भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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उसकी आँखें निर्निमेष होकर देखती हैं, वे निर्मल और विशाल हैं चमकीली और स्निग्ध भी, स्थिर और खूब लम्बी काली पपनियोंवाली। उसकी आँखें सब कुछ देख सकती हैं” ॥३४ ॥ कस्मान्तु हेतोः कथितान्भवद्भिः वरानुगुणान् धारयते कुमारः । प्रापुर्न पूर्वे मुनयो नृपाश्च राज्ञेति पृष्टा जगदुस् द्विजास्तं ॥1.39 तब राजा ने द्विजों से कहा:- “क्या कारण है उत्कृष्ट गुण, जैसा आप कहते हैं, उसमें देखे जाते हैं, जब कि ये पहले के महात्मा राजाओं में नहीं देखे गये?” तब ब्राह्मणों ने उन्हें कहा:- ॥39 ॥ ख्यातानि कर्माणि यशो मतिश्च पूर्वं न भूतानि भवन्ति पश्चात् । गुणा हि सर्वाः प्रभवन्ति हेतोः [निदर्शनान्यत्र] च नो निबोध ॥1.40^13 ^14 “राजाओं की बुद्धि, विख्यात कर्म और यश के सम्बन्ध में पहले और पीछे का प्रश्न नहीं है। यह वस्तु- स्वभाव है कि प्रत्येक कार्य कारण से होता है, अतः हमारे दृष्टान्त आप सुनें ॥40 ॥ यद्राजशास्त्रं भृगुरङ्गिरा वा न चक्रतुर्वंशकरावृषी तौ । तयोः सुतौ सौम्य ससर्जतुस्तत्कालेन शुक्रश्च बृहस्पतिश्च ॥१.४१ हे सौम्य, वंश चलानेवाले भृगु और अङ्गिरा नामक ऋषियों ने जिस राजशास्त्र को नही बनाया उसे उनके पुत्रों ने-शुक्र और बृहस्पति ने-समय बीतनेपर सृजन किया ॥41 ॥ सारस्वतश्चापि जगाद नष्टं वेदं पुनर्यं ददृशुर्न पूर्वे । व्यासस्तथैनं बहुधा चकार न यं वशिष्ठः कृतवान्शक्तिः ॥१.४२ (सरस्वती के पुत्र) सारस्वत ने नष्ट हुए वेद को कहा (=व्यक्त किया) जिसे पूर्व के लोगों ने देखा नही, और व्यास ने इसे कई विभागों में (विभक्त) किया जिसे शक्तिहीन वशिष्ठ ने नही किया ॥42 ॥ वाल्मीकिरादौ च ससर्ज पद्यं जग्रन्थ यन्न च्यवनो महर्षिः । चिकित्सितं यच्च चकार नात्रिः पश्चात्तदात्रेय ऋषिज्र्गाद ॥१.४३ पहले पहल बाल्मीकि ने पद्य सृजन किया, जिसे महर्षि च्यवन ने नही बनाया, और जिस चिकित्सा-शास्त्र को अत्रि ने (सृजन) नही किया उसे बाद को आत्रेय ऋषि ने कहा ॥43 ॥ यच्च द्विजत्वं कुशिको न लेभे तद्गाधिनः सूनुरवाप राजन । वेलां समुद्रे सगरश्च दध्रे नेक्ष्वाकवो यां प्रथमं बबन्धुः ॥१.४४ हे राजन्! जिस द्विजत्व को (विश्वामित्र के पितामह) कुशिक ने नही पाया उसे गाधी के पुत्र (विश्वामित्र) ने प्राप्त किया, और सगर ने सागर की वेला निश्चित की, जिसे शुरु में इक्ष्वाकुओं ने नही बाँधा ॥44 ॥ 12- घ-भाव = पदार्थ; दे०- बु० च० 11.41; 12.27 13- ग-पा० 'धर्मा हि' । 14- श्लोक 25 से 40 ग तक की रचना हमारी है। 40 ध के [ ] कोष्ठ में दो शब्द जौन्स्टन ने रखे हैं।


