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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

[पृष्ठ ९]

वाम स्तम्भ

इत्यागतावेगमनिष्ठबुद्ध्या बुद्ध्वा नरेन्द्रं स मुनिर्बभाषे । मा भून्मतिस्ते नृप काचिदन्या निःसंशयं तद्यदवोचमस्मि ॥१.६७ अनिष्ट की आशङ्का से राजा आवेग में आ गया है, ऐसा समझकर मुनि ने कहा—“आप कुछ और न समझें। मैंने जो कहा है उसमें संशय नहीं है ॥67 ॥ नास्यान्यथात्वं प्रति विक्रिया मे स्वां वञ्चनां तु प्रति विक्लवोऽस्मि । कालो हि मे यातुमयं च जातो जातिकक्षयस्यासुलभस्य बोद्धा ॥१.६८ इसके अनिष्ट से मुझे विकार नहीं हुआ है; मैं वंचित हो रहा हूँ, इसीलिए मैं विकल हूँ। मेरे (परलोक) जाने का यह समय आ गया है, जब कि यह उत्पन्न हुआ है जो जन्म-विनाश के दुर्लभ उपायों को जानेगा ॥68 ॥ विहाय राज्यं विषयेष्वनास्थस्तीव्रैः प्रयत्नैरधिगम्य तत्त्वम् । जगत्ययं मोहतमो निहन्तुं ज्वलिष्यति ज्ञानमयो हि सूर्यः ॥१.६९ विषयों से विरक्त हो, राज्य छोड़, तीव्र प्रयत्नों से तत्त्व को प्राप्त कर, यह ज्ञानमय सूर्य जगत् में मोहरूप तम को नष्ट करने के लिए प्रज्वलित होगा ॥69 ॥ दुःखार्णवाद्व्याधिविकीर्णफेनाज्जरातरङ्गान्मरणोग्रवेगात् । उत्तारयिष्यत्ययमुह्यमानमार्त्तं जगज्ज्ञानमहाप्लवेन ॥१.७० दुःखरूप सागर से—व्याधि ही जिसका फैला हुआ फेन है, वृद्धावस्था ही जिसकी तरङ्ग है और मरण ही जिसका प्रचण्ड वेग है—बहते हुए आर्त जगत् को यह ज्ञानरूप महानौका के द्वारा उबारेगा ॥70 ॥ प्रज्ञाम्बुवेगां स्थिरशीलवप्रां समाधिशीतां व्रतचक्रवाकाम् । अस्योत्तमां धर्मनदीं प्रवृत्तां तृष्णार्दितः पास्यति जीवलोकः ॥१.७१ प्रज्ञा ही जिसका जल-प्रवाह है, स्थिर शील ही जिसके तट हैं, समाधि ही जिसकी शीतलता है और व्रत ही जिसके चक्रवाक हैं, उस उत्तम धर्म नदी का वह प्रवर्तन करेगा और तृष्णा से पीड़ित प्राणि-जगत् (= जीवलोक) उस (के जल) को पीयेगा ॥71 ॥ दुःखार्दितेभ्यो विषयावृतेभ्यः संसारकान्तारपथस्थितेभ्यः । आख्यास्यति ह्येष विमोक्षमार्गं मार्गप्रनष्टेभ्य इवाध्वगेभ्यः ॥१.७२ मार्ग से भटके हुए यात्रियों के समान संसाररूप वन के पथ में पड़े हुए लोगों को, जो दुःख से पीड़ित और विषयों से लिप्त हैं, यह मोक्षमार्ग बतावेगा ॥72 ॥ विदह्यमानाय जनाय लोके रागाग्निनायं विषयेन्धनेन । प्रह्लादमाधास्यति धर्मवृष्ट्या वृष्ट्या महामेघ इवातपान्ते ॥१.७३ संसार में विषयरूप इन्धनवाली रागाग्नि से जलते हुए लोगों को यह धर्मवृष्टि से वैसे ही आनन्दित करेगा, जैसे आतप (गर्मी) के अन्त में (जल-) वृष्टि से महामेघ ॥73 ॥


दक्षिण स्तम्भ

तृष्णार्गलं मोहतमःकपाटं द्वारं प्रजानामपयानहेतोः । विपाटयिष्यत्ययमुत्तमेन सद्धर्मताडेन दुरासदेन ॥१.७४ प्राणियों के निकलने के लिए यह उस द्वार को, तृष्णा ही जिसका अर्गल है और मोहरूप अन्धकार ही जिसके किवाड़ हैं, सद्धर्म के अप्रतिहत उत्तम प्रहार से तोड़ डालेगा ॥74 ॥ स्वैर्मोहपाशैः परिवेष्टितस्य दुःखामिभूतस्य निराश्रयस्य । लोकस्य सम्बुध्य च धर्मराजः करिष्यते बन्धनमोक्षमेषः ॥१.७५ बुद्धत्व प्राप्त कर, यह धर्मराज, अपने ही मोह-पाशों से परिवेष्टित, दुःख से अभिभूत, और निराश्रय जगत् का बन्धन खोलेगा ॥75 ॥ तन्मा कृथाः शोकमिमं प्रति त्वमस्मिन्स शोच्योऽस्ति मनुष्यलोके । मोहेन वा कामसुखैर्मदाद्वा यो नैष्ठिकं श्रोष्यति नास्य धर्मम् ॥१.७६ अतः आप इसके लिए शोक न करें; इस मनुष्य-लोक में उसके लिए शोक करना चाहिए जो काम-सुख से होनेवाले मोह से, या मद से इसका नैष्ठिक धर्म नही सुनेगा ॥76 ॥ भ्रष्टस्य तस्माच्च गुणादतो मे ध्यानानि लब्ध्वाप्यकृतार्थतैव । धर्मस्य तस्याश्रवणादहं हि मन्ये विपत्तिं त्रिदिवेऽपि वासम् ॥१.७७ इस पुण्य से भ्रष्ट होकर ध्यान प्राप्त करनेपर भी मैं अकृतार्थ ही हूँ; क्योंकि उसका धर्म नही सुनने के कारण स्वर्ग-निवास को भी मैं विपत्ति ही मानता हूँ ॥77 ॥ इति श्रुतार्थः ससुहृत्सदारस्त्यक्त्वा विषादं मुमुदे नरेन्द्रः । एवंविधोऽयं तनयो ममेति मेने स हि स्वामपि सारमत्ताम् ॥१.७८ यह व्याख्या सुनने पर स्त्री और बन्धुओं के साथ विषाद छोड़कर राजा प्रमुदित हुआ। “मेरा पुत्र ऐसा है" इससे उसने अपना सौभाग्य समझा ॥78 ॥ आर्येण मार्गेण तु यास्यतीति चिन्ताविधेयं हृदयं चकार । न खल्वसौ न प्रियधर्मपक्षः सन्ताननाशात्तु भयं ददर्श ॥१.७९ “ऋषि के मार्ग पर यह चलेगा" इससे उसका हृदय चिन्तित हुआ। निश्चय ही वह ऐसा नही था कि उसे धर्म का पक्ष प्रिय नही, किन्तु वंश-नाश से होनेवाला भय उसने देखा ॥79 ॥ अथ मुनिरसितो निवेद्य तत्त्वं सुतनियतं सुतविक्लवाय राज्ञे । सबहुमतमुदीक्ष्यमाणरूपः पवनपथेन यथागतं जगाम ॥१.८० तब पुत्र के लिए विकल राजा से पुत्र के सम्बन्ध में तत्त्व को निवेदन कर, असित मुनि वायु-मार्ग से वैसे ही चला गया जैसे आया था और लोग सम्मानपूर्वक उसका रूप देखते रहे ॥80 ॥ कृतमितिरनुजासुतं च दृष्ट्वा मुनिवचनश्रवणे च तन्मतौ च । बहुविधमनुकम्पया स साधुः प्रियसुतवद्विनियोजयाञ्चकार ॥१.८१


बुद्धचरित ९

सच्चा ज्ञान प्राप्त किये हुए उस मुनि (असित) ने अपनी बहिन के पुत्र को देखा और अनुकम्पा-वश प्रिय पुत्र के समान उसे मुनि (बुद्ध) का वचन सुनने के लिए तथा उसके विचारानुसार चलने के लिए नियुक्त किया ॥81 ॥ नरपतिरपि पुत्रजन्मतुष्टो विषयमतानि विमुच्य बन्धनानि । कुलसदृशमचीकरद्यथावत्प्रियतनयस्तनयस्य जातकर्म ॥१.८२ पुत्र-जन्म से सन्तुष्ट होकर राजा ने भी देश के सभी बन्धनों (=कैदियों) को छोड़ दिया और उस पुत्र-स्नेही ने पुत्र का जात-कर्म कुल के अनुकूल ही उचित रीति से कराया ॥82 ॥ दशसु परिणतेष्वहःसु चैव प्रयतमनाः परया मुदा परीतः । अकुरुत जपहोममङ्गलाद्याः परमभवाय सुतस्य देवतेज्याः ॥१.८३ दस दिन पूरे होनेपर परम प्रसन्न होकर, उस संयमी ने पुत्र के परम कल्याण के लिए जप, होम और मङ्गल-कर्म आदि के साथ देवयज्ञ किये ॥83 ॥ अपि च शतसहस्रपूर्णसङ्ख्याः स्थिरबलवत्तनयाः सहेमशृङ्गीः । अनुपगतजराः पयस्विनीर्गाः स्वयमददात्सुतवृद्धये द्विजेभ्यः ॥१.८४ और भी, एक लाख पयस्विनी गाएँ जो वृद्धा नहीं हुई थीं, जिनके सींग सोने से मढ़े थे, और जिनके बछड़े दृढ़ बलवान् थे, पुत्र की बढ़ती के लिए स्वयं द्विजों को दीं ॥84 ॥ बहुविधविषयास्ततो यतात्मा स्वहृदयतोषकरीः क्रिया विधाय । गुणवति नियते शिवे मुहूर्ते मतिमकरोन्मुदितः पुरप्रवेशे ॥१.८५ उस संयतात्मा ने अपने हृदय को सन्तोष देनेवाली भाँति-भाँति की क्रियाएँ कीं और गुण-युक्त मङ्गल मुहूर्त नियत होनेपर, प्रसन्न होकर उसने नगर मे प्रवेश करने का विचार किया ॥85 ॥ द्विरदरदमयीमथो महार्हा सितसितपुष्पभृतां मणिप्रदीपाम् । अभजत शिविकां शिवाय देवी तनयवती प्रणिपत्य देवताभ्यः ॥१.८६ उस पुत्रवती देवी ने मङ्गल के लिए देवताओं को प्रणाम किया और वह हाथी-दाँत की बनी बहुमूल्य पालकी पर, जो उजले-उजले फूलों से भरी थी और जिसमें मणि-प्रदीप जल रहे थे, चढ़ी ॥86 ॥ पुरमथ पुरतः प्रवेश्य पत्नीं स्थविरजनानुगतामपत्यनाथाम् । नृपतिरपि जगाम पौरसङ्घैर्दिवममरैर्मघवानिवार्च्यमानः ॥१.८७ वृद्धाओं और पुत्र के साथ पत्नी को आगे से पुर में प्रवेश कराकर, राजा भी वहाँ गया। पुरवासियों ने उसकी उसी तरह पूजा की, जैसे स्वर्ग में (प्रवेश करने पर) इन्द्र की देवताओं ने ॥87 ॥ भवनमथ विगाह्य शाक्यराजो भव इव षण्मुखजन्मना प्रतीतः । इदमिदमिति हर्षपूर्णवक्त्रो बहुविधपुष्टियशस्करं व्यधत्त ॥१.८८ महल में प्रवेश करने पर, शाक्य-राज वैसे ही आनन्दित हुआ, जैसे कार्तिकेय के जन्म से शिव। प्रसन्न मुख होकर "यह करो, यह करो" कहते हुए राजा ने वह सब कराये, जिनके तरह-तरह की बढ़ती और यश होता है ॥88 ॥ इति नरपतिपुत्रजन्मवृद्ध्या सजनपदं कपिलाह्वयं पुरं तत् । धनदपुरमिवाप्सरोऽवकीर्ण मुदितमभून्नलकूबरप्रसूतौ ॥१.८९ राज-कुमार के समृद्धिकारी जन्म से कपिल के नाम का वह नगर जनपद के साथ इस प्रकार प्रमुदित हुआ, जैसे नलकूबर के जन्म में अप्सराओं से भरा कुबेर का नगर ॥89 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये भगवत्प्रसूतिर्नाम प्रथमः सर्गः ॥१ ॥ द्वितीय सर्ग अन्तःपुर विहार आ जन्मनो जन्मजरान्तकस्य तस्यात्मजस्यात्मजितः स राजा । अहन्यहन्यर्थगजार्थमित्रैर्वृद्धिं ययौ सिन्धुरिवाम्बुवेगैः ॥२.१ जन्म और जरा के विनाशक उस आत्म-विजयी पुत्र के जन्म (-समय) से वह राजा दिन-दिन धन से, हाथी- घोड़ों से और मित्रों से उसी तरह बढ़ने लगा, जैसे जल-प्रवाहों से नदी ॥1 ॥ धनस्य रत्नस्य च तस्य तस्य कृताकृतस्यैव च काञ्चनस्य । तदा हि नैकान्स निधीनवाप मनोरथस्याप्यतिभारभूतान् ॥२.२ क्योंकि तब धन, विविध रत्न, तथा बने और नही बने सोने की अनेक निधियाँ उसने पाईं, जो मनोरथ के लिए भी भार-स्वरूप थीं ॥2 ॥ ये पद्मकल्पैरपि च द्विपेन्द्रैर्न मण्डलं शक्यमिहाभिनेतुम् । मदोत्कटा हैमवता गजास्ते विनापि यत्नादुपतस्थुरेनम् ॥२.३ हिमालय के मतवाले हाथी, जो पद्म-सदृश गजेन्द्रों द्वारा भी यहाँ नही लाये जा सकते थे, अनायास ही उसकी सेवा में उपस्थित हुए ॥3 ॥ नानाङ्गचिह्नैर्नवहेमभाण्डैर्विभूषितैर्लम्बसटैस्तथाश्वैः । सञ्चुक्षुभे चास्य पुरं तुरङ्गैर्बलेन मैत्र्या च धनेन चाप्तैः ॥२.४ और, नाना चिह्नों नव-सुवर्ण-भाण्डों और भूषणों से युक्त तथा लम्बे केसरवाले घोड़ों से, जो (सैन्य-) बल, मित्रता एवं धन द्वारा प्राप्त हुए थे, उसका नगर क्षुब्ध हुआ ॥4 ॥¹⁵ पुष्टाश्च तुष्टाश्च तथास्य राज्ये साध्व्योऽरजस्का गुणवत्पयस्काः । उदग्रवत्सैः सहिता बभूवुर्बह्व्यो बहुक्षीरदुहश्च गावः ॥२.५ ¹⁵- भाण्ड = अश्व-आभरण, घोड़े का अलंकार । 10 अश्वघोष

