भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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तब मुनि के बैठने पर, पाद्य और अर्घ्य के साथ उसकी सम्यक् पूजाकर, राजा ने उससे वैसे ही सविनय निवेदन किया, जैसे प्राचीन समय में अन्तिदेव ने वशिष्ट से ॥५२॥ धन्योऽस्म्यनुग्राह्यमिदं कुलं मे यन्मां दिदृक्षुर्भगवानुपेतः। आज्ञाप्यतां किं करवाणि सौम्य शिष्योऽस्मि विश्रम्भितुमर्हसीति ॥१.५३ “मैं धन्य हूँ और मेरा यह कुल अनुगृहीत है जो आप मुझे देखने की इच्छा से आये हैं। हे सौम्य, आज्ञा कीजिए कि मैं क्या करूँ? आपका शिष्य हूँ, मेरे ऊपर विश्वास कीजिए” ॥५३॥ एवं नृपेणोपमन्त्रितः सन्सर्वेण भावेन मुनिर्यथावत्। स विस्मयोत्फुल्लविशालदृष्टिर्गम्भीरधीराणि वचांस्युवाच ॥१.५४ जब राजा ने इस उचित रीति से समस्त सद्भाव के साथ मुनि से निवेदन किया, तब उसकी आँखें विस्मय से विकसित तथा विशाल हो गईं और उसने ये गम्भीर और धीर वचन कहे ॥५४॥ महात्मनि त्वय्युपपन्नमेतत्प्रियातिथौ त्यागिनि धर्मकामे। सत्त्वान्वयज्ञानवयोऽनुरूपा स्निग्धा यदेवं मयि ते मतिः स्यात् ॥१.५५ “आप महात्मा, अतिथि-प्रिय, त्यागी और धर्मार्थी के ही यह योग्य है कि अपने स्वभाव, वंश, ज्ञान और वयस के अनुरूप आपकी बुद्धि मेरे प्रति ऐसी स्नेहमयी हो ॥५५॥ एतच्च तद्येन नृपर्षयस्ते धर्मेण सूक्ष्मेण धनान्यवाप्य। नित्यं त्यजन्तो विविधद्वभूवुस्तपोभिराढ्या विभवैर्दरिद्राः ॥१.५६ और, यह वही मार्ग है जिसके द्वारा वे राजर्षि सूक्ष्म धर्म से धन प्राप्त कर, नित्य विधिवत् दान करते हुए, तप के धनी और धन के दरिद्र हो गये ॥५६॥ प्रयोजनं यत्तु ममोपयाने तन्मे शृणु प्रीतिमुपेहि च त्वम्। दिव्या मयादित्यपथे श्रुता वाग्बोधाय जातस्तनयस्तवेति ॥१.५७ किन्तु मेरे आने का प्रयोजन है उसे आप सुनिये और आनन्द पाइये। सूर्य के मार्ग में (आकाश-मार्ग में) मैंने (आपके प्रति कही गई) यह दिव्यवाणी सुनी- “तुझे पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो बुद्धत्व प्राप्त करेगा” ॥५७॥ श्रुत्वा वचस्तच्च मनश्च युक्त्वा ज्ञात्वा निमित्तैश्च ततोऽस्म्युपेतः। दिदृक्षया शाक्यकुलध्वजस्य शक्रध्वजस्येव समुच्छ्रितस्य ॥१.५८ यह वचन सुनकर, मैंने मनोयोग किया और निमित्तों से बात जान ली। तब इन्द्र की पताका के समान शाक्य-कुल की उन्नत पताका को देखने की इच्छा से यहाँ आया हूँ” ॥५८॥ इत्येतदेवं वचनं निशम्य प्रहर्षसम्भ्रान्तगतिर्नरैन्द्रः। आदाय धात्र्यङ्कगतं कुमारं सन्दर्शयामास तपोधनाय ॥१.५९ इस प्रकार यह वचन सुनकर हर्ष के कारण शीघ्रता से राजा ने धाई की गोद से कुमार को लेकर तपस्वी को दिखाया ॥५९॥