आचार्यकं योगविधौ द्विजानामप्राप्तमन्यैर्जनको जगाम । ख्यातानि कर्माणि च यानि शौरेः शूरादयस्तेष्वबला बभूवुः ॥१.४५ योग-विधि में द्विजों का आचार्य होने का जो पद दूसरों को प्राप्त नही हुआ उसे जनक ने पाया। शौरि ने जो विख्यात कर्म किये उन्हें करने में शूर आदि असमर्थ हुए ॥45 ॥ तस्मात्प्रमाणं न वयो न वंशः कश्चित्क्वचिच्छ्रेष्ठ्यमुपैति लोके । राज्ञामृषीणां च हि तानि तानि कृतानि पुत्रैरकृतानि पूर्वैः ॥१.४६ इसलिए प्रमाण न वयस है न वंश। संसार में कोई भी कहीं भी श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है; क्योंकि राजाओं और ऋषियों के पुत्रों ने वे काम किये जिन्हें उनके पूर्वजों ने नहीं किया।” ॥46 ॥ एवं नृपः प्रत्ययितैर्द्विजैस्तैराश्वासितश्चाप्यभिनन्दितश्च । शङ्कामनिष्टां विजहौ मनस्तः प्रहर्षमेवाधिकमारुरोह ॥१.४७ उन विश्वस्त द्विजों से इस प्रकार आश्वासन और अभिनन्दन पाकर, राजा ने अपने मन में अनिष्ट शङ्का का त्याग किया और वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥47 ॥ प्रीतश्च तेभ्यो द्विजसत्तमेभ्यः सत्कारपूर्वं प्रददौ धनानि । भूयादयं भूमिपतिर्यथोक्तो यायाज्जरामेत्य वनानि चेति ॥१.४८ और प्रसन्न होकर उसने उन श्रेष्ठ द्विजों को धन दिये, (जिससे) वह, उनके कथनानुसार राजा हो और बुढ़ापे में ही वन को जाय ॥48 ॥ अथो निमित्तैश्च तपोबलाच्च तज्जन्म जन्मान्तकरस्य बुद्ध्वा । शाक्येश्वरस्यालयमाजगाम सद्धर्मतर्षार्दसितो महर्षिः ॥१.४९ तब निमित्तों से और तपोबल से जन्मान्त-कर (जन्म-विनाशक) का वह जन्म जानकर महर्षि असित उत्तम धर्म की प्यास से शाक्य-अधिपति के घर आया ॥49 ॥ तं ब्रह्मविद्ब्रह्मविदं ज्वलन्तं ब्राह्म्या श्रिया चैव तपःश्रिया च । राज्ञो गुरुर्गौरवसत्क्रियाभ्यां प्रवेशयामास नरेन्द्रसद्म ॥१.५० ब्राह्म तेज और तपःश्री से जलते हुए उस श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी को राजगुरु ने गौरव और सत्कार के साथ राजभवन मे प्रवेश कराया ॥50 ॥ स पार्थिवान्तःपुरसंनिकर्षं कुमारजन्मागतहर्षवेगः । विवेश धीरो बलसञ्जयैव तपःप्रकर्षाच्च जराश्रयाच्च ॥१.५१ कुमार के जन्म से आनन्दित होकर वह राजा के अन्तःपुर के समीप गया। अतिशय तपस्या तथा वृद्धावस्था के कारण वह वहाँ इतना धीर था कि अपने को वन में ही समझ रहा हो ॥51 ॥ ततो नृपस्तं मुनिमासनस्थं पाद्यार्घ्यपूर्वं प्रतिपूज्य सम्यक् । निमन्त्रयामास यथोपचारं पुरा वसिष्ठं स इवान्तिदेवः ॥१.५२ बुद्धचरित 7