उसके राज्य में गाएँ बहुत थीं। वे पुष्ट व सन्तुष्ट, साध्वी और निर्मल, उत्तम तथा बहुत दूध देनेवाली और उन्नत बछड़ों से युक्त थीं ॥5॥ मध्यस्थतां तस्य रिपुर्जगाम मध्यस्वभावः प्रययौ सुहृत्त्वम्। विशेषतो दार्ढ्यमियाय मित्रं द्वावस्य पक्षावपरस्तु नास ॥२.६ उसका शत्रु मध्यस्थ (= निष्पक्ष), मध्यस्थ मित्र, और मित्र विशेषतः दृढ़ हो गया। उसके दो ही पक्ष रहे, तीसरा पक्ष (शत्रु) नही रहा ॥6॥ तथास्य मन्दानिलमेघशब्दः सौदामिनीकुण्डलमण्डिताभ्रः। विनाश्मवर्षाशनिपातदोषैः काले च देशे प्रवर्ष देवः ॥२.७ और उसके लिए (वृष्टि-) देव ने, जिनके बादल विद्युन्मण्डल से मण्डित थे, मन्द अनिल और मेघ-गर्जन के साथ अश्म-वर्षा और वज्रपात के दोषों के बिना ही (उचित) समय और स्थान पर वृष्टि की ॥7॥ रुरोह सस्यं फलवद्यथर्तु तदाकृतेनापि कृषिश्रमेण। ता एव चास्यौषधयो रसेन सारेण चैवाभ्यधिका बभूवुः ॥२.८ (अति) कृषि-श्रम किये बिना ही फल-युक्त सस्य उचित ऋतु में बढ़ा। और, उसके लिये वे ही ओषधियाँ रस एवं सार से खूब भर गईं ॥8॥ शरीरसन्देहकरेऽपि काले सङ्ग्रामसम्मर्द इव प्रवृत्ते। स्वस्थाः सुखं चैव निरामयं च प्रजज्ञिरे कालवशेन नार्यः ॥२.९ यद्यपि (प्रसव-) काल शरीर के लिए उतना ही सन्देह-जनक (विपत्तिपूर्ण) है जितना कि युद्ध-सङ्घर्ष, तथापि स्त्रियों ने स्वस्थ रहते हुए, सुखपूर्वक और बिना किसी रोग के समय पर प्रसव किया ॥9॥ पृथग्व्रतिभ्यो विभवेऽपि गर्हे न प्रार्थयन्ति स्म नराः परेभ्यः। अभ्यर्थितः सूक्ष्मधनोऽपि चार्यस्तदा न कश्चिद्विमुखो बभूव ॥२.१० व्रतियों को छोड़कर (अन्य) लोगों ने, चाहे उनका विभव कितना ही तुच्छ क्यों न हो, दूसरों से कुछ नही माङ्गा। और साथ ही कोई भी आर्य (सज्जन), चाहे उसका धन कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, माङ्गे जानेपर विमुख नही हुआ ॥10॥¹⁶ नागौरवो बन्धुषु नाप्यदाता नैवानृतो नानृतिको न हिंस्रः। आसीत्तदा कश्चन तस्य राज्ये राज्ञो ययातेरिव नाहुषस्य ॥२.११ उस समय उसके राज्य में, जैसे नहुष के पुत्र ययाति के राज्य में बन्धुओं का असम्मान करनेवाला, अदाता, अव्रती, झूठ, और हिंसक कोई नही था ॥11॥¹⁷ उद्यानदेवायतनाश्रमाणां कूपप्रपापुष्करिणीवनानाम्। चक्रुः क्रियास्तत्र च धर्मकामाः प्रत्यक्षतः स्वर्गमिवोपलभ्य ॥२.१२ धर्म के अभिलाषियों ने स्वर्ग का मानो प्रत्यक्ष दर्शन कर उद्यान, देव-मन्दिर, आश्रम, कूप, पनसाले, पोखर और उपवन बनाये ॥12॥ मुक्तश्च दुर्भिक्षभयामयेभ्यो हृष्टो जनः स्वर्ग इवाभिरेमे। पत्नीं पतिर्वा महिषीं पतिं वा परस्परं न व्यभिचेरतुश्च ॥२.१३ दुर्भिक्ष भय और रोग से मुक्ति होने के हर्ष में लोग ऐसे सुखी थे, जैसे स्वर्ग में। पति ने पत्नी के विरुद्ध या पत्नी ने पति के विरुद्ध सदाचार भङ्ग नही किया अर्थात् दोनों एक दूसरे के प्रति सच्चे रहे ॥13॥ कश्चित्सिषेवे रतये न कामं कामार्थमर्थं न जुगोप कश्चित्। कश्चिद्धनार्थं न चचार धर्मं धर्माय कश्चिन्न चकार हिंसाम् ॥२.१४ किसी ने रति के लिए काम का सेवन नही किया, किसी ने काम (-सेवन) के लिए धन की रक्षा नही की। किसी ने धन के लिए धर्माचरण नही किया, किसी ने धर्म के लिए हिंसा नही की ॥14॥ स्तेयादिभिश्चाप्यरिरिभश्च नष्टं स्वस्थं स्वचक्रं परचक्रमुक्तम्। क्षेमं सुभिक्षं च बभूव तस्य पुरानरण्यस्य यथैव राष्ट्रे ॥२.१५ शत्रुता और चोरी-आदि नष्ट हो गई। उसका राज्य स्वस्थ, स्वतन्त्र, विदेश के शासन से मुक्त, सुखी और अन्न से भरा था, जैसे प्राचीन काल में अनरण्य का राज्य ॥15॥ तदा हि तज्जन्मनि तस्य राज्ञो मनोरिवादित्यसुतस्य राज्ये। चचार हर्षः प्रणनाश पाप्मा जज्वल धर्मः कलुषः शशाम ॥२.१६ तब उसके जन्म में उस राजा के राज्य में, जैसे सूर्य-पुत्र मनु के राज्य में, मलिनता मिटी और हर्ष का संचार हुआ, पाप नष्ट हुआ और धर्म प्रज्वलित हुआ ॥16॥ एवंविधा राजकुलस्य संपत्सर्वार्थसिद्धिश्च यतो बभूव। ततो नृपस्तस्य सुतस्य नाम सर्वार्थसिद्धोऽयमिति प्रचक्रे ॥२.१७ राजकुल की ऐसी सम्पद् और सब अर्थों की सिद्धि हुई, इसीलिए राजा ने अपने पुत्र का नाम रखते हुए कहा– “यह सर्वार्थसिद्ध है” ॥17॥ देवी तु माया विबुधर्षिकल्पं दृष्ट्वा विशालं तनयप्रभावम्। जातं प्रहर्षं न शशाक सोढुं ततो निवासाय दिवं जगाम ॥२.१८ अपने पुत्र का प्रभाव देवर्षि का-सा विशाल देखकर, देवी माया (हृदय में) उत्पन्न हर्ष को न रोक सकी और रहने के लिए स्वर्ग चली गई ॥18॥ ततः कुमारं सुरगर्भकल्पं स्नेहेन भावेन च निर्विशेषम्। मातृष्वसा मातृसमप्रभावा संवर्धयामासत्मजवद्बभूव ॥२.१९ ¹⁶- व्रती = संन्यास-धर्म के नियम पालन करनेवाले। ¹⁷- अव्रती = धर्म के नियम पालन नहीं करनेवाला। [बुद्धचरित 11]

तब माता के समान प्रभावशालौ मौसी ने सुर-सन्तान-तुल्य कुमार को वैसे ही भाव और स्नेह से अपने पुत्र के समान पाला ॥19॥ ततः स बालार्क इवोदयस्थः समीरितो वह्निरिवानिलेन । क्रमेण सम्यग्ववृधे कुमारस्ताराधिपः पक्ष इवातमस्के ॥२.२० तब उदयाचल पर स्थित सूर्य के समान, हवा से प्रेरित अग्नि के समान और शुक्ल-पक्ष के चन्द्रमा के समान कुमार धीरे-धीरे अच्छी तरह बढ़ने लगा ॥20॥ ततो महार्हाणि च चन्दनानि रत्नावलीश्रौषधिभिः सगर्भाः । मृगप्रयुक्तांश्चरथांश्च हैमानानाचक्रिरेऽस्मै सुहृदालयेभ्यः ॥२.२१ वयोऽनुरूपाणि च भूषणानि हिरण्मयान् हस्तिमृगाश्वकांश्च । रथांश्च गोपुत्रकसंप्रयुक्तान् पुत्रीश्च चामीकररूप्यचित्राः ॥२.२२ तब उसके लिए लोग बहुमूल्य चन्दन, ओषधियों से भरे रत्न-हार, मृग-युक्त छोटे-छोटे स्वर्ण रथ, वयस के अनुरूप भूषण, सोने के बने छोटे-छोटे हाथी, मृग और घोड़े, गो-वत्स-युक्त रथ, तथा चाँदी-सोने से रङ्ग- विरङ्गी पुतलियाँ मित्रों के घरों से ले आये ॥21-22॥ एवं स तैस्तैर्विषयोपचारैर्वयोऽनुरूपै रुपचर्यमाणः । बालोऽप्यबालप्रतिमो बभूव धृत्या च शौचेन धिया श्रिया च ॥२.२३ वयस के अनुरूप उन-उन विषयों से इस प्रकार सेवित होता हुआ वह बालक होनेपर भी धैर्य, पवित्रता, बुद्धि और विभूति में बालक नही था ॥23॥ वयश्च कौमारमतीत्य सम्यक् सम्प्राप्य काले प्रतिपत्तिकर्म । अल्पैरहोभिर्बहुवर्षगम्या जग्राह विद्याः स्वकुलानुरूपाः ॥२.२४ कुमारावस्था बीतनेपर, समय पर उसका (उपनयन-) संस्कार विधिवत् हुआ और अपने कुल के अनुरूप विद्याएँ, जो बहुत वर्षों में सीखी जाती हैं, उसने कुछ ही दिनों में सीख लीं ॥24॥ नैःश्रेयसं तस्य तु भव्यमर्थं श्रुत्वा पुरस्तादसितान्महर्षेः । कामेषु सङ्गं जनयाम्बभूव वनानि यायादिति शाक्यराजः ॥२.२५ शाक्य-राज ने महर्षि असित से पहले ही उसका परम कल्याण-प्रद भविष्य सुना था; इसलिए उसने विषयों में उसकी आसक्ति उत्पन्न की, जिससे वह वन को न जाय ॥25॥ कुलात्ततोऽस्मै स्थिरशीलयुक्तात्साध्वीं वपुर्ह्रीविनयोपपन्नाम् । यशोधरां नाम यशोविशालां वामाभिधानां श्रियमाजुहाव ॥२.२६ तब स्थायी शीलवाले कुल से यशोधरा नामक कन्यारूपी लक्ष्मी को उसके लिए बुलाया। वह यशस्विनी और साध्वी थी। रूप, लज्जा और विनय से युक्त थी ॥26॥ विद्योतमानो वपुषा परेण सनत्कुमारप्रतिमः कुमारः । सार्धं तया शाक्यनरेन्द्रवध्वा शच्या सहस्राक्ष इवाभिरेमे ॥२.२७

12 अश्वघोष

सनत्कुमार के समान अत्यन्त सुन्दर आकृति से चमकते कुमार ने शाक्यराज की उस वधू के साथ वैसे ही रमण किया, जैसे इन्द्र शची के साथ ॥27॥ किञ्चिन्मनः क्षोभकरं प्रतीपं कथं न पश्येदिति सोऽनुचिन्त्य । वासं नृपो व्यादिशति स्म तस्मै हर्म्योदरेष्वेव न भूप्रचारम् ॥२.२८ मन को क्षुब्ध करनेवाला कुछ भी प्रतिकूल वह (कुमार) कैसे न देखे-ऐसा सोचकर राजा ने उसके लिए महलों के भीतर रहने का आदेश दिया, पृथ्वी पर घूमने का नही ॥28॥ ततः शरत्तोयदपाण्डरेषु भूमौ विमानेष्विव रञ्जितेषु । हर्म्येषु सर्वर्तुसुखाश्रयेषु स्त्रीणामुदारैर्विजहार तूर्यैः ॥२.२९ तब शरत्काल के मेघ के समान श्वेत तथा पृथ्वी पर उतरे विमानों (=देवप्रासादों) के समान रञ्जित महलों में, जो सब ऋतुओं में सुखदायी थे, उसने स्त्रियों के उदार तूर्य-वाद्यों से मनोविनोद किया ॥29॥ कलैर्हि चामीकरबद्धकक्षैर्नारीकराग्राभिहतैर्मृदङ्गैः । वराप्सरोनृत्यसमैश्च नृत्यैः कैलासवत्तद्भवनं रराज ॥२.३० जिनके अब्वल सुवर्ण से बँधे थे और जो स्त्रियों की अङ्गुलियों से बजाये जा रहे थे उन मृदङ्गों से, (उनकी) मधुर ध्वनि से और उत्तम अप्सराओं के नृत्य के समान नृत्य से, वह भवन कैलास के समान शोभित हुआ ॥30॥ वाग्भिः कलाभिर्ललितैश्च हावैर्मदैः सखेलैर्मधुरैश्च हासैः । तं तत्र नार्यो रमयाम्बभूवुर्भ्रूवञ्चितैश्चौन्नितैर्निरक्षितैश्च ॥२.३१ मीठी बोली से, ललित हाथ-भाव से, क्रीड़ापूर्ण मद (=मदत्ता) से, मधुर हाथ से, भ्रू-भङ्गों से और कटाक्षों से, नारियों ने उसे वहाँ आनन्दित किया ॥31॥ ततः स कामाश्रयपण्डिताभिः स्त्रीभिर्गृहीतो रतिकर्कशाभिः । विमानपृष्ठान्न महीं जगाम विमानपृष्ठादिव पुण्यकर्मा ॥२.३२ तब कामोद्दीपन में निपुण तथा रति में दृढ़ स्त्रियों से गृहीत होकर, वह महल पर से भूतल पर नही आया, जैसे पुण्य कर्मवाला (व्यक्ति) स्वर्ग से (नीचे नही उतरता है) ॥32॥ नृपस्तु तस्यैव विवृद्धिहेतोस्तद्भाविनाथैन च चोद्यमानः । शमेऽभिरेमे विरराम पापाद्भजे दमं संविबभाज साधून् ॥२.३३ पुत्र की बढ़ती के लिए और उसके (उत्तम) भविष्य से प्रेरित होता राजा शम में आनन्दित हुआ और पाप से विरत हुआ, (इन्द्रिय-) दमन का आश्रय लिया और साधुओं के बीच धन बाँटा ॥33॥ नाधीरवत्तामसुखे ससञ्जे न संररञ्जे विषमं जनन्याम् । धृत्येन्द्रियाश्वांश्चपलाग्विजिग्ये बन्धूंश्च पौरांश्च गुणैर्जिगाय ॥२.३४

वह अधीर व्यक्ति के समान काम-सुख में आसक्त नहीं हुआ, उसने मातृ-वर्ग (स्त्रियों) से अनुचित अनुराग नहीं किया (या स्त्रियों के प्रति अत्यधिक क्रोध नहीं किया) धैर्यपूर्वक इन्द्रियरूप चपल घोड़ों का दमन किया और अपने गुणों से बन्धुओं एवं पुरवासियों को जीता ॥३४ ॥ नाध्यैष्ट दुःखाय परस्य विद्यां ज्ञानं शिवं यत्तु तदध्यगीष्ट । स्वाभ्यः प्रजाभ्यो हि यथा तथैव सर्वप्रजाभ्यः शिवमशशंसे ॥२.३५ उसने दूसरे के दुःख के लिए (तन्त्र मन्त्र) विद्या नहीं सीखी, किन्तु जो कल्याण-कारी ज्ञान है उसे अध्ययन किया; क्योंकि जैसे अपनी प्रजाओं के लिए वैसे ही सब प्रजाओं के लिए उसने कल्याण-कामना की ॥३५ ॥ भं भासुरं चाङ्गिरसाधिदेवं यथावदार्च तदायुषे सः। जुहाव हव्यान्यकृशे कृशानौ ददौ द्विजेभ्यः कृशनं च गाश्च ॥२.३६ उसकी आयु के लिए उसने उज्ज्वल ग्रह-मण्डल की, जिसका अधिदेव बृहस्पति है, यथोचित्त पूजा की, विशाल अग्नि में हवन किया तथा द्विजों को सोना और गाएँ दीं ॥३६ ॥ स्रक्षौ शरीरं पवितुं मनश्च तीर्थाम्बुमिश्रैश्च गुणाम्बुमिश्रैः । वेदोपदिष्टं सममात्मजं च सोमं पपौ शान्तिसुखं च हार्दम् ॥२.३७ शरीर को पवित्र करने के लिए तीर्थ के जल से और मन को पवित्र करने के लिए गुणरूप जल से स्नान किया, वेदविहित सोम (-रस) पिया और साथ ही अपने से ही उत्पन्न हार्दिक शान्ति-सुख की रक्षा की ॥३७ ॥$^{18}$ सान्त्वं बभाषे न च नार्थवद्यज्जजल्प तत्त्वं न च विप्रियं यत्। सान्त्वं ह्यतत्त्वं परुषं च तत्त्वं हियाशकन्नात्मन एव वक्तुम् ॥२.३८ उसने प्रिय कहा और व्यर्थ नहीं; सत्य कहा और अप्रिय नहीं; क्योंकि प्रिय असत्य और कठोर सत्य वह लाज से अपने को भी न कह सका ॥३८ ॥ इष्टेष्वनिष्टेषु च कार्यवत्सु न रागदोषाश्रयतां प्रपेदे । शिवं सिषेवे व्यवहारशुद्धं यज्ञं हि मेने न तथा यथा तत् ॥२.३९ कार्यवालों के प्रति, वे इष्ट हों या अनिष्ट उसने अनुराग या द्वेष नहीं किया; कल्याणकारी शुद्ध विवाद निर्णय का सेवन किया, यज्ञ को वैसा नहीं माना जैसा कि उसे अर्थात् न्याय की पवित्रता को ॥३९ ॥ आशावते चाभिगताय सद्यो देयाम्बुभिस्तर्षमचेच्छिदिष्ट । युद्धाहते वृत्तपरश्वधेन द्विद्दर्पमुद्धत्तमबेभिदिष्ट ॥२.४० आगत आशावान् व्यक्ति की प्यास को दानरूप जल से सद्यः काटा और युद्ध के बिना ही सदाचाररूप कुठार से शत्रु के असंयत अभिमान को भेदा ॥४० ॥ एकं विनिन्ये स जुगोप सप्त सप्तैव तत्याज ररक्ष पञ्च । प्राप त्रिवर्गं बुबुधे त्रिवर्गं जज्ञे द्विवर्गं प्रजहौ द्विवर्गम् ॥२.४१ उसने एक (अपने) को विनीत किया, सात (= राज्य के सात अङ्गों) की रक्षा की, सात (= राजाओं के सात दोषों) का त्याग किया, पाँच (= पाँच उपायों) की रक्षा की, त्रिवर्ग (= अर्थ-धर्म-काम) को पाया, त्रिवर्ग (= शत्रु-मित्र-मध्यस्थ) को समझा, द्विवर्ग (= नीति-अनीति) को जाना, और द्विवर्ग (= काम-क्रोध) को छोड़ा ॥४१ ॥$^{19}$ कृतागसोऽपि प्रतिपाद्य वध्याञ्ज्ञाजीघनन्नापि रुषा ददर्श । बबन्ध सान्त्वेन फलेन चैतांस्त्यागोऽपि तेषां ह्यनपाय दृष्टः ॥२.४२ अपराधियों को वध्य प्रतिपादित करके भी नहीं मरवाया, क्रोध से भी नही देखा। उन्हें प्रिय फल से युक्त किया (= हल्का दण्ड दिया); क्योंकि उन्हें छोड़ने में भी अनीति देखी ॥४२ ॥ आर्षान्यचारीत्परमव्रतानि वैराण्युहासीच्चिरसम्भृतानि । यशांसि चापद्गुणगन्धवन्ति रजांस्यहासीन्मलिनीकराणि ॥२.४३ ऋषियों के कठोर व्रतों का आचरण किया, चिर-पोषित शत्रुता छोड़ी, अपने गुणों से सुगन्धित यश पाया, (मन) मलिन करनेवाली (काम की) धूल झाड़ी ॥४३ ॥ न चाजिहीर्षीद्बलिमप्रवृत्तं न चाचिकीर्षीत्परवस्त्वभिध्याम् । न चाविवक्षीद्विषतामधर्मं न चादिधक्षीद्धृदयेन मन्युम् ॥२.४४ उसने (प्रजाओं से) अप्रवृत्त (= अनुचित, अप्रस्तुत) कर लेने की इच्छा नहीं की, पर-वस्तु हरण करना नही चाहा, शत्रुओं का अधर्म प्रकट करना नही चाहा और हृदय में क्रोध रखना नही चाहा ॥४४ ॥ तस्मिंस्तथा भूमिपतौ प्रवृत्ते भृत्याश्च पौराश्च तथैव चेरुः । शमात्मके चेतसि विप्रसन्ने प्रयुक्तयोगस्य यथेन्द्रियाणि ॥२.४५ उस राजा की प्रवृत्ति वैसी होनेपर, भृत्यों और पुरवासियों ने वैसा ही आचरण किया; जिस प्रकार योगारूढ व्यक्ति का चित्त शान्त और प्रसन्न (= निर्मल) होनेपर, उसके इन्द्रिय भी (वैसे ही शान्त और निर्मल हो जाते हैं) ॥४५ ॥ काले ततश्चारुपयोधरायां यशोधरायां स्वयशोधरायाम् । शौद्धोदने राहुसपत्नवक्त्रो जज्ञे सुतो राहुल एव नाम्ना ॥२.४६ $^{18}$_ "आत्मजं च" की जगह "आत्मजेन" पढ़ें, तो उत्तरार्ध का अर्थ यों होगा— "आत्मज के साथ वेद-विहित सोम (-रस) पिया और हार्दिक शान्ति-सुख की रक्षा की।" $^{19}$_ पाँच उपाय, देखिये—सौ० पन्द्रह 61 । बुद्धचरित 13

तब समय पर चारु पयोधरवाली तथा अपने (गर्भ में पुत्ररूप) यश को धारण करनेवाली यशोधरा से शौद्धोदनि (=शुद्धोदन के पुत्र) का राहु-शत्रु (चन्द्र)-सदृश मुखवाला पुत्र उत्पन्न हुआ, (उसका) नाम राहुल ही (रहा) ॥46॥ अथेष्टपुत्रः परमप्रतीतः कुलस्य वृद्धिं प्रति भूमिपालः। यथैव पुत्रप्रसवे ननन्द तथैव पौत्रप्रसवे ननन्द ॥२.४७ तब अभिलषित पुत्रवाले राजा को वंश-वृद्धि का पूरा विश्वास हुआ। जैसे वह पुत्र जन्म में आनन्दित हुआ था, वैसे ही पौत्र-जन्म में आनन्दित हुआ ॥47॥ पुत्रस्य मे पुत्रगतो ममेव स्नेहः कथं स्यादिति जातहर्षः। काले स तं तं विधिमाललम्बे पुत्रप्रियः स्वर्गमिवारुरुक्षन् ॥२.४८ "मेरे पुत्र को मेरे ही समान पुत्रगत स्नेह किस प्रकार होता होगा" यह सोचकर उसे हर्ष हुआ उस पुत्र- प्रिय ने मानो स्वर्गारोहण की इच्छा से समय पर उस-उस (धार्मिक) विधि का अवलम्बन किया ॥48॥ स्थित्वा पथि प्राथमल्पिकानां राजर्षभाणां यशसान्वितानाम्। शुक्लान्यमुक्त्वापि तपांस्यतप्त यज्ञैश्च हिंसारहितैरयष्ट ॥२.४९ कृत-युग के यशस्वी नृप-श्रेष्ठ के पथ में रहते हुए, (गृहस्थाश्रम के) सफेद कपड़ों को नहीं छोड़ते हुए भी उसने तप किये और हिंसा-रहित यज्ञों से पूजा की ॥49॥ अजाज्वलिष्ठाथ स पुण्यकर्मा नृपश्रिया चैव तपःश्रिया च। कुलेन वृत्तेन धिया च दीप्तस्तेजः सहस्रांशुरिवोत्सिसृक्षुः ॥२.५० वह पुण्यकर्मा राज्य और तपस्या की श्री से प्रज्वलित हुआ; (अपने श्रेष्ठ) कुल आचार और बुद्धि से प्रदीप्त हुआ, जैसे सहस्र किरणोंवाले सूर्य के समान प्रकाश फैलाने की इच्छा कर रहा हो ॥50॥ स्वायम्भुवं चार्चिकमर्चयित्वा जजाप पुत्रस्थितये स्थितश्रीः। चकार कर्माणि च दुष्कराणि प्रजाः सिसृक्षुः क इवादिकाले ॥२.५१ उस स्थायी लक्ष्मीवाले (राजा) ने पुत्र के जीवन के लिए स्वयम्भू की पूजा की, जप किया और आदि युग में प्रजा सृजन करने को इच्छुक स्रष्टा के समान दुष्कर कर्म किये ॥51॥$^{20}$ तत्याज शस्त्रं विममर्श शास्त्रं शमं सिषेवे नियमं विषेहे। वशीव कञ्चिद्विषयं न भेजे पितेव सर्वान्विषयानपश्यत् ॥२.५२ शस्त्र छोड़ा, शास्त्र विचारा, शम का सेवन किया, नियम को सहन किया, संयमी के समान किसी विषय का सेवन नहीं किया, पिता के समान सब विषयों (=देशों, प्रजासमूह) को देखा ॥52॥ बभार राज्यं स हि पुत्रहेतोः पुत्रं कुलार्थं यशसे कुलं तु। स्वर्गाय शब्दं दिवमात्महेतोर्धर्मार्थमात्मस्थितिमाचकाङ्क्ष ॥२.५३ उसने राज्य का पुत्र के लिए, पुत्र का कुल के लिए, कुल का यश के लिए पालन किया और यश की स्वर्ग के लिए, स्वर्ग की अपने लिए, अपने जीवन की धर्म के लिए आकाङ्क्षा की ॥53॥ एवं स धर्मं विविधं चकार सद्भिर्निपातं श्रुतितश्च सिद्धम्। दृष्ट्वा कथं पुत्रमुखं सुतो मे वनं न यायादिति नाथमानः ॥२.५४ इस प्रकार उसने भाँति भाँति का धर्म किया, सज्जन जिसका पालन करते हैं और जो श्रुति से सिद्ध है, यह प्रार्थना करते हुए कि "अपने पुत्र का मुख देखकर मेरा पुत्र किसी प्रकार वन को न जाय" ॥54॥ रिरक्षिषन्तः श्रियमात्मसंस्थां रक्षन्ति पुत्रान् भुवि भूमिपालाः। पुत्रं नरेन्द्रः स तु धर्मकामो ररक्ष धर्माद्विषयेषु मुञ्चन् ॥२.५५ पृथ्वी पर अपनी श्री की रक्षा चाहनेवाले भूपाल अपने पुत्रों की रक्षा करते हैं; किन्तु इस धर्माभिलाषी राजा ने अपने पुत्र को (इन्द्रिय-) विषयों में छोड़ते हुए उसकी धर्म से रक्षा की ॥55॥ वनमनुपमसत्त्वा बोधिसत्त्वास्तु सर्वे विषयसुखरसज्ञा जग्मुरुत्पन्नपुत्राः। अत उपचितकर्मा रूढमूलेऽपि हेतौ स रतिमुपसिषेवे बोधिमापन्न यावत् ॥२.५६ अनुपम स्वभाववाले सब बोधिसत्त्व विषय-सुख का रस जानकर, पुत्र उत्पन्न होनेपर, वन को गये; अतः (राग, द्वेष, मोह को क्षीण करनेवाले) कर्मों के इकट्ठे होने से (कल्याण का) हेतु रूढ़मूल (=सुदृढ़) होनेपर भी, उसने बुद्धत्व पाने तक विषयों को कुछ-कुछ सेवन किया ॥56॥$^{21}$ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽन्तःपुरविहारो नाम द्वितीयः सर्गः ॥२॥ तृतीय सर्ग संवेग-उत्पत्ति ततः कदाचिन्मृदुशाद्वलानि पुंस्कोकिलोन्नादितपादपानि। शुश्राव पद्माकरमण्डितानि गीतैर्निबद्धानि स काननानि ॥३.१ तब एक बार उसने गीत-निबद्ध काननों के बारे में सुना, जो मृदु और हरे तृणों से युक्त थे, जिनके पेड़ कोयलों से निनादित थे और जो कमल के पोखरों से मण्डित थे ॥1॥ श्रुत्वा ततः स्त्रीजनवल्लभानां मनोज्ञभावं पुरकाननानाम्। बहिःप्रयाणाय चकार बुद्धिमन्तर्गृहे नाग इवावरुद्धः ॥३.२ तब स्त्रियों के प्रिय पुर-काननों की मनोहरता सुनकर, घर के भीतर बँधे हाथी के समान उसने बाहर जाने का विचार किया ॥2॥ ततो नृपस्तस्य निशम्य भावं पुत्राभिधानस्य मनोरथस्य। स्नेहस्य लक्ष्म्या वयसश्च योग्यामाज्ञापयामास विहारयात्राम् ॥३.३


$^{20}$ _ "पुत्रस्थितये" का दूसरा अर्थ होगा "पुत्र के (घर में ही) रहने के लिए"। $^{21}$ _ बोधिसत्त्व = बोधि अर्थात् बुद्धत्व प्राप्त करनेवाला प्राणी; वह व्यक्ति, जिसे बुद्धत्व प्राप्त होगा। 14 अश्वघोष

तब पुत्र-नामक उस मनोरथ का विचार सुनकर, राजा से स्नेह, लक्ष्मी और वयस के योग्य विहार-यात्रा की आज्ञा दी ॥३॥ निवर्तयामास च राजमार्गे सम्पातमार्तस्य पृथग्जनस्य । मा भूत्कुमारः सुकुमारचित्तः संविग्नचेता इति मन्यमानः ॥३.४ और, राजमार्ग पर आर्त जनता का निकलना रोक दिया गया, यह सोचते हुए कि सुकुमार मनवाले कुमार के चित्त में कहीं संवेग न हो जाय ॥४॥ प्रत्यङ्गहीनान्विकलेंद्रियांश्च जीर्णातुरान्दीन् कृपणांश्च दिक्षु । ततः समुत्सार्य परेण साम्ना शोभां परा राजपंथस्य चक्रुः ॥३.५ अङ्ग-हीनों, विकलेन्द्रियों, वृद्धों, आतुर आदि लोगों तथा बेचारों को सब ओर परम शान्ति से हटा कर, उन (राज-पुरुषों) ने राज-पथ की परम शोभा की ॥५॥ ततः कृते श्रीमति राजमार्गे श्रीमान्विनीतानुचरः कुमारः । प्रासादपृष्ठादवतीर्य काले कृताभ्यनुज्ञो नृपमभ्यगच्छत् ॥३.६ तब राज मार्ग शोभा-युक्त किया जानेपर, आज्ञा पाकर, श्रीमान् कुमार विनीत अनुचरों के साथ प्रासाद पर से समय पर नीचे उतरा और राजा के समीप गया ॥६॥ अथो नरेन्द्रः सुतमागताश्रुः शिरस्युपाघ्राय चिरं निरीक्ष्य । गच्छेति चाज्ञापयति स्म वाचा स्नेहान्न चैनं मनसा मुमोच ॥३.७ तब राजा ने, जिसे आँसू आ गये थे, पुत्र के शिर को सूंघकर उसे देर तक देखा और “जाओ” कहते हुए आज्ञा दी, किन्तु स्नेह-वश उसे मन से नही छोड़ा ॥७॥ ततः स जाम्बूनदभाण्डभृद्भिर्युक्तं चतुर्भिर्निवृतैस्तुरङ्गैः । अक्लीबविद्वच्छुचिरश्मिधारं हिरण्मयं स्यन्दनमारुरोह ॥३.८ तब वह सुवर्ण आभरण धारण करनेवाले चार शिक्षित तुरंगों से युक्त सुवर्ण-रथ पर सवार हुआ, जिसका सारथि बलवान्, विद्वान् और पवित्र था ॥८॥ ततः प्रकीर्णोज्ज्वलपुष्पजालं विषक्तमाल्यं प्रचलत्पताकम् । मार्गं प्रपेदे सदशानुयात्रश्चन्द्रः सनक्षत्र इवान्तरीक्षम् ॥३.९ तब जिस मार्ग पर उजले फूल बिखरे हुए थे, मालाएँ लटक रही थीं, और पताकाएं फहरा रही थीं उसपर वह योग्य अनुचरों के साथ आया, जैसे आकाश में नक्षत्रों के साथ चन्द्रमा (आवे) ॥९॥ कौतूहलात्स्फीततरैश्च नेत्रैर्नीलोत्पलार्धैरिव कीर्यमाणम् । शनैः शनै राजपंथ जगाहे पौरैः समन्तादभिवीक्ष्यमाणः ॥३.१० कौतूहल से अति विकसित आँखें, जो आधे-आधे नीले कमलों के समान थीं, जिस राज-पथ पर बिखर रही थीं उसपर चारों ओर पुरवासियों द्वारा देखे जाते हुए उसने धीरे-धीरे प्रवेश किया ॥१०॥


तं तुष्टुवुः सौम्यगुणेन केचिद्ववन्दिरे दीप्ततया तथान्ये । सौमुख्यतस्तु श्रियमस्य केचिद्वैपुल्यमाशंसिषुरायुरश्च ॥३.११ कतिपयों ने उनके सौम्य-गुण के लिए उसकी स्तुति की तथा दूसरों ने दीप्ति के लिए उसकी वन्दना की; किन्तु उसकी अनुकूलता के कारण कतिपयों ने उसके लिए लक्ष्मी और दीर्घायु कामना की ॥११॥ निःसृत्य कुब्जाश्च महाकुलेभ्यो व्यूहाश्च कैरातकवामनानाम् । नार्यः कृशेभ्यश्च निवेशनेभ्यो देवानुयानध्वजवतप्रणेमुः ॥३.१२ बड़े-बड़े कुलों के झुण्ड-के-झुण्ड कुबड़े किरात व वामन तथा छोटे-छोटे घरों से स्त्रियाँ निकल आईं। उन सबने उसे वैसे ही प्रणाम किया, जैसे (इन्द्र-) देव की ध्वजा को ॥१२॥ ततः कुमारः खलु गच्छतीति श्रुत्वा स्त्रियः प्रेष्यजनात्प्रवृत्तुम् । दिदृक्षया हर्म्यतलानि जग्मुर्जनेन मान्येन कृताभ्यनुज्ञाः ॥३.१३ तब “कुमार जा रहा है” यह समाचार नौकरों से सुनकर स्त्रियों गुरु-जन से आज्ञा पाकर, उसे देखने की इच्छा से प्रासाद-तल पर गईं ॥१३॥ ताः त्रस्तकाञ्चीगुणविघ्निताश्च सुप्तप्रबुद्धाकुललोचनाश्च । वृत्तान्तविन्यस्तविभूषणाश्च कौतूहलेनानिभृताः परीयुः ॥३.१४ गिरती करधनी से उन्हें बाधा हुई, सोकर उठने से उनकी आँखें आकुल थीं, समाचार सुनकर उन्होंने गहने पहने, कौतूहल के कारण अविनीत होकर वे गईं ॥१४॥ प्रासादसोपानतलप्रणादैः काञ्चीरवैर्नूपुरनिस्वनैश्च । वित्रासयन्त्यो गृहपक्षिणस्त्वानन्योन्वेवेगांश्च समाक्षिपन्त्यः ॥३.१५ महल के सोपान पर पद-तलों के निनाद से, करधनियों के शब्द से और नूपुरों की ध्वनियों से घरेलू पक्षियों के झुण्डों को डराती हुई तथा एक दूसरे के वेगपर अपेक्ष करती हुई (वे गईं) ॥१५॥ कासाञ्चिदासां तु वराङ्गनानां जातत्वराणामपि सोत्सुकानाम् । गतिं गुरुत्वाज्जगृहुर्विशालाः श्रोणीरथाः पीनपयोधराश्च ॥३.१६ उत्सुक होकर शीघ्रता करनेपर भी उन उत्तम स्त्रियों में से कतिपयों की गति को उनके अपने ही विशाल नितम्बों और पीन पयोधरों ने रोका ॥१६॥ शीघ्रं समर्थापि तु गन्तुमन्या गतिं निजग्राह ययौ न तूर्णम् । ह्रियाप्रगल्भा विनिगूहमाना रहःप्रयुक्तानि विभूषणानि ॥३.१७ शीघ्र जाने में समर्थ होनेपर भी दूसरी ने अपनी चाल को रोक लिया और वह तेजी से नही गई, वह सङ्कोचशीला एकान्त में पहने गहनों को लाज से छिपाने लगी ॥१७॥ परस्परोत्पीडनपिण्डितानां सम्मर्दसंक्षोभितकुण्डलानाम् । तासां तदा सस्वनभूषणानां वातायनेष्ववप्रशो बभूव ॥३.१८

बुद्धचरित 15

१. प्रथम-तृतीय सर्ग: भगवत्प्रसूति, अन्तःपुर-विहार एवं संवेग-उत्पत्ति

परस्पर उत्पीड़ित होती हुई वे इकट्ठी हुईं, एक दूसरे की रगड़ से उनके कुण्डल चञ्चल हुए, उनके गहने बज रहे थे। अतः उस समय खिड़कियों पर अशान्ति हुई ॥18 ॥ वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परस्परायासितकुण्डलानि । स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि ॥३.१९ खिड़कियों से निकले हुए स्त्रियों के मुख-कमल, जो एक-दूसरें के कुण्डल संक्षुब्ध कर रहे थे, ऐसे शोभित हुए जैसे महलों में कमल लगे हों ॥19 ॥ ततो विमानैर्युवतीकरालैः कौतूहलोद्घाटितवातयानैः । श्रीमत्समन्तान्नगरं बभासे वियद्विमानैरिव साप्सरोभिः ॥३.२० तब उन विमानों (महलों) से, युवतियों से दन्तुर लगते थे (अर्थात् दाँत निकालकर हँस रह थे) और कौतूहल से जिनके झरोखे खोल दिये गये थे, वह श्री-सम्पन्न नगर चारों ओर इस प्रकार भासित हुआ जिस प्रकार अप्सरा-युक्त देव-प्रासादों से स्वर्ग ॥20 ॥ वातायनानामविशालभावादन्योन्यगण्डार्पितकुण्डलानाम् । मुखानि रेजुः प्रमदोत्तमानां बद्धाः कलापा इव पङ्कजानाम् ॥३.२१ खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी नही होने के कारण जो उत्तम प्रमदाएँ एक दूसरें के गालों पर अपने कुण्डल रक्खे हुई थीं, उनके मुख ऐसे विराजे, जैसे कमलों के बँधे हुए गुच्छे हों ॥21 ॥ तं ताः कुमारं पथि वीक्षमाणाः स्त्रियो बभुर्गामिव गन्तुकामाः । ऊर्ध्वोन्मुखाश्चैनमुदीक्षमाणा नरा बभुर्द्यामिव गन्तुकामाः ॥३.२२ उस कुमार को मार्ग में जाते देखकर स्त्रियों ने मानो (महलों से) पृथ्वी पर आने की कामना की और ऊपर मुख उठाकर उसे देखते हुए पुरुषों ने मानो आकाश में जाने की कामना की ॥22 ॥ दृष्ट्वा च तं राजसुतं स्त्रियस्ता जाज्वल्यमानं वपुषा श्रिया च । धन्यास्य भार्येति शनैरवोचञ्छुद्वैर्मनोभिः खलु नान्यभावात् ॥३.२३ सौन्दर्य और विभूति से चमकते हुए राजा के उस पुत्र को देखकर स्त्रियों ने शुद्ध मन से, निश्चय ही अन्य भाव से नही, धीरे-धीरे कहा- “धन्य है इसकी भार्या" ॥23 ॥ अयं किल व्यायतपीनबाहु रूपेण साक्षादिव पुष्पकेतुः । त्यक्त्वा श्रियं धर्ममुपैष्यतीति तस्मिन् हि ता गौरवमेव चक्रुः ॥३.२४ लम्बी और मोटी बाहुवाला यह कुमार, जो रूप में साक्षात् पुष्पकेतु (कामदेव) के समान है, लक्ष्मी को छोड़कर धर्म के समीप जायगा - इस प्रकार उन्होंने उसका गौरव ही किया ॥24 ॥ कीर्णं तथा राजपथं कुमारः पौरैर्विनीतैः शुचिधीरवेषैः । तत्पूर्वमालोक्य जहर्ष किञ्चिन्मेने पुनर्भावमिवात्मनश्च ॥३.२५ शुचि और धीर वेषवाले विनीत पुर-वासियों से उस प्रकार भरे हुए राज-पथ को पहले पहल देखकर, वह प्रसन्न हुआ और उसने अपना कुछ पुनर्जन्म सा माना ॥25 ॥ पुरं तु तत्स्वर्गमिव प्रहृष्टं शुद्धाधिवासाः समवेक्ष्य देवाः । जीर्णं नरं निर्ममिरे प्रयातुं सञ्चोदनार्थं क्षितिपात्मजस्य ॥३.२६ उस नगर को स्वर्ग के समान प्रसन्न देखकर, शुद्धाधिवास देवों ने एक वृद्ध पुरुष को बनाया कि वह राजा के पुत्र को (घर से वन को) प्रयाण करने के लिए प्रेरित करे ॥26 ॥ ततः कुमारो जरयाभिभूतं दृष्ट्वा नरेभ्यः पृथगाकृतिं तम् । उवाच सङ्गाहकमागतास्थस्तत्रैव निष्कम्पनिविष्टदृष्टिः ॥३.२७ तब कुमार ने जरा (= वृद्धावस्था) से अभिभूत उस पुरुष को जिसकी आकृति (अन्य) पुरुषों से पृथक् थी, देखा और उसी को निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए ध्यान में आकर उसने सारथि से कहाः- ॥27 ॥ क एष भोः सूत नरोऽभ्युपेतः केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः । भ्रूसंवृताक्षः शिथिलावनाङ्गः किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥३.२८ “हे सारथि, यह कौन पुरुष आया? इसके केश सफेद हैं, हाथ में लाठी है, भौंहों से आँखें ढकी हैं, अङ्ग ढीले व झुके हैं। क्या यह विकार है? या स्वभाव? या संयोग?” ॥28 ॥ इत्येवमुक्तः स रथप्रणेता निवेदयामास नृपात्मजाय । संरक्ष्यमप्यर्थमदोषदर्शी तैरेव देवैः कृतबुद्धिमोहः ॥३.२९ ऐसा कहे जानेपर उस सारथि ने राजा के पुत्र से गोपनीय बात भी निवेदन कर दी, इसमें अपना दोष नही देखा, उन्हीं देवों ने उसका बुद्धि-मोह जो कर दिया था ॥29 ॥ रूपस्य हन्त्री व्यसनं बलस्य शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम् । नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणामेषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥३.३० “रूप की हत्या करनेवाली, बल की विपत्ति, शोक की उत्पत्ति (-भूमि) आनन्द की मृत्यु, स्मृति का नाश करनेवाली, इन्द्रियों का शत्रु यह जरा है, जिसने इसे भग्न कर दिया है ॥30 ॥ पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे कालेन भूयः परिसृप्तमुर्व्याम् । क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान् क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥३.३१ बचपन में इसने भी दूध पिया, फिर काल-क्रम से पृथिवी पर पेट के बल चला, क्रम से सुन्दर युवक हुआ, और उसी क्रम से जरा को प्राप्त हुआ है" ॥31 ॥ इत्येवमुक्ते चलितः स किञ्चिद्राजात्मजः सूतमिदं बभाषे । किमेष दोषो भविता ममापीत्यस्मै ततः सारथिरभ्युवाच ॥३.३२ ऐसा कहे जानेपर कुछ विचलित होकर उस राजात्मज ने सारथि से कहा- "क्या यह दोष मुझे भी होगा?” तब सारथि ने उसे कहाः- ॥32 ॥ आयुष्मतोऽप्येष वयःप्रकर्षो निःसंशयं कालवशेन भावी । एवं जरां रूपविनाशयित्रीं जानाति चैवेच्छति चैव लोकः ॥३.३३ 16 अश्वघोष

“आप आयुष्मान् की भी यह वृद्धावस्था कालवश निःसन्देह होगी। ऐसी रूप-विनाशिनी जरा को लोग जानते हैं और इसे चाहते हैं” ॥३३॥ ततः स पूर्वाशयशुद्धबुद्धिर्विस्तीर्णकल्पाचितपुण्यकर्मा । श्रुत्वा जरां संविविजे महात्मा महाशनेर्घोषमिवान्तिके गौः ॥३.३४ तब वह महात्मा, पूर्व के विचारों से जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गई थी, और अनेक कल्पों में जिसके पुण्य कर्म एकत्र हुए थे, जरा को सुनकर वैसे ही संविग्न हुआ, जैसे समीप में महावज्र का शब्द सुनकर गाय ॥३४ ॥ निःश्वस्य दीर्घं स्वशिरः प्रकंप्य तस्मिंश्च जीर्णे विनिवेश्य चक्षुः । तां चैव दृष्ट्वा जनतां सहर्षां वाक्यं स संविग्न इदं जगाद ॥३.३५ लम्बी साँसे लेकर, अपना शिर कँपाकर, उस वृद्ध की ओर दृष्टि लगाये हुए, उस जनता को प्रसन्न देखकर, उस संविग्न ने यह वाक्य कहा:- ॥३५ ॥ एवं जरा हन्ति च निर्विशेषं स्मृतिं च रूपं च पराक्रमं च। न चैव संवेगमुपैति लोकः प्रत्यक्षतोऽपीदृशमीक्षमाणः ॥३.३६ “इस प्रकार जरा, स्मृति रूप और पराक्रम की बिना भेद-भाव के हत्या करती है; और प्रत्यक्ष ऐसा देखते हुए भी लोगों को संवेग नही होता ॥३६॥ एवं गते सूत निवर्त्तयाश्वान् शीघ्रं गृहाण्येव भवान्प्रयातु । उद्यानभूमौ हि कुतो रतिर्मे जरामये चेतसि वर्तमाने ॥३.३७ ऐसा होनेपर, हे सारथि, घोड़ों को लौटाइये, शीघ्र घर को ही आप चलें; चित्त में जरा का भय रहनेपर उद्यान-भूमि में मुझे कहाँ से आनन्द होगा?” ॥३७॥ अथाज्ञया भर्तुसुतस्य तस्य निवर्तयामास रथं नियन्ता । ततः कुमारो भवनं तदेव चिन्तावशः शून्यमिव प्रपेदे ॥३.३८ अनन्तर उस स्वामि पुत्र की आज्ञा से सारथि ने रथ को लौटाया। तब कुमार उसी महल में पहुँचा, जो उस चिन्तित के लिए शून्य-सा था ॥३८ ॥ यदा तु तत्रैव न शर्म लेभे जरा जरेति प्रपरीक्षमाणः । ततो नरेन्द्रानुमतः स भूयः क्रमेण तेनैव बहिर्जगाम ॥३.३९ “जरा-जरा (क्या है)” इस प्रकार (इसे) परखते हुए जब उसने वहाँ भी शान्ति नहीं पाई, तब राजा की अनुमति से वह फिर उसी क्रम से बाहर गया ॥३९॥ अथापरं व्याधिपरीतदेहं त एव देवाः ससृजुर्मनुष्यम् । दृष्ट्वा च तं सारथिमाबभाषे शौद्धोदनिस्तद्गतदृष्टिरेव ॥३.४० तब उन्हीं देवों ने रोग से ग्रस्त देहवाले दूसरे मनुष्य का सृजन किया और उसे देखकर शुद्धोदन के पुत्र ने उसी की ओर दृष्टि किये हुए सारथि से कहा:- ॥४०॥ स्थूलोदरः श्वासचलच्छरीरः स्रस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः । अम्बेति वाचं करुणं ब्रुवाणः परं समाश्रित्य नरः क एषः ॥३.४१ “यह कौन मनुष्य है? इसका पेट फूला हुआ है, साँस से शरीर काँप रहा है, कन्धे और बाहुएँ ढीली हैं, गात दुबला और पीला है। दूसरे का सहारा लेकर करुण स्वर से ‘माँ माँ’ कह रहा है” ॥४१॥ ततोऽब्रवीत्सार्थिरस्य सौम्य धातुप्रकोपप्रभवः प्रवृद्धः । रोगाभिधानः सुमहाननर्थः शक्तोऽपि येनैष कृतोऽस्वतन्त्रः ॥३.४२ तब सारथि ने इसे कहा- “हे सौम्य (त्रि-) धातु-प्रकोप से उत्पन्न होकर बढ़ा हुआ यह रोगनामक महा- अनर्थ है, जिसने इस शक्तिमान् को भी परतन्त्र कर दिया है” ॥४२॥²² इत्यूचिवान् राजसुतः स भूयस्तं सानुकम्पो नरमीक्षमाणः । अस्यैव जातो पृथगेष दोषः सामान्‍यतो रोगभयं प्रजानाम् ॥३.४३ उस मनुष्य की अनुकम्पा के साथ देखते हुए उस नृपात्मज ने पुनः पूछा- “यह दोष केवल इसी को हुआ है या रोग का भय समान रूप से (सब) प्रजाओं को है?” ॥४३॥ ततो बभाषे स रथप्रणेता कुमार साधारण एष दोषः । एवं हि रोगैः परिपीड्यमानो रुजातुरो हर्षमुपैति लोकः ॥३.४४ तब बह सारथि बोला- “हे कुमार, यह दोष साधारण है। इस प्रकार रोगों से परिपीड़ित होता हुआ, कष्ट से आतुर संसार हर्ष को प्राप्त होता है” ॥४४॥ इति श्रुतार्थः स विषण्णचेताः प्रावेपताम्बूर्भिगतः शशीव । इदं च वाक्यं करुणायमानः प्रोवाच किञ्चिन्मृदुना स्वरेण ॥३.४५ यह व्याख्या सुनकर, वह विषण्ण-चित्त (हो गया और) जल-तरङ्ग में पड़ते चन्द्र (-प्रतिबिम्ब) के समान काँपने लगा और दया से द्रवीभूत होते हुए उसने कुछ मृदु स्वर से यह वाक्य कहा:- ॥४५॥ इदं च रोगव्यसनं प्रजानां पश्यंश्च विश्रम्भमुपैति लोकः । विस्तीर्णविज्ञानमहो नराणां हसन्ति ये रोगभयैरमुक्ताः ॥३.४६ “प्रजाओं की यह रोगरूप विपत्ति देखते हुए भी संसार विश्वस्त (=निर्भीक) रहता है। अहो, (कितना) विशाल अज्ञान है (इन) मनुष्यों का, जो रोग-भय से अमुक्त होकर भी हँस रहे हैं ॥४६॥ निवर्त्यतां सूत बहिःप्रयाणान्नरेन्द्रसद्मैव रथः प्रयातु । श्रुत्वा च मे रोगभयं रतिभ्यः प्रत्याहतं सङ्कुचतीव चेतः ॥३.४७ हे सारथि, बाहर जाने से रथ को लौटाइये, यह राज-महल को ही चले। और रोग-भय सुनकर विषयों से प्रत्याहत मेरा मन सिकुड़-सा रहा है” ॥४७॥


²²- त्रिधातु = कफ, पित्त, वायु। बुद्धचरित 17

ततो निवृत्तः स निवृत्तहर्षः प्रध्यानयुक्तः प्रविवेश वेश्म। तं द्विरस्तथा प्रेक्ष्य च सन्निवृत्तं पर्येषणं भूमिपतिश्चकार ॥३.४८ तब हर्ष-रहित होकर वह लौटा, चिन्तित होकर अपने महल में घुसा। और, उसे दो बार उस प्रकार लौटा देखकर, राजा ने जिज्ञासा की ॥48॥ श्रुत्वा निमित्तं तु निवर्तनस्य सन्त्यक्तमात्मानमनेन मेने। मार्गस्य शौचाधिकृताय चैव चुक्रोश रुष्टोऽपि च नोग्रदण्डः ॥३.४९ लौटने का कारण सुनकर उसने अपने को उससे परित्यक्त माना। और मार्ग के शौचाधिकारी की भर्त्सना की, रुष्ट होनेपर भी वह उग्रदण्ड नहीं हुआ अर्थात् कठोर दण्ड नहीं दिया ॥49॥ भूयश्च तस्मै विदधे सुताय विशेषयुक्तं विषयप्रचारम्। चलेन्द्रियत्वादपि नाम सक्तो नास्मान्विजह्यादिति नाथमानः ॥३.५० और फिर उस पुत्र के लिए विशेष विषय-सेवन का प्रबन्ध किया, इस आशा से कि- “शायद इन्द्रिय- चञ्चलता के कारण (विषयों में) आसक्त होकर (यह) हमें न छोड़े” ॥50॥ यदा च शब्दादिभिरिन्द्रियार्थैरन्तःपुरे नैव सुतोऽस्य रेमे। ततो बहिर्व्यादिशति स्म यात्रां रसान्तरं स्यादिति मन्यमानः ॥३.५१ और जब शब्द आदि इन्द्रिय-विषयों से अन्तःपुर में उसके पुत्र को आनन्द नहीं हुआ, तब (राजा ने) बाहर यात्रा करने का आदेश दिया, यह समझते हुए कि (इससे कहीं) रुचि-परिवर्तन हो जाय ॥51॥ स्नेहाच्च भावं तनयस्य बुद्ध्वा स रोगदोषानविचिन्त्य कांश्चित्। योग्याः समाज्ञापयति स्म तत्र कलास्वभिज्ञा इति वारमुख्याः ॥३.५२ और स्नेह से पुत्र का भाव समझकर तथा राग के किन्हीं दोषों का बिना विचार किए ही उसने कलाओं में निपुण योग्य वारमुख्याँ (= सम्मानित वेश्याओं) को वहाँ (रहने की) आज्ञा दी ॥52॥ ततो विशेषेण नरेन्द्रमार्ग स्वलङ्कृते चैव परीक्ष्यिते च। व्यत्यस्य सूतं च रथं च राजा प्रस्थापयामास बहिः कुमारम् ॥३.५३ तब विशेषता के साथ राज-मार्ग अलङ्कृत और परीक्षित होनेपर, सारथि एवं रथ को बदलकर राजा ने कुमार को बाहर प्रस्थान कराया ॥53॥ ततस्तथा गच्छति राजपुत्रे तैरेव देवैर्विहितो गतासुः। तं चैव मार्गे मृतमुह्यमानं सूतः कुमारश्च ददर्श नान्यः ॥३.५४ जब राजा का पुत्र उस प्रकार जा रहा था, तब उन्हीं देवों ने एक निष्प्राण (व्यक्ति) को बनाया। और, मार्ग में ढोये जाते उस मरे हुए को सारथि और कुमार ने देखा, दूसरे किसी ने नहीं ॥54॥ अथाब्रवीद्राजसुतः स सूतं नरैश्चतुर्भिर्हियते क एषः। दीनैर्मनुष्यैरनुगम्यमानो (वि)भूषितश्चाप्यवरुद्यते च ॥३.५५ तब उस राज-कुमार ने सारथि से कहा- “यह कौन है? इसे चार पुरुष लिये जा रहे हैं, दीन मनुष्य इसके पीछे-पीछे जा रहे हैं, और विशेषता से भूषित होनेपर भी इसके लिए रोया जा रहा है” ॥55॥ ततः स शुद्धात्मभिरेव देवैः शुद्धाधिवासैरभिभूतचेताः। अवाच्यमप्यर्थमिमं नियन्ता प्रव्याजहारार्थवदीश्वराय ॥३.५६ तब शुद्ध स्वभाववाले शुद्धाधिवास देवों ने जिसका चित्त अभिभूतकर दिया था उस सारथि ने यह अवाच्य बात भी (उस) पर-श्रेष्ठ से कही:- ॥56॥ बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः सुप्तो विसञ्ज्ञस्तृणकाष्ठभूतः। सम्वर्ध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैस्त्यज्यत एष कोऽपि ॥३.५७ “यह कोई है, जो बुद्धि इन्द्रियों प्राणों और गुणों से वियुक्त, (सदा के लिए) सोया हुआ और सञ्ज्ञा-हीन है, तथा तृण एवं काष्ठ (के समान) हो गया है। प्रयत्नपूर्वक संवर्धन और संरक्षण करके भी प्रिय (स्व-) जन इसे छोड़ रहे हैं” ॥57॥ इति प्रणेतुः स निशम्य वाक्यं सञ्चक्षुभे किञ्चिदुवाच चैनम्। किं केवलोऽस्यैव जनस्य धर्मः सर्वप्रजानामयमीदृशोऽन्तः ॥३.५८ सारथि का वाक्य सुनकर, वह कुछ संक्षुब्ध हुआ और उसे कहा- “क्या यह धर्म केवल इसी मनुष्य का है या सब प्रजाओं (=जीवों) का अन्त ऐसा ही है?” ॥58॥ ततः प्रणेता वदति स्म तस्मै सर्वप्रजानामिदमन्तकर्म। हीनस्य मध्यस्य महात्मनो वा सर्वस्य लोके नियतो विनाशः ॥३.५९ तब सारथि ने उससे कहा- “सब प्रजाओं (=जीवों) का यह अन्तिम कर्म है। हीन मध्य या महात्मा का, संसार में सबका, विनाश नियत है” ॥59॥ ततः स धीरोऽपि नरेन्द्रसूनुः श्रुत्वैव मृत्युं विषसाद सद्यः। अंसेन संशिष्य च कूबराग्रं प्रोवाच निह्लादवता स्वरेण ॥३.६० तब धीर होनेपर भी उस राजकुमार को, मृत्यु (की बात) सुनकर, तुरत विषाद हो गया। और कन्धे से कूबर²³ के अग्रभाग का सहारा लेकर, उसने गम्भीर स्वर से कहा:- ॥60॥ इयं च निष्ठा नियता प्रजानां प्रमाद्यति त्यक्तभयश्च लोकः। मनांसि शङ्के कठिनानि नृणां स्वस्थास्तथा ह्यध्वनि वर्तमानाः ॥३.६१ “प्रजाओं का यह विनाश नियत है और संसार भय छोड़कर असावधानी कर रहा है। मनुष्यों के मन, मैं सोचता हूँ, कठोर हैं, क्योंकि (मृत्यु-) मार्ग में रहते हुए वे उस प्रकार सुखी हैं ॥61॥ तस्माद्रथं सूत निवर्तयतां नो विहारभूमेनं हि देशकालः। जानन्विनाशं कथ मार्त्तिकाले सचेतनः स्यादिह हि प्रमत्तः ॥३.६२


²³ कूबर = रथ का कोई भाग।


18 अश्वघोष

इसलिए, हे सारथि, हमारे रथ को लौटाइये, विहार-भूमि (में जाने) का (यह) देश-काल नही है। अपना विनाश जानता हुआ (कोई भी) बुद्धिमान् सङ्कट-काल में कैसे असावधान हो सकता है?" ॥६२॥ इति ब्रुवाणेऽपि नराधिपात्मजे निवर्तयामास स नैव तं रथम् । विशेषयुक्तं तु नरेन्द्रशासनात्स पद्मषण्डं वनमेव निर्ययौ ॥३.६३ राज-पुत्र के ऐसा बोलते रहनेपर भी उसने रथ को नही लौटाया, किन्तु राजा की आज्ञा से वह पद्मषण्ड वन को निकल गया, जो विशेषता से युक्त था ॥63॥ ततः शिवं कुसुमितबालपादपं परिश्रमत्रमुदितमत्तकोकिलम् । विमानवत्स कमलचारुदीर्घिकं ददर्श तन्नन्दनमिव नन्दनं वनम् ॥३.६४ तब उसने कुसुमित बाल-पादपों, घूमते हुए प्रमुदित मत्त कोकिलों, विमानों, तथा कमलों के सुन्दर पोखरों से युक्त उस भव्य वन को देखा, जो नन्दन-वन के समान था ॥64॥ वराङ्गनागणकलिलं नृपात्मजस्ततो बलाद्वनमनिनीयते स्म तत् । वराप्सरोवृतमलकाधिपालयं नवव्रतो मुनिरिव विघ्नकातरः ॥३.६५ तब श्रेष्ठ स्त्रियों से भरे वन में राजा का पुत्र बलात् ले जाया गया, जैसे श्रेष्ठ अप्सराओं से पूर्ण कुबेर- प्रासाद में नया व्रतवाला विघ्न-कातर मुनि (बलात् ले जाया जा रहा हो) ॥65॥$^{24}$ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये संवेगोत्पत्तिर्नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥

चतुर्थ सर्ग

स्त्री-निवारण

ततस्तस्मात्पुरोद्यानात्कौतूहलचलेक्षणाः । प्रत्युज्जग्मुर्नृपसुतं प्राप्तं वरमिव स्त्रियः ॥४.१ तब उस नगर-उद्यान से निकलकर कौतूहल से चञ्चल आँखोंवाली स्त्रियों ने राजा के पुत्र की, मानो आये हुए वर की, अगवानी की ॥1॥ अभिगम्य च तास्तस्मै विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । चक्रिरे समुदाचारं पद्मकोशनिभैः करैः ॥४.२ समीप आकर उन्होंने, जिनकी आँखें विस्मय से विकसित हो गईं, पद्मकोश-सदृश हाथों (के सम्पुटों) से उसका सत्कार किया ॥2॥ तस्थुश्च परिवार्यैनं मन्मथाक्षिप्तचेतसः । निश्चलैः प्रीतिविकचैः पिबन्त्य इव लोचनैः ॥४.३


और काम से आकृष्ट चित्तवाली वे (स्त्रियाँ) उसे घेरकर प्रीति से विकसित हुए निश्चल आँखों से उसे मानो पीती रहीं (अर्थात् उसकी रूप-सुधा का पान करती रहीं) ॥3॥ तं हि ता मेनिरे नार्यः कामो विग्रहवानिव । शोभितं लक्षणैर्दीप्तैः सहजैर्भूषणैरिव ॥४.४ उज्ज्वल लक्षणों से, मानो स्वाभाविक भूषणों से, शोभित उस (कुमार) को उन नारियों ने मूर्त कामदेव माना ॥4॥ सौम्यत्वाच्चैव धैर्याच्च काश्चिदेनं प्रजज्ञिरे । अवतीर्णे महीं साक्षाद्गूढांशुश्चन्द्रमा इव ॥४.५ उसकी सौम्यता और धैर्य से कतिपयों ने उसे पृथ्वी पर अवतीर्ण साक्षात् चन्द्रमा माना, जिसकी किरणें गुप्त थीं ॥5॥ तस्य ता वपुषाक्षिप्ता निगृहीतं जजृम्भिरे । अन्योन्यं दृष्टिभिर्हत्वा शनैश्च विनिशश्वसुः ॥४.६ उसके रूप से आकृष्ट होकर, उन्होंने (हाथों से मुँह) पकड़े हुए जँभाई ली और एक दूसरे के ऊपर दृष्टि से प्रहार कर धीरे-धीरे साँसें लीं ॥6॥ एवं ता दृष्टिमात्रेण नार्यो ददृशुरेव तम् । न व्याजह्रर्न जहसुः प्रभावेणास्य यन्त्रिताः ॥४.७ इस प्रकार उन स्त्रियों ने केवल आँखों से उसे देखा और उसके प्रभाव के वश में होकर, वे न (कुछ) बोलीं, न हँसीं ॥7॥ तास्तथा तु निरारम्भा दृष्ट्वा प्रणयविक्लवाः । पुरोहितसुतो धीमानुदायी वाक्यमब्रवीत् ॥४.८ उन्हें उस प्रकार से (कुछ) आरम्भ नहीं करती तथा प्रेमविह्वल देखकर, पुरोहित-पुत्र बुद्धिमान् उदायी ने ये वचन कहे:– ॥8॥ सर्वाः सर्वकलाज्ञाः स्थ भावग्रहणपण्डिताः । रूपचातुर्यसम्पन्नाः स्वगुणैर्मुख्यतां गताः ॥४.९ "तुम सब सब कलाओं में निपुण हो, भाव जानने में निपुण हो, रूप और चतुराई से युक्त हो, अपने गुणों से मुख्यता को प्राप्त हो ॥9॥ शोभयेत गुणैरेभिरपि तानुत्तरान् कुरून् । कुवेरस्यापि चाक्रीडं प्रागेव वसुधामिमाम् ॥४.१०


$^{24}$ विघ्न-कातर = विघ्न (पड़ने के भय) से कातर।

बुद्धचरित 19

इन गुणों से उत्तरकुरुओं को भी शोभित कर सकती हो, कुबेर के उद्यान को भी, इस वसुधा को तो पहले ही ॥10 ॥$^{25}$ शक्ताश्चालयितुं यूयं वीतरागानृषीनपि । अप्सरोभिश्च कलितान् ग्रहीतुं विबुधानपि ॥४.११ तुम लोग वीतराग ऋषियों को भी चलायमान कर सकती हो और अप्सराओं के वशीभूत देवों को भी आकृष्ट कर सकती हो ॥11 ॥ भावज्ञानेन हावेन रूपचातुर्यसम्पदा । स्त्रीणामेव च शक्ताः स्थ संरागे किं पुनर्नृणाम् ॥४.१२ भाव-ज्ञान से, हाव-भाव से, तथा रूप व चतुरता की सम्पत्ति से स्त्रियों को भी अनुरक्त कर सकती हो, फिर पुरुषों का क्या कहना ॥12 ॥ तासामेवंविधानां वो नियुक्तानां स्वगोचरे । इयमेवंविधा चेष्टा न तुष्टोऽस्म्यार्जवेन वः ॥४.१३ ऐसी तुम लोगों में से उनका, जो अपने अपने विषय (= अधिकार-क्षेत्र) में जुट नहीं रही हैं, यह ऐसा आचरण! तुम लोगों की सरलता से मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ ॥13 ॥ इदं नववधूनां वो हीनिकुञ्चितचक्षुषाम् । सदृशं चेष्टितं हि स्यादपि वा गोपयोषिताम् ॥४.१४ तुम लोगों का यह आचरण लाज से आँख मींचनेवाली नव-वधुओं या गोप-स्त्रियों के योग्य है ॥14 ॥ यद्यपि स्यादयं धीरः श्रीप्रभावान्महानिति । स्त्रीणामपि महत्तेज इतः कार्योऽत्र निश्चयः ॥४.१५ यद्यपि यह धीर तथा बड़ा ही श्रीमान् और तेजस्वी हो सकता है, स्त्रियों का भी तेज महान् है। इसलिए इस (विषय) में निश्चय करो ॥15 ॥ पुरा हि काशिसुन्दर्या वेशवध्वा महानृषिः । ताडितोऽभूत्पदा व्यासो दुर्धर्षो देवतैरपि ॥४.१६ प्राचीन काल में काशि-सुन्दरी (नामक) वेश्या ने महर्षि व्यास को, जो देवताओं के लिए भी दुर्धर्ष था, पाँव से मारा ॥16 ॥ मन्थालगौतमो भिक्षुर्जङ्गया वारमुख्यया । पिप्रीषुश्च तदर्थार्थं व्यसून्रिरहरत्पुरा ॥४.१७ पूर्वकाल में जङ्घा नामक वेश्या से सम्भोग करने की इच्छा से और उसे प्रसन्न करने की इच्छा से, मन्थाल गौतम ने उसके धन के लिए लाशों को ढोया ॥17 ॥$^{26}$


गौतमं दीर्घतपसं महर्षिं दीर्घजीविनम् । योषित्सन्तोषयामास वर्णस्थानावरा सती ॥४.१८ दीर्घतपस गौतम (नामक) महर्षि को, जो दीर्घकाल तक जीवन धारण कर चुका था, नीच वर्ण व स्थिति की स्त्री ने सन्तुष्ट किया ॥18 ॥ ऋष्यशृङ्गं मुनिसुतं तथैव स्त्रीष्वपण्डितम् । उपायैर्विविधैः शान्ता जग्राह च जहार च ॥४.१९ उसी प्रकार मुनि-तनय ऋष्यशृङ्ग को, जो स्त्रियों (के विषय) में अज्ञानी था, शान्ता विविध उपायों से पकड़कर ले गई ॥19 ॥ विश्वामित्रो महर्षिश्च विगाढोऽपि महत्तपः । दश वर्षाण्यहर्मेने घृताच्याप्सरसा हतः ॥४.२० महा-तपस्या में अवगाहन करनेपर भी महर्षि विश्वामित्र घृताची अप्सरा के द्वारा हरण किया गया और उस महर्षि ने उसके साथ (बिताये गये) दश वर्षों को एक दिन माना ॥20 ॥ एवमादीनृषींस्तांस्ताननयन्विक्रियां स्त्रियः । ललितं पूर्ववयसं किं पुनर्नृपतेः सुतम् ॥४.२१ इस प्रकार के उन अनेक ऋषियों को स्त्रियों ने विकृत किया। फिर राजा के सुन्दर और तरुण पुत्र का क्या कहना ॥21 ॥ तदेवं सति विश्रब्धं प्रयतध्वं तथा यथा । इयं नृपस्य वंशश्रीरितो न स्यात्पराङ्मुखी ॥४.२२ ऐसा होनेपर विश्वासपूर्वक वैसा प्रयत्न करो जिससे राजा की यह वंश-लक्ष्मी यहाँ से विमुख न हो जाय ॥22 ॥ या हि काश्चिद्युवतयो हरन्ति सदृशं जनम् । निकृष्टोत्कृष्टयोर्भावं या गृह्णन्ति ता तु स्त्रियः ॥४.२३ जो कोई भी युवतियाँ (अपने) सदृश जन का (चित्त) हरण कर सकती है; किन्तु निकृष्ट और उत्कृष्ट के (मनो-) भाव को जो आकृष्ट करती हैं वे ही (वास्तविक) स्त्रियाँ हैं" ॥23 ॥ इत्युदायिवचः श्रुत्वा ता विद्धा इव योषितः । समारुरुहुरात्मानं कुमारग्रहणं प्रति ॥४.२४ उदायी के ये वचन सुनकर (बाण-) विद्ध-सी वे स्त्रियाँ कुमार को आकृष्ट करने के लिए अपने ऊपर आरूढ़ हुईं (तुल गईं) ॥24 ॥


$^{25}$ - उत्तरकुरु एक वर्गाकार द्वीप है, जो मेरु के उत्तर भाग में स्थित है-अ० को० 3.55 $^{26}$ - भज् + सन् + ड = भिक्षुः। सम्भवतः उस वेश्या के यहाँ जानेवाले धनवान् पुरुषों की धन के लोभ से हत्या की जाती होगी और मन्थाल गौतम शवों को ढोता होगा। यह श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ता है।

| 20 | अश्वघोष |

ता भ्रूभिः प्रेक्षितैर्हावैर्हसितैर्ललितैर्गतैः। चक्रुराक्षेपिकाश्चेष्टा भीतभीता इवाङ्गनाः ॥४.२५ भय-भीत सी उन स्त्रियों ने भौंहों, दृष्टि-पातों, हावों, हासों, विलासों और चालों से आकर्षण चेष्टाएँ कीं ॥25॥ राज्ञस्तु विनियोगेन कुमारस्य च मार्दवात्। जहुः क्षिप्रमविश्रम्भं मदेन मदनेन च ॥४.२६ राजा के आदेश और कुमार की मृदुता के कारण मद व मदन के वश होकर उन्होंने शीघ्र ही अविश्वास छोड़ा ॥26॥ अथ नारीजनवृतः कुमारो व्यचरद्वनम्। वासितायूथसहितः करीव हिमवद्वनम् ॥४.२७ तब स्त्रियों से घिरे कुमार ने वन में विचरण किया, जैसे हथिनियों के साथ हाथी हिमालय के वन में ॥27॥ स तस्मिन् कानने रम्ये जज्वल स्त्रीपुरःसरः। आक्रीड इव विभ्राजे विवस्वानप्सरोवृतः ॥४.२८ उस रम्य कानन में स्त्रियों के आगे-आगे जानेवाला वह वैसे ही प्रज्वलित हुआ, जैसे विभ्राज (=वैभ्राज) उद्यान में अप्सराओं से घिरा विवस्वान् (=देवता या सूर्य) ॥28॥ मदेनावर्जिता नाम तं काश्चित्तत्र योषितः। कठिनैः पस्पृशुः पीनैः संहतैर्वल्गुभिः स्तनैः ॥४.२९ मद से अनवत कुछ स्त्रियों ने अपने कठिन, पीन, दृढ़ और सुन्दर स्तनों से उसे स्पर्श किया ॥29॥ स्रस्तांसकोमललम्बमृदुबाहुलताबला। अनृतं स्खलितं काचित्कृत्वैनं सस्वजे बलात् ॥४.३० झुके हुए कन्धे से कोमलतापूर्वक लटकती मृदु बाहुलताओंवाली किसी अबला ने बनावटी गिरना दिखाकर उसे बलात् आलिङ्गन किया ॥30॥ काचित्ताम्राधरोष्ठेन मुखेनासवगन्धिना। विनिशश्वास कर्णेऽस्य रहस्यं श्रूयतामिति ॥४.३१ किसी ने मदिरा गन्ध-युक्त मुख से, जिसका निचला होंठ ताम्रवर्ण का था, उसके कान में धीरे-धीरे कहा— “रहस्य सुनिये” ॥31॥$^{27}$ काचिदाज्ञापयन्तीव प्रोवाचार्द्रानुलेपना। इह भक्तिं कुरुष्वेति हस्तसंश्लेषलिप्सया ॥४.३२ गीला अनुलेपवाली किसी ने (उसके) हाथ का स्पर्श पाने की इच्छा से मानो आज्ञा देते हुए कहा—“यहाँ भक्ति करो” ॥32॥$^{28}$ मुहुर्मुहुर्मदव्याजस्रस्तनीलांशुकापरा। आलक्ष्येरशना रेजे स्फुरद्विद्युदिव क्षपा ॥४.३३ मद के बहाने बार-बार नीला अञ्चल गिरानेवाली दूसरी स्त्री, जिसकी करधनी कुछ-कुछ दिखाई पड़ती थी, चमकती बिजलीवाली रात के समान शोभित हुई ॥33॥ काश्चित्कनककाञ्चीभिर्मुखराभिरितस्ततः। बभ्रमुर्दर्शयन्त्योऽस्य श्रोणीस्तन्वंशुकावृताः ॥४.३४ मुखर सुवर्ण कटि-भूषणों से, महीन कपड़ों से ढँके अपने नितम्बों को दिखाती हुई कोई इधर-उधर घूमीं ॥34॥ चूतशाखां कुसुमितां प्रगृह्यान्या ललम्बिरे। सुवर्णकलशप्रख्यान्दर्शयन्त्यः पयोधरान् ॥४.३५ दूसरी (स्त्रियाँ) आम की कुसुमित डाल पकड़कर, सुवर्ण-कलश सदृश अपने स्तनों को दिखाती हुई, लटकीं ॥35॥ काचित्पद्मवनादेत्य सपद्मा पद्मलोचना। पद्मवक्त्रस्य पार्श्वेऽस्य पद्मश्रीरिव तस्थुषी ॥४.३६ कोई कमलाक्षी कमल-वन से कमल के साथ आकर कमल-मुख के पास कमल की श्री के समान खड़ी हुई ॥36॥ मधुरं गीतमन्वर्थं काचित्साभिनयं जगौ। तं स्वस्थं चोदयन्तीव वञ्चितोऽसीत्यवेक्षितैः ॥४.३७ किसी ने स्पष्ट अर्थ से युक्त मधुर गीत अभिनयपूर्वक गाया, और उस स्वस्थ को दृष्टि-पातों से उत्तेजित करते हुए माना कहा—“तुम वंचित हो रहे हो” ॥37॥ शुभेन वदनेनान्या भ्रूकार्मुकविकर्षिणा। प्रावृत्यानुचकारास्य चेष्टितं धीरलीलया ॥४.३८ दूसरी ने लौटकर भौंहरूप तीर खींचनेवाले सुन्दर मुख से इसकी चेष्टा का स्थिर लीला से अनुकरण किया ॥38॥


$^{27}$- विनिशश्वास = साँसें छोड़ी, वचन से नही कहकर साँसों से कहा अर्थात् इतना धीरे-धीरे कहा कि केवल साँसें ही सुन पड़ती थीं। $^{28}$- भक्ति = शोभा के लिए शरीर पर की जानेवाली रेखा-रचना; श्रद्धा, प्रेम।

बुद्धचरित 21

पीनवल्गुस्तनी काचिद्धासाघूर्णितकुण्डला । उच्चैरवजहासैनं समामोतु भवानिति ॥४.३९ परिपूर्ण एवं सुन्दर स्तनोंवाली किसी ने, जिसके कुण्डल उसकी हँसी से हिल रहे थे, “आप समाप्त करें,” यह कहते हुए, जोरों से उसका उपहास किया ॥39 ॥ अपयान्तं तथैवान्या बबन्धुर्माल्यादामभिः । काश्चित्साक्षेपमधुरैर्जगृहुर्वचनाङ्कुशैः ॥४.४० उसी प्रकार दूसरी ने (बाहों से) हटते हुए (कुमार) को मालाओं की डोरियों से बाँधा; किन्हीं ने आक्षेप- युक्त मधुर वचनरूप अङ्कुशों से उसे रोका ॥40 ॥ प्रतियोगार्थिनी काचिद्गृहीत्वा चूतवल्लरीम् । इदं पुष्पं तु कस्येति पप्रच्छ मदविक्लवा ॥४.४१ प्रतियोग (= विरोध) चाहनेवाली किसी ने आम की मञ्जरी लेकर मद से विह्वल होते हुए पूछा- “यह फूल किसका है?” ॥41 ॥ काचित्पुरुषवत्कृत्वा गतिं संस्थानमेव च । उवाचैनं जितः स्त्रीभिर्जय भो पृथिवीमिमाम् ॥४.४२ किसी ने पुरुष के समान गति और आकृति बनाकर उसे कहा- “तुम स्त्रियों द्वारा जीते गये, अब इस पृथिवी को जीतो” ॥42 ॥ अथ लोलेक्षणा काचिज्जिघ्रन्ती नीलमुत्पलम् । किञ्चिन्मदकलैर्वाक्यैर्नृपात्मजमभाषत ॥४.४३ तब नीले कमल को सूँघती हुई किसी चञ्चलाक्षी ने मद से कुछ-कुछ अस्फुट वचनों में राजकुमार से कहा- ॥43 ॥ पश्य भर्तःश्रितं चूतं कुसुमौर्मधुगन्धिभिः । हेमपञ्जररुद्धो वा कोकिलो यत्र कूजति ॥४.४४ “स्वामिन्, मधु-गन्ध-युक्त फूलों से भरे आम को देखिये, जहाँ कोकिल इस प्रकार (निश्चल होकर) कूज रहा है, जैसे सोने के पिजड़े में बन्द हो ॥44 ॥ अशोको दृश्यतामेष कामिशोकविवर्धनः । रुवन्ति भ्रमरा यत्र दह्यमाना इवाग्निना ॥४.४५ कामियों का शोक बढ़ानेवाले इस अशोक को देखिये, जहाँ भौंरे इस तरह गूँज रहे हैं, जैसे आग से जल रहे हों ॥45 ॥ चूतयष्ट्या समाश्लिष्टो दृश्यतां तिलकद्रुमः । शुक्लवासा इव नरः स्त्रिया पीताङ्गरागया ॥४.४६ आम की शाखा से आलिङ्गित होते तिलक-वृक्ष को देखिये, जैसे श्वेतवस्त्रधारी पुरुष पीत अङ्ग-रागवाली स्त्री से आलिङ्गित हो रहा हो ॥46 ॥ फुल्लं कुरुबकं पश्य निर्भुक्ताक्तकप्रभम् । यो नखप्रभया स्त्रीणां निर्भर्त्सित इवानतः ॥४.४७ निचोड़े हुए अलक्तक (= लाख) के समान प्रभावान् कुसुमित कुरुबक को देखिये, जो स्त्रियों को नख-प्रभा से मानो खूब फटकारा जाकर झुक गया है ॥47 ॥ बालाशोकश्च निचतो दृश्यतामेष पल्लवैः । योऽस्माकं हस्तशोभाभिर्लज्जमान इव स्थितः ॥४.४८ पल्लवों से भरे इस बाल अशोक को देखिये, जो हमारे हाथों की शोभा से मानो लजाता हुआ खड़ा है ॥48 ॥ दीर्घिकां प्रावृतां पश्य तीरजैः सिन्दुवारकैः । पाण्डुरांशुकसंवीतां शयानां प्रमदामिव ॥४.४९ तीर पर उत्पन्न होनेवाले सिन्दुवारों से आच्छादित दीर्घिका (जलाशय) को देखिये, जो श्वेत वस्त्र से ढंकी सो रही प्रमदा के समान है ॥49 ॥ दृश्यतां स्त्रीषु माहात्म्यं चक्रवाको ह्यसौ जले । पृष्ठतः प्रेष्यवद्भार्यामनुवर्त्यनुगच्छति ॥४.५० स्त्रियों का माहात्म्य तो देखिये; वह आज्ञाकारी चक्रवाक जल में अपनी पत्नी के पीछे-पीछे नौकर के समान जा रहा है ॥50 ॥ मत्तस्य परपुष्टस्य रुवतः श्रूयतां ध्वनिः । अपरः कोकिलोऽन्वक्षं प्रतिश्रुत्केव कूजति ॥४.५१ मत्त होकर कूकते कोकिल की ध्वनि सुनिये; दूसरा कोकिल पीछे की ओर प्रतिध्वनि के समान कूब रहा है ॥51 ॥ अपि नाम विहङ्गानां वसन्तेनाहतो मदः । न तु चिन्तयतोऽचिन्त्यं जनस्य प्राज्ञमानिनः ॥४.५२ क्या वसन्त पक्षियों को मद ला सकता है और अचिन्त्य की चिन्ता करनेवाले प्राज्ञ एवं मानी मनुष्य को नहीं?” ॥52 ॥ इत्येवं ता युवतयो मन्मथोद्दामचेतसः । कुमारं विविधैस्तैस्तैरुपचक्रमिरे नयैः ॥४.५३ इस प्रकार काम से उच्छृङ्खल चित्तवाली उन युवतियों ने उन-उन विविध नीतियों से कुमार को (आकृष्ट करने का) उपक्रम किया ॥53 ॥


22 अश्वघोष

एवमाक्षिप्यमाणोऽपि स तु धैर्यावृतेन्द्रियः । मर्तव्यमिति सोद्वेगो न जहर्ष न विव्यथे ॥४.५४ इस प्रकार आकृष्ट किया जानेपर भी, वह धीर-इन्द्रियवाला (= जितेन्द्रिय) “मरना पड़ेगा” इस (विचार) से उद्वेग-युक्त होकर न आनन्दित हुआ और न व्यथित ॥५४ ॥ तासां तत्त्वेऽनवस्थानं दृष्ट्वा स पुरुषोत्तमः । ससं विघ्नेन धीरेण चिन्तयामास चेतसा ॥४.५५ तत्त्व में उसकी स्थिरता न देखकर उस पुरुषोत्तम ने एक ही साथ संविग्न व धीर चित्त से सोचा:- ॥५५ ॥ किं विमा नावगच्छन्ति चपलं यौवनं स्त्रियः । यतो रूपेण सम्पत्तं जरा यन्नाशयिष्यति ॥४.५६ “क्या ये स्त्रियाँ यौवन का क्षणिक नही समझ रही हैं? ये उन्मत्त हैं अपने रूप से, जिसे जरा नष्ट कर देगी ॥५६ ॥ नूनमेता न पश्यन्ति कस्यचिद्रोगसम्पप्लवम् । तथा हृष्टा भयं त्यक्त्वा जगति व्याधिधर्मिणि ॥४.५७ निश्चय ही यह किसी को रोग से आक्रान्त नही देखती हैं; (इसलिए) व्याधि-धर्मा जगत् में भय छोड़कर ये इस प्रकार आनन्दित हैं ॥५७ ॥^२९ अनभिज्ञाश्च सुव्यक्तं मृत्योः सर्वापहारिणः । ततः स्वस्था निरुद्विग्नाः क्रीडन्ति च हसन्ति च ॥४.५८ स्पष्ट ही सबको दूर ले जानेवाली मृत्यु से अनभिज्ञ हैं; इसीलिए स्वस्थ और और उद्वेग-रहित होकर ये खेलती व हँसती हैं ॥५८ ॥ जरां व्याधिं च मृत्युं च को हि जानन्सचेतनः । स्वस्थस्तिष्ठेन्निषीदेद्वा शयेद्वा किं पुनर्हसेत् ॥४.५९ जरा, व्याधि व मृत्यु को जानता हुआ कौन बुद्धिमान् स्वस्थ होकर खड़ा हो या बैठे या सोये, फिर हँसे ही क्यों? ॥५९ ॥ यस्तु दृष्ट्वा परं जीर्णं व्याधितं मृतमेव च । स्वस्थो भवति नोद्विग्नो यथाचेतास्तथैव सः ॥४.६० जो दूसरे को वृद्ध, रोगी या मृत देखकर स्वस्थ रहता है, उद्विग्न नही होता, वह वैसा ही है जैसा कि अचेतन ॥६० ॥ वियुज्यमाने हि तरौ पुष्पैर्अपि फलैरपि । पतति च्छिद्यमाने वा तरुरन्यो न शोचते ॥४.६१ क्योंकि फूलों और फलों से अलग होकर अब (एक) वृक्ष गिरता है या काटा जाता है, तब दूसरा वृक्ष शोक नही करता है” ॥६१ ॥ इति ध्यानपरं दृष्ट्वा विषयेभ्यो गतस्पृहम् । उदायी नीतिशास्त्रज्ञस्तमुवाच सुहृत्तया ॥४.६२ इस प्रकार उसे ध्यानमग्न और निरभिलाप देखकर नीति-शास्त्रज्ञ उदायी ने मित्रता से कहा:- ॥६२ ॥ अहं नृपतिना दत्तः सखा तुभ्यं क्षमः किल । यस्मात्त्वयि विवक्षा मे तया प्रणयवत्तया ॥४.६३ “मैं राजा के द्वारा नियुक्त किया गया तुम्हारा योग्य मित्र हूँ, इसलिए प्रेमपूर्वक मैं तुम्हें (कुछ) कहना चाहता हूँ ॥६३ ॥ अहितात्प्रतिषेधश्च हिते चानुप्रवर्तनम् । व्यसने चापरित्यागस्त्रिविधं मित्रलक्षणम् ॥४.६४ अहित से रोकना, हित में लगाना और विपत्ति में नही छोड़ना—मित्र के (ये) तीन लक्षण हैं ॥६४ ॥ सोऽहं मैत्रीं प्रतिज्ञाय पुरुषार्थात्पराङ्मुखम् । यदि त्वां समुपेक्षेय न भवेन्मित्रता मयि ॥४.६५ मैत्री की प्रतिज्ञाकर, पुरुषार्थ (=पुरुष के काम) से विमुख हो, यदि मैं तुम्हारी उपेक्षा करूँ, तो मुझमें मित्रता नही होगी ॥६५ ॥ तद्ब्रवीमि सुहृद्भूत्वा तरुणस्य वपुष्मतः । इदं न प्रतिरूपं ते स्त्रीष्वदाक्षिण्यमीदृशम् ॥४.६६ इसलिए मित्र होकर मैं कहता हूँ कि स्त्रियों के प्रति उदारता का यह ऐसा अभाव तुझ सुन्दर तरुण के अनुरूप नही है ॥६६ ॥ अनृतेनापि नारीणां युक्तं समनुवर्तनम् । तद्व्रीडापरिहारार्थमात्मरत्यर्थमेव च ॥४.६७ स्त्रियों के लज्जा-परित्याग तथा अपने आनन्द के लिए असत्यता से भी उनके अनुकूल आचरण करना उचित है ॥६७ ॥ सन्नतिश्चानुवृत्तिश्च स्त्रीणां हृदयबन्धनम् । स्नेहस्य हि गुणा योनिर्मानकामाश्च योषितः ॥४.६८ नम्रता व अनुकूल आचरण स्त्रियों के हृदय के लिए बन्धन हैं; क्योंकि सद्गुण ही स्नेह का उत्पत्ति-स्थान है और स्त्रियाँ सम्मान चाहती हैं ॥६८ ॥ तदर्हसि विशालाक्ष हृदयेऽपि पराङ्मुखे । रूपस्यानुरूपेण दाक्षिण्येनानुवर्तितुम् ॥४.६९


^२९- व्याधिधर्मा = व्याधि जिसका धर्म अर्थात् स्वभाव है ।

बुद्धचरित 23

इसलिए, हे विशालाक्ष, हृदय विमुख होनेपर भी अपने रूप के अनुरूप उदारता से तुम्हें उनके अनुकूल आचरण करना चाहिए ॥69 ॥ दाक्षिण्यमौषधं स्त्रीणां दाक्षिण्यं भूषणं परम् । दाक्षिण्यरहितं रूपं निष्पुष्पमिव कानम् ॥४.७० उदारता स्त्रियों के लिए औषध है, उदारता श्रेष्ठ भूषण है; उदारता-रहित रूप पुण्य-विहीन उद्यान के समान है ॥70 ॥ किं वा दाक्षिण्यमात्रेण भावेनास्तु परिग्रहः । विषयान्दुर्लभाँल्लब्ध्वा न ह्यवज्ञातुमर्हसि ॥४.७१ केवल उदारता से क्या? (भीतरी) भाव से ग्रहण करो। दुर्लभ विषयों को पाकर तुम्हें तिरस्कृत नही करना चाहिए ॥71 ॥ कामं परमिति ज्ञात्वा देवोऽपि हि पुरन्दरः । गौतमस्य मुनेः पत्नीमहल्यां चकमे पुरा ॥४.७२ प्राचीन काल में काम (प्रेम) को श्रेष्ठ जानकर, इन्द्रदेव ने गौतम मुनि की पत्नी अहल्या को चाहा ॥72 ॥ अगस्त्यः प्रार्थयामास सोमभार्यां च रोहिणीम् । तस्मात्तत्सदृशीं लेभे लोपामुद्रामिति श्रुतिः ॥४.७३ और, अगस्त्य ने सोम की भार्या रोहिणी के लिए प्रार्थना की। इस कारण उसने उसी (रोहिणी) के सदृश लोपामुद्रा पाई, ऐसी अनुश्रुति है ॥73 ॥ उतथ्यस्य च भार्यायां ममतायां महातपः । मारुत्यां जनयामास भरद्वाजं बृहस्पतिः ॥४.७४ और, उतथ्य की भार्या, मरुत की पुत्री ममता में, महातपस्वी बृहस्पति ने भरद्वाज को उत्पन्न किया ॥74 ॥ बृहस्पतेर्महिष्यां च जुहुत्यां जुह्वतां वरः । बुधं विबुधर्माणं जनयामास चन्द्रमाः ॥४.७५ और हवन करनेवाली बृहस्पति की पत्नी में हवन करनेवालों में श्रेष्ठ चन्द्रमा ने बुध को उत्पन्न किया, जिसके कर्म देवता के-से थे ॥75 ॥ कालीं चैव पुरा कन्यां जलप्रभवसम्भवाम् । जगाम यमुनातीरे जातरागः पराशरः ॥४.७६ और पूर्वकाल में काम (-वासना) उत्पन्न होनेपर, पराशर यमुना-तटपर मछली से उत्पन्न हुई कन्या काली के पास गया ॥76 ॥ मातङ्ग्यामक्षमालायां गर्हितायां रिरंसया । कपिञ्जलादं तनयं वसिष्ठोऽजनयन्मुनिः ॥४.७७ रमण करने की इच्छा से वशिष्ठ मुनि ने निन्दित चाण्डाल जाति की (कन्या) अक्षमाला में कपिञ्जलाद नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥77 ॥ ययातिश्चैव राजर्षिर्वयस्यपि विनिर्गते । विश्वाच्याप्सरसा सार्धं रेमे चैत्ररथे वने ॥४.७८ और, उम्र ढलने पर भी राजर्षि ययाति ने विश्वाची अप्सरा के साथ चैत्ररथ वन में रमण किया ॥78 ॥ स्त्रीसंसर्गं विनाशान्तं पाण्डुर्ज्ञात्वापि कौरवः । माद्रीरूपगुणाक्षिप्तः सिषेवे कामजं सुखम् ॥४.७९ स्त्री-संसर्ग को विनाशकारी जानकर भी कुरुवंश पाण्डु ने माद्री के रूप-गुण से आकृष्ट होकर काम-ज सुख का सेवन किया ॥79 ॥ करालजनकश्चैव हृत्वा ब्राह्मणकन्यकाम् । अवाप भ्रंशमप्येवं न तु सेजे न मन्मथम् ॥४.८० और करालजनक ने ब्राह्मण-कन्या का हरण किया और इस प्रकार भ्रष्ट होकर भी वह काम में आसक्त ही रहा ॥80 ॥ एवमाद्या महात्मानो विषयान् गर्हितानपि । रतिहेतोर्भुभुजिरे प्रागेव गुणसंहितान् ॥४.८१ इस प्रकार आद्य महात्माओं ने रति (सम्भोग, आनन्द) हेतु निन्दित विषयों का भी उपभोग किया, निर्दोष विषयों का तो पहले ही ॥81 ॥ त्वं पुनर्न्यायतः प्राप्तान् बलवान्रूपवान्युवा । विषयानवजानासि यत्र सक्तमिदं जगत् ॥४.८२ तुम बलवान् रूपवान् युवा फिर न्याय से प्राप्त विषयों की अवहेलना करते हो, जिनमें कि यह जगत् आसक्त है ॥82 ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य श्लक्ष्णमागमसंहितम् । मेघस्तनितनिर्घोषः कुमारः प्रत्यभाषत ॥४.८३ शास्त्रों से एकत्र किये गए उसके मनोहर वचन सुनकर, मेघ-गर्जन की-सी वाणी में कुमार ने उत्तर दियाः- ॥83 ॥ उपपन्नमिदं वाक्यं सौहार्दव्यञ्जकं त्वयि । अत्र च त्वानुनेष्यामि यत्र मा दुष्ठु मन्यसे ॥४.८४ “यह सौहार्द-सूचक बात तुम्हारे ही योग्य है। मैं तुमसे कुछ अनुनय करूँगा, जिन बातों में कि तुम मुझे बुरा मानते हो ॥84 ॥ नावजानामि विषयान् जाने लोकं तदात्मकम् । अनित्यं तु जगन्मत्वा नात्र मे रमते मनः ॥४.८५ 24 अश्वघोष

मैं विषयों की अवज्ञा नही करता हूँ, संसार को उनमें रत जानता हूँ। जगत् को अनित्य मानकर मेरा मन इसमें नही रम रहा है ॥85॥ जरा व्याधिश्च मृत्युश्च यदि न स्यादिदं त्रयम् । ममापि हि मनोज्ञेषु विषयेषु रतिर्भवेत् ॥४.८६ यदि जरा, व्याधि व मृत्यु, ये तीनों नही रहते, तो मनोज्ञ विषयों में मुझे भी आनन्द होता ॥86॥ नित्यं यद्यपि हि स्त्रीणामेतदेव वपुर्भवेत् । दोषवत्स्वपि कामेषु कामं रज्यते मे मनः ॥४.८७ यदि स्त्रियों का यही रूप नित्य (चिरस्थायी) होता, तो इन दोषयुक्त विषयों में भी मेरा मन अवश्य लगता ॥87॥ यदा तु जरयापीतं रूपमासां भविष्यति । आत्मनोऽप्यनभिप्रेतं मोहात्तत्र रतिर्भवेत् ॥४.८८ जब इनका रूप जरा के द्वारा पिया (नष्ट किया) जायगा तब (वह रूप) अपने लिए भी घृणाजनक ही होगा, मोह से ही उसमें आनन्द हो ॥88॥ मृत्युव्याधिजराधर्मो मृत्युव्याधिजरात्मभिः । रममाणो ह्यसंविग्नः समानो मृगपक्षिभिः ॥४.८९ मृत्यु, व्याधि व जरा के अधीन रहनेवाला मनुष्य यदि मृत्यु-व्याधि-जरा के अधीन रहनेवालों के साथ रमण करता हुआ संविग्न (= विरक्त, भयभीत) न हो तो वह पशु-पक्षियों के समान है ॥89॥ यदप्यात्थ महात्मानस्तेऽपि कामात्मका इति । संवेगोऽत्रैव कर्तव्यो यदा तेषामपि क्षयः ॥४.९० यह जो कहा है कि महात्मा भी कामी थे, इसमे तो संवेग ही करना चाहिए कि उनका भी विनाश हुआ ॥90॥ माहात्म्यं न च तन्मन्ये यत्र सामान्यतः क्षयः । विषयेषु प्रसक्तिर्वा युक्तिर्वा नात्मवत्तया ॥४.९१ मैं उसे माहात्म्य नही मानता हूँ जिसमें समान रूप से क्षय होता है। आत्मवान् (संयतात्मा) पुरुषों को विषयों में आसक्ति नहीं होती है और न वे विषयों के लिए युक्ति (तर्क या उपाय) ही करते हैं ॥91॥ यदप्यात्थानृतेनापि स्त्रीजने वर्त्यतामिति । अनृतं नावगच्छामि दाक्षिण्येनापि किञ्चन ॥४.९२ यह जो कहा है कि असत्यता से भी स्त्रियों से बरतना चाहिए, मैं असत्यता नही समझता हूँ (और) न उदारता से भी कुछ ॥92॥ न चानुवर्तनं तन्मे रुचितं यत्र नार्जवम् । सर्वभावेन सम्पर्कौ यदि नास्ति धिगस्तु तत् ॥४.९३ वह अनुकूल आचरण मुझे नही रुचता है जिसमें सरलता (निष्कपटता) नही। यदि सर्वभाव (हृदय) से सम्पर्क नही है, तो उसे धिक्कार है ॥93॥ अनृते श्रद्दधानस्य सक्तस्यादोषदर्शिनः । किं हि वञ्चयितव्यं स्याज्जातरागस्य चेतसः ॥४.९४ अधीर, विश्वास करनेवाले, आसक्त, दोषों को नहीं देख सकनेवाले तथा अनुरक्त चित्त को क्या वञ्चित करना (= ठगना) चाहिए? ॥94॥ वञ्चयन्ति च यद्येव जातरागाः परस्परम् । ननु नैव क्षमं द्रष्टुं नराः स्त्रीणां नृणां स्त्रियः ॥४.९५ यदि कामासक्त (लोग) एक दूसरे को इसी तरह वञ्चित करते हैं, तो पुरुष स्त्रियों के देखने योग्य नही और न स्त्रियाँ पुरुषों के ॥95॥ तदेवं सति दुःखार्त्तं जरामरणभागिनम् । न मां कामेष्वनार्येषु प्रतारयितुमर्हसि ॥४.९६ ऐसा होनेपर मुझे, जो दुःख से आर्त हैं और जिनके भाग्य में जरा और मरण हैं, अनार्य विषयों में लगाकर तुम्हें नही ठगना चाहिए ॥96॥ अहोऽतिधीरं बलवच्च ते मनश्श्लेषु कामेषु च सारदर्शिनः । भयेऽतितीव्रे विषयेषु सज्जसे निरीक्षमाणो मरणाध्वनि प्रजाः ॥४.९७ अहो! तुम्हारा मन अति धीर व बलवान् है जो चञ्चल कामोपभोगों में सार देखते हो। अति तीव्र भय के रहते हुए, मृत्यु-मार्ग पर प्रजाओं को देखते हुए तुम विषयों में आसक्त होते हो ॥97॥ अहं पुनर्भौरुरतीवविक्कवो जराविपद्व्याधिभयं विचिन्तयन् । लभे न शान्तिं न धृतिं कुतो रतिं निशामयन्दीप्तमिवाग्निना जगत् ॥४.९८ और, मैं जरा, मृत्यु व व्याधि की चिन्ता करता हुआ भयभीत और अति विकल हूँ। आग से मानो जलते जगत् को देखकर, न शान्ति पाता हूँ न धैर्य, आनन्द कहाँ से (पाऊँगा)? ॥98॥ असंशयं मृत्युरिति प्रजानतो नरस्य रागो हृदि यस्य जायते । अयोमयीं तस्य परैमि चेतनां महाभये रज्यति यो न रोदिति ॥४.९९ मृत्यु अवश्यंभावी है यह जानते हुए जिस मनुष्य के हृदय में काम पैदा होता है उसकी बुद्धि को लोहे की बनी समझता हूँ, क्योंकि (मृत्युरूपी) महाभय के रहते हुए, वह आनन्दित होता है, रोता नहीं" ॥99॥ अथौ कुमारश्च विनिश्चयात्मिकां चकार कामाश्रयघातिनीं कथाम् । जनस्य चक्षुर्गमनीयमण्डलो महीधरं चास्तमियाय भास्करः ॥४.१००


बुद्धचरित 25

कुमार ने वैराग्य पैदा करनेवाली (= काम-आश्रय-विनाशिनी) ये निश्चयात्मक बातें कहीं और तब संसार का नेत्रस्वरूप सूर्य, जो कि दर्शनीय हो रहा था, अस्ताचल पर गया ॥100 ॥³⁰ ततो वृथाधारितभूषणस्रजः कलागुणैश्च प्रणयैश्च निष्फलैः। स्व एव भावे विनिगृह्य मन्मथं पुरं ययुर्भग्नमनोरथाः स्त्रियः ॥४.१०१ तब वे स्त्रियाँ, जिन्होंने व्यर्थ ही आभूषण और मालाएँ पहनी थीं, उत्कृष्ट कलाओं और प्रणय-चेष्टाओं के निष्फल होनेपर अपने ही मन में कामदेव का निग्रह कर, भग्नमनोरथ हो, नगर को लौट गईं ॥101 ॥³¹ ततः पुरोद्यानगतां जनश्रियं निरीक्ष्य सायं प्रतिसंहृतां पुनः। अनित्यतां सर्वगतां विचिन्तयन्निवेश धिष्ण्यं क्षितिपालकात्मजः ॥४.१०२ तब नगर-उद्यान की जन-शोभा को फिर संध्या समय समेटी गई देखकर, सर्वव्यापिनी अनित्यता की चिन्ता करते हुए राज-कुमार ने महल में प्रवेश किया ॥102 ॥ ततः श्रुत्वा राजा विषयविमुखं तस्य तु मनो न शिश्ये तां रात्रिं हृदयगतशल्यो गज इव। अथ श्रान्तो मन्त्रे बहुविविधमार्गे ससचिवो न सोऽन्यत्कामेभ्यो नियमनमपश्यत्सुतमतेः ॥४.१०३ तब उसका मन विषयों से विमुख हुआ सुनकर राजा (उस) हाथी के समान जिसकी छाती में बर्छी गड़ी हुई हो, उस रात को न सोया। तब सचिवों के साथ विविध उपायों की मन्त्रणा करने में थककर उसने पुत्र-बुद्धि के नियन्त्रण के लिए काम के अतिरिक्त दूसरा उपाय न देखा ॥103 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये स्त्रीविघातातो नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥ पञ्चम सर्ग अभिनिष्क्रमण स तथा विषयैर्विलोभ्यमानः परमार्हैरपि शाक्यराजसूनूः। न जगाम धृतिं न शर्म लेभे हृदये सिंह इवातिदिग्धविद्धः ॥५.१ बहुमूल्य विषयों से उस प्रकार लुभाये जानेपर भी उस शाक्य-राज-पुत्र को (उस) सिंह के समान, जिनका हृदय विष-लिप्त तीर से अत्यन्त विद्ध हो, न धैर्य हुआ न चैन ॥1 ॥ अथ मन्त्रिसुतैः क्षमैः कदाचित्सखिभिश्चित्रकथैः कृतानुयात्रः। वनभूमिदिदृक्षया शमेप्सुर्नरदेवानुमतो बहिः प्रतस्थे ॥५.२ तब एक बार शान्ति-प्राप्ति के उस इच्छुक ने, राजा से अनुमति पाकर, वन-भूमि देखने के लिए बाहर प्रस्थान किया; मन्त्रियों के पुत्र, जो उसके योग्य मित्र थे और जो चित्र-विचित्र कथाएँ जानते थे, उसके साथ गये ॥2 ॥ नवरुक्मखलीनकिङ्किणीकं प्रचलच्चामरचारुहेमभाण्डम्। अभिरुह्य स कन्थकं सदश्वं प्रययौ केतुमिव द्रुमाब्जकेतुः ॥५.३ नये सोने की लगाम व घुँघुरूवाले तथा हिलते हुए चामरों से शोभित सुवर्ण अलङ्कारोंवाले अच्छे घोड़े कन्थक पर चढ़कर, वह बाहर गया, जैसे पताका दण्ड पर कनेल फूल का चिह्न विराजमान हो ॥3 ॥³² स विकृष्टतरां वनान्तभूमिं वनलोभाच्च ययौ महीगुणेच्च। सलिलोर्मिविकारसीरमार्गां वसुधां चैव ददर्श कृष्यमाणाम् ॥५.४ जङ्गल की लालच व पृथ्वी की उत्कृष्टता से आकृष्ट होकर वह अत्यन्त दूर की जङ्गल भूमि की ओर गया और जोती जा रही धरती को देखा, जिसपर हलों (की जुताई) के मार्ग जलतरङ्गों के समान देख पड़ते थे ॥4 ॥ हलभिन्नविकीर्णशष्पदभ्भां हतसूक्ष्मकृमिकीटजन्तुकीर्णाम्। समवेक्ष्य रसां तथाविधां तां स्वजनस्येव वधे भृशं शुशोच ॥५.५ जिसपर हलों से कटे बाल-तृण व कुश तथा मरे हुए छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े बिखरे हुए थे वैसी उस धरती को देखकर उसने वैसे ही शोक किया, जैसे कि स्वजन की हत्या होनेपर ॥5 ॥ कृषतः पुरुषांश्च वीक्षमाणः पवनांशुंरजसाविभिन्नवर्णान्। वहनक्रमविक्लवांश्च धुर्यान् परमार्यः परमां कृपां चकार ॥५.६ हवा, सूर्यकिरण व धूल से विवर्ण हुए कृषक पुरुषों तथा हल में बहने के श्रम से विकल हुए बैलों को देखकर उस परम आर्य (कुमार) को बड़ी करुणा हुई ॥6 ॥ अवतीर्य ततस्तुरङ्गपृष्ठाच्छनकैर्गां व्यचरच्छुचा परीतः। जगतो जननव्ययं विचिन्वन् कृपणं खल्विदमित्युवाच चार्तः ॥५.७ तब घोड़े की पीठ से उतरकर उसने पृथ्वी पर शोकित हो धीरे-धीरे विचरण किया और जगत् के जन्म और विनाश की छानबीन करते हुए आर्त्त होकर कहा— "यह जगत् निश्चय ही दीन है।" ॥7 ॥ मनसा च विविक्ततामभीप्सुः सुहृदस्ताननुयायिनो निवार्य। अभितश्चलचारुपर्णवत्या विजने मूलमुपेयिवान् स जम्ब्वाः ॥५.८ मानसिक पवित्रता (या एकान्त) पाने की इच्छा से उन अनुयायी मित्रों को रोककर, वह विजन भूमि में जम्बू-वृक्ष के मूल के समीप गया, जिसके सुन्दर पत्ते चारों ओर हिल रहे थे ॥8 ॥ ³⁰- गमनीयमण्डल = दर्शनीय मण्डल्य दर्शनीय = सुन्दर होने के कारण देखने योग्य या तेज क्षीण होने के कारण आसानी से देखा जाने योग्य। ³¹- भाव = उत्पत्ति-स्थान; काम का उत्पत्ति-स्थान है मन। ³²- केतुपर द्रुमाब्ज-केतु = पताका-दण्ड (या स्तम्भ) पर (द्रुमाब्ज= द्रुमोत्पल) कनेल फूल का चिह्न; वास्तव में इस वाक्यांश का अर्थ स्पष्ट नहीं है। 26 अश्वघोष

निषसाद स यत्र शौचवत्यां भुवि वैडूर्यविकाशशाद्वलायाम् । जगतः प्रभवव्ययौ विचिन्वन्मनसश्च स्थितिमार्गमाललम्बे ॥५.९ वह वहा स्वच्छ भूमि पर बैठा गया, जिसके हरे तृण वैडूर्य-मणि के समान देख पड़ते थे। और, जगत् के जन्म और विनाश की खोज करते हुए उसने मानसिक स्थिरता के उपाय का अवलम्बन किया ॥९॥ समवाप्तमनः स्थितिश्च सद्यो विषयेच्छादिभिराधिभिश्च मुक्तः । सवितर्कविचारमाप शान्तं प्रथमं ध्यानमनास्रवप्रकारम् ॥५.१० तुरन्त मानसिक स्थिरता प्राप्त कर वह विषयों की इच्छा आदि (मानसिक) आधियों से मुक्त हो गया। और, प्रथम शान्त ध्यान प्राप्त किया, जो वितर्क विचारों से युक्त और आस्रवों (राग, द्वेष आदि चित्त-मलों से) मुक्त था ॥१०॥ अधिगम्य ततो विवेकजं तु परमप्रीतिसुखं मनःसमाधिम् । इदमेव ततः परं प्रदध्यौ मनसा लोकगतिं निशम्य सम्यक् ॥५.११ तब उसने विवेक से पैदा होनेवाली तथा परम प्रसन्नता व सुख से समन्वित मानसिक समाधि पाई। और, तब से मन द्वारा जगत् की गति को अच्छी तरह से देखते हुए इसी बात का ध्यान कियाः- ॥११॥ कृपणