देव-मन्दिर, आश्रम, कूप, पनसाले, पोखर और उपवन बनाये ॥12॥ मुक्तश्च दुर्भिक्षभयामयेभ्यो हृष्टो जनः स्वर्ग इवाभिरेमे। पत्नीं पतिर्वा महिषीं पतिं वा परस्परं न व्यभिचेरतुश्च ॥२.१३ दुर्भिक्ष भय और रोग से मुक्ति होने के हर्ष में लोग ऐसे सुखी थे, जैसे स्वर्ग में। पति ने पत्नी के विरुद्ध या पत्नी ने पति के विरुद्ध सदाचार भङ्ग नही किया अर्थात् दोनों एक दूसरे के प्रति सच्चे रहे ॥13॥ कश्चित्सिषेवे रतये न कामं कामार्थमर्थं न जुगोप कश्चित्। कश्चिद्धनार्थं न चचार धर्मं धर्माय कश्चिन्न चकार हिंसाम् ॥२.१४ किसी ने रति के लिए काम का सेवन नही किया, किसी ने काम (-सेवन) के लिए धन की रक्षा नही की। किसी ने धन के लिए धर्माचरण नही किया, किसी ने धर्म के लिए हिंसा नही की ॥14॥ स्तेयादिभिश्चाप्यरिरिभश्च नष्टं स्वस्थं स्वचक्रं परचक्रमुक्तम्। क्षेमं सुभिक्षं च बभूव तस्य पुरानरण्यस्य यथैव राष्ट्रे ॥२.१५ शत्रुता और चोरी-आदि नष्ट हो गई। उसका राज्य स्वस्थ, स्वतन्त्र, विदेश के शासन से मुक्त, सुखी और अन्न से भरा था, जैसे प्राचीन काल में अनरण्य का राज्य ॥15॥ तदा हि तज्जन्मनि तस्य राज्ञो मनोरिवादित्यसुतस्य राज्ये। चचार हर्षः प्रणनाश पाप्मा जज्वल धर्मः कलुषः शशाम ॥२.१६ तब उसके जन्म में उस राजा के राज्य में, जैसे सूर्य-पुत्र मनु के राज्य में, मलिनता मिटी और हर्ष का संचार हुआ, पाप नष्ट हुआ और धर्म प्रज्वलित हुआ ॥16॥ एवंविधा राजकुलस्य संपत्सर्वार्थसिद्धिश्च यतो बभूव। ततो नृपस्तस्य सुतस्य नाम सर्वार्थसिद्धोऽयमिति प्रचक्रे ॥२.१७ राजकुल की ऐसी सम्पद् और सब अर्थों की सिद्धि हुई, इसीलिए राजा ने अपने पुत्र का नाम रखते हुए कहा– “यह सर्वार्थसिद्ध है” ॥17॥ देवी तु माया विबुधर्षिकल्पं दृष्ट्वा विशालं तनयप्रभावम्। जातं प्रहर्षं न शशाक सोढुं ततो निवासाय दिवं जगाम ॥२.१८ अपने पुत्र का प्रभाव देवर्षि का-सा विशाल देखकर, देवी माया (हृदय में) उत्पन्न हर्ष को न रोक सकी और रहने के लिए स्वर्ग चली गई ॥18॥ ततः कुमारं सुरगर्भकल्पं स्नेहेन भावेन च निर्विशेषम्। मातृष्वसा मातृसमप्रभावा संवर्धयामासत्मजवद्बभूव ॥२.१९ ¹⁶- व्रती = संन्यास-धर्म के नियम पालन करनेवाले। ¹⁷- अव्रती = धर्म के नियम पालन नहीं करनेवाला। [बुद्धचरित 11]