भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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सच्चा ज्ञान प्राप्त किये हुए उस मुनि (असित) ने अपनी बहिन के पुत्र को देखा और अनुकम्पा-वश प्रिय पुत्र के समान उसे मुनि (बुद्ध) का वचन सुनने के लिए तथा उसके विचारानुसार चलने के लिए नियुक्त किया ॥81 ॥ नरपतिरपि पुत्रजन्मतुष्टो विषयमतानि विमुच्य बन्धनानि । कुलसदृशमचीकरद्यथावत्प्रियतनयस्तनयस्य जातकर्म ॥१.८२ पुत्र-जन्म से सन्तुष्ट होकर राजा ने भी देश के सभी बन्धनों (=कैदियों) को छोड़ दिया और उस पुत्र-स्नेही ने पुत्र का जात-कर्म कुल के अनुकूल ही उचित रीति से कराया ॥82 ॥ दशसु परिणतेष्वहःसु चैव प्रयतमनाः परया मुदा परीतः । अकुरुत जपहोममङ्गलाद्याः परमभवाय सुतस्य देवतेज्याः ॥१.८३ दस दिन पूरे होनेपर परम प्रसन्न होकर, उस संयमी ने पुत्र के परम कल्याण के लिए जप, होम और मङ्गल-कर्म आदि के साथ देवयज्ञ किये ॥83 ॥ अपि च शतसहस्रपूर्णसङ्ख्याः स्थिरबलवत्तनयाः सहेमशृङ्गीः । अनुपगतजराः पयस्विनीर्गाः स्वयमददात्सुतवृद्धये द्विजेभ्यः ॥१.८४ और भी, एक लाख पयस्विनी गाएँ जो वृद्धा नहीं हुई थीं, जिनके सींग सोने से मढ़े थे, और जिनके बछड़े दृढ़ बलवान् थे, पुत्र की बढ़ती के लिए स्वयं द्विजों को दीं ॥84 ॥ बहुविधविषयास्ततो यतात्मा स्वहृदयतोषकरीः क्रिया विधाय । गुणवति नियते शिवे मुहूर्ते मतिमकरोन्मुदितः पुरप्रवेशे ॥१.८५ उस संयतात्मा ने अपने हृदय को सन्तोष देनेवाली भाँति-भाँति की क्रियाएँ कीं और गुण-युक्त मङ्गल मुहूर्त नियत होनेपर, प्रसन्न होकर उसने नगर मे प्रवेश करने का विचार किया ॥85 ॥ द्विरदरदमयीमथो महार्हा सितसितपुष्पभृतां मणिप्रदीपाम् । अभजत शिविकां शिवाय देवी तनयवती प्रणिपत्य देवताभ्यः ॥१.८६ उस पुत्रवती देवी ने मङ्गल के लिए देवताओं को प्रणाम किया और वह हाथी-दाँत की बनी बहुमूल्य पालकी पर, जो उजले-उजले फूलों से भरी थी और जिसमें मणि-प्रदीप जल रहे थे, चढ़ी ॥86 ॥ पुरमथ पुरतः प्रवेश्य पत्नीं स्थविरजनानुगतामपत्यनाथाम् । नृपतिरपि जगाम पौरसङ्घैर्दिवममरैर्मघवानिवार्च्यमानः ॥१.८७ वृद्धाओं और पुत्र के साथ पत्नी को आगे से पुर में प्रवेश कराकर, राजा भी वहाँ गया। पुरवासियों ने उसकी उसी तरह पूजा की, जैसे स्वर्ग में (प्रवेश करने पर) इन्द्र की देवताओं ने ॥87 ॥ भवनमथ विगाह्य शाक्यराजो भव इव षण्मुखजन्मना प्रतीतः । इदमिदमिति हर्षपूर्णवक्त्रो बहुविधपुष्टियशस्करं व्यधत्त ॥१.८८ महल में प्रवेश करने पर, शाक्य-राज वैसे ही आनन्दित हुआ, जैसे कार्तिकेय के जन्म से शिव। प्रसन्न मुख होकर "यह करो, यह करो" कहते हुए राजा ने वह सब कराये, जिनके तरह-तरह की बढ़ती और यश होता है ॥88 ॥ इति नरपतिपुत्रजन्मवृद्ध्या सजनपदं कपिलाह्वयं पुरं तत् । धनदपुरमिवाप्सरोऽवकीर्ण मुदितमभून्नलकूबरप्रसूतौ ॥१.८९ राज-कुमार के समृद्धिकारी जन्म से कपिल के नाम का वह नगर जनपद के साथ इस प्रकार प्रमुदित हुआ, जैसे नलकूबर के जन्म में अप्सराओं से भरा कुबेर का नगर ॥89 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये भगवत्प्रसूतिर्नाम प्रथमः सर्गः ॥१ ॥ द्वितीय सर्ग अन्तःपुर विहार आ जन्मनो जन्मजरान्तकस्य तस्यात्मजस्यात्मजितः स राजा । अहन्यहन्यर्थगजार्थमित्रैर्वृद्धिं ययौ सिन्धुरिवाम्बुवेगैः ॥२.१ जन्म और जरा के विनाशक उस आत्म-विजयी पुत्र के जन्म (-समय) से वह राजा दिन-दिन धन से, हाथी- घोड़ों से और मित्रों से उसी तरह बढ़ने लगा, जैसे जल-प्रवाहों से नदी ॥1 ॥ धनस्य रत्नस्य च तस्य तस्य कृताकृतस्यैव च काञ्चनस्य । तदा हि नैकान्स निधीनवाप मनोरथस्याप्यतिभारभूतान् ॥२.२ क्योंकि तब धन, विविध रत्न, तथा बने और नही बने सोने की अनेक निधियाँ उसने पाईं, जो मनोरथ के लिए भी भार-स्वरूप थीं ॥2 ॥ ये पद्मकल्पैरपि च द्विपेन्द्रैर्न मण्डलं शक्यमिहाभिनेतुम् । मदोत्कटा हैमवता गजास्ते विनापि यत्नादुपतस्थुरेनम् ॥२.३ हिमालय के मतवाले हाथी, जो पद्म-सदृश गजेन्द्रों द्वारा भी यहाँ नही लाये जा सकते थे, अनायास ही उसकी सेवा में उपस्थित हुए ॥3 ॥ नानाङ्गचिह्नैर्नवहेमभाण्डैर्विभूषितैर्लम्बसटैस्तथाश्वैः । सञ्चुक्षुभे चास्य पुरं तुरङ्गैर्बलेन मैत्र्या च धनेन चाप्तैः ॥२.४ और, नाना चिह्नों नव-सुवर्ण-भाण्डों और भूषणों से युक्त तथा लम्बे केसरवाले घोड़ों से, जो (सैन्य-) बल, मित्रता एवं धन द्वारा प्राप्त हुए थे, उसका नगर क्षुब्ध हुआ ॥4 ॥¹⁵ पुष्टाश्च तुष्टाश्च तथास्य राज्ये साध्व्योऽरजस्का गुणवत्पयस्काः । उदग्रवत्सैः सहिता बभूवुर्बह्व्यो बहुक्षीरदुहश्च गावः ॥२.५ ¹⁵- भाण्ड = अश्व-आभरण, घोड़े का अलंकार । 10 अश्वघोष