चक्राङ्कपादं स तथा महर्षिर्जालावनद्धाङ्गुलिपाणिपादम्। सोर्णध्रुवं वारणवस्तिकोशं सविस्मयं राजसुतं ददर्श ॥१.६० तब उस महर्षि ने राजा के पुत्र को विस्मय के साथ देखा, उसके पाँवों में चक्र के चिह्न थे, अङ्गुलियाँ और हाथ-पाँव (रेखा-) जालों से भरे थे, भौंहें (घने) बालों से युक्त थीं, मूत्राशय और (अण्ड-) कोश वैसे ही (भीतर धँसे) थे जैसे हाथी के ॥६०॥ धात्र्यङ्कसंविष्टमवेक्ष्य चैनं देव्यङ्कसंविष्टमिवाग्निसूनुम्। बभूव पक्ष्मान्तविचञ्चिताश्रुर्निश्वस्य चैवं त्रिदिवोन्मुखोऽभूत् ॥१.६१ देवी की गोद में सोये हुए अग्नि-पुत्र की भाँति धाई की गोद में सोये हुए इस बालक को देखकर महर्षि की पपनियों पर आँसू आ गये और साँसे लेकर उसने आकाश की ओर मुख उठाया ॥६१॥ दृष्ट्वासितं त्वश्रुपरीप्लुताक्षं स्नेहात्तनूजस्य नृपश्शकम्पे। सगद्गदं बाष्पकषायकण्ठः पप्रच्छ स प्राञ्जलिरानताङ्गः ॥१.६२ असित की आँखें आँसू से डबडबाई देखकर पुत्र के स्नेह से राजा काँप उठा, उसका कण्ठ वाष्प (के अवरोध) से दुखने लगा और झुककर हाथ जोड़े हुए, उसने भग्न वाणी में पूछा:- ॥६२॥ अल्पान्तरं यस्य वपुःसुरेभ्यो बहुद्भुतं यस्य च जन्म दीप्तम्। यस्योत्तमं भाविनमात्थ चार्थं तं प्रेक्ष्य कस्मात्तव धीर वाष्पः ॥१.६३ “जिसके शरीर में देवताओं (के शरीर) से अल्प अन्तर है, जिसका उज्ज्वल जन्म बहुत अद्भुत है, जिसका भविष्य आप उत्तम कहते हैं, हे धीर उसे देखकर आपको आँसू क्यों? ॥६३॥ अपि स्थिरायुर्भगवान् कुमारः कच्चिन्न शोकाय मम प्रसूतः। लब्धा कथञ्चित्सलिलाञ्जलिर्मे न खल्विमं पातुमुपैति कालः ॥१.६४ हे भगवन्, कुमार चिरायु तो है? वह मेरे शोक के लिए तो नही जन्मा है? किसी किसी तरह मुझे जो जलाञ्जलि प्राप्त होनेवाली है उसे पीने के लिए काल तो नही आ रहा है (अर्थात् मरनेपर मुझे जलाञ्जलि देने के लिए कुमार जीवित तो रहेगा)? ॥६४॥ अप्यक्षयं मे यशसो निधानं कच्चिद्ध्रुवो मे कुलहस्तसारः। अपि प्रयास्यामि सुखं परत्र सुप्तोऽपि पुत्रेऽनिमिषैकचक्षुः ॥१.६५ मेरा यश-निधान अक्षय तो है? मेरे वंश (-ज) के हाथ में राज्य ध्रुव तो है? सोये रहनेपर भी पुत्र के प्रति एक आँख खुली रखनेवाला मैं सुखपूर्वक परलोक तो जाऊँगा? ॥६५॥ कच्चिन्न मे जातमफुल्लमेव कुलप्रवालं परिशोषभागि। क्षिप्रं विभो ब्रूहि न मेऽस्ति शान्तिः स्नेहं सुते वेत्सि हि बान्धवानाम् ॥१.६६ क्या मेरा यह वंशाङ्कुर, जो अभी जन्मा है, बिना फूले ही सूखने को है? हे विभु, शीघ्र कहिये, मुझे शान्ति नही है; क्योंकि पुत्र के लिए पिता का स्नेह तो आप जानते ही हैं।” ॥६६॥


8 अश्वघोष