बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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वाम स्तम्भ
इत्यागतावेगमनिष्ठबुद्ध्या बुद्ध्वा नरेन्द्रं स मुनिर्बभाषे । मा भून्मतिस्ते नृप काचिदन्या निःसंशयं तद्यदवोचमस्मि ॥१.६७ अनिष्ट की आशङ्का से राजा आवेग में आ गया है, ऐसा समझकर मुनि ने कहा—“आप कुछ और न समझें। मैंने जो कहा है उसमें संशय नहीं है ॥67 ॥ नास्यान्यथात्वं प्रति विक्रिया मे स्वां वञ्चनां तु प्रति विक्लवोऽस्मि । कालो हि मे यातुमयं च जातो जातिकक्षयस्यासुलभस्य बोद्धा ॥१.६८ इसके अनिष्ट से मुझे विकार नहीं हुआ है; मैं वंचित हो रहा हूँ, इसीलिए मैं विकल हूँ। मेरे (परलोक) जाने का यह समय आ गया है, जब कि यह उत्पन्न हुआ है जो जन्म-विनाश के दुर्लभ उपायों को जानेगा ॥68 ॥ विहाय राज्यं विषयेष्वनास्थस्तीव्रैः प्रयत्नैरधिगम्य तत्त्वम् । जगत्ययं मोहतमो निहन्तुं ज्वलिष्यति ज्ञानमयो हि सूर्यः ॥१.६९ विषयों से विरक्त हो, राज्य छोड़, तीव्र प्रयत्नों से तत्त्व को प्राप्त कर, यह ज्ञानमय सूर्य जगत् में मोहरूप तम को नष्ट करने के लिए प्रज्वलित होगा ॥69 ॥ दुःखार्णवाद्व्याधिविकीर्णफेनाज्जरातरङ्गान्मरणोग्रवेगात् । उत्तारयिष्यत्ययमुह्यमानमार्त्तं जगज्ज्ञानमहाप्लवेन ॥१.७० दुःखरूप सागर से—व्याधि ही जिसका फैला हुआ फेन है, वृद्धावस्था ही जिसकी तरङ्ग है और मरण ही जिसका प्रचण्ड वेग है—बहते हुए आर्त जगत् को यह ज्ञानरूप महानौका के द्वारा उबारेगा ॥70 ॥ प्रज्ञाम्बुवेगां स्थिरशीलवप्रां समाधिशीतां व्रतचक्रवाकाम् । अस्योत्तमां धर्मनदीं प्रवृत्तां तृष्णार्दितः पास्यति जीवलोकः ॥१.७१ प्रज्ञा ही जिसका जल-प्रवाह है, स्थिर शील ही जिसके तट हैं, समाधि ही जिसकी शीतलता है और व्रत ही जिसके चक्रवाक हैं, उस उत्तम धर्म नदी का वह प्रवर्तन करेगा और तृष्णा से पीड़ित प्राणि-जगत् (= जीवलोक) उस (के जल) को पीयेगा ॥71 ॥ दुःखार्दितेभ्यो विषयावृतेभ्यः संसारकान्तारपथस्थितेभ्यः । आख्यास्यति ह्येष विमोक्षमार्गं मार्गप्रनष्टेभ्य इवाध्वगेभ्यः ॥१.७२ मार्ग से भटके हुए यात्रियों के समान संसाररूप वन के पथ में पड़े हुए लोगों को, जो दुःख से पीड़ित और विषयों से लिप्त हैं, यह मोक्षमार्ग बतावेगा ॥72 ॥ विदह्यमानाय जनाय लोके रागाग्निनायं विषयेन्धनेन । प्रह्लादमाधास्यति धर्मवृष्ट्या वृष्ट्या महामेघ इवातपान्ते ॥१.७३ संसार में विषयरूप इन्धनवाली रागाग्नि से जलते हुए लोगों को यह धर्मवृष्टि से वैसे ही आनन्दित करेगा, जैसे आतप (गर्मी) के अन्त में (जल-) वृष्टि से महामेघ ॥73 ॥
दक्षिण स्तम्भ
तृष्णार्गलं मोहतमःकपाटं द्वारं प्रजानामपयानहेतोः । विपाटयिष्यत्ययमुत्तमेन सद्धर्मताडेन दुरासदेन ॥१.७४ प्राणियों के निकलने के लिए यह उस द्वार को, तृष्णा ही जिसका अर्गल है और मोहरूप अन्धकार ही जिसके किवाड़ हैं, सद्धर्म के अप्रतिहत उत्तम प्रहार से तोड़ डालेगा ॥74 ॥ स्वैर्मोहपाशैः परिवेष्टितस्य दुःखामिभूतस्य निराश्रयस्य । लोकस्य सम्बुध्य च धर्मराजः करिष्यते बन्धनमोक्षमेषः ॥१.७५ बुद्धत्व प्राप्त कर, यह धर्मराज, अपने ही मोह-पाशों से परिवेष्टित, दुःख से अभिभूत, और निराश्रय जगत् का बन्धन खोलेगा ॥75 ॥ तन्मा कृथाः शोकमिमं प्रति त्वमस्मिन्स शोच्योऽस्ति मनुष्यलोके । मोहेन वा कामसुखैर्मदाद्वा यो नैष्ठिकं श्रोष्यति नास्य धर्मम् ॥१.७६ अतः आप इसके लिए शोक न करें; इस मनुष्य-लोक में उसके लिए शोक करना चाहिए जो काम-सुख से होनेवाले मोह से, या मद से इसका नैष्ठिक धर्म नही सुनेगा ॥76 ॥ भ्रष्टस्य तस्माच्च गुणादतो मे ध्यानानि लब्ध्वाप्यकृतार्थतैव । धर्मस्य तस्याश्रवणादहं हि मन्ये विपत्तिं त्रिदिवेऽपि वासम् ॥१.७७ इस पुण्य से भ्रष्ट होकर ध्यान प्राप्त करनेपर भी मैं अकृतार्थ ही हूँ; क्योंकि उसका धर्म नही सुनने के कारण स्वर्ग-निवास को भी मैं विपत्ति ही मानता हूँ ॥77 ॥ इति श्रुतार्थः ससुहृत्सदारस्त्यक्त्वा विषादं मुमुदे नरेन्द्रः । एवंविधोऽयं तनयो ममेति मेने स हि स्वामपि सारमत्ताम् ॥१.७८ यह व्याख्या सुनने पर स्त्री और बन्धुओं के साथ विषाद छोड़कर राजा प्रमुदित हुआ। “मेरा पुत्र ऐसा है" इससे उसने अपना सौभाग्य समझा ॥78 ॥ आर्येण मार्गेण तु यास्यतीति चिन्ताविधेयं हृदयं चकार । न खल्वसौ न प्रियधर्मपक्षः सन्ताननाशात्तु भयं ददर्श ॥१.७९ “ऋषि के मार्ग पर यह चलेगा" इससे उसका हृदय चिन्तित हुआ। निश्चय ही वह ऐसा नही था कि उसे धर्म का पक्ष प्रिय नही, किन्तु वंश-नाश से होनेवाला भय उसने देखा ॥79 ॥ अथ मुनिरसितो निवेद्य तत्त्वं सुतनियतं सुतविक्लवाय राज्ञे । सबहुमतमुदीक्ष्यमाणरूपः पवनपथेन यथागतं जगाम ॥१.८० तब पुत्र के लिए विकल राजा से पुत्र के सम्बन्ध में तत्त्व को निवेदन कर, असित मुनि वायु-मार्ग से वैसे ही चला गया जैसे आया था और लोग सम्मानपूर्वक उसका रूप देखते रहे ॥80 ॥ कृतमितिरनुजासुतं च दृष्ट्वा मुनिवचनश्रवणे च तन्मतौ च । बहुविधमनुकम्पया स साधुः प्रियसुतवद्विनियोजयाञ्चकार ॥१.८१
बुद्धचरित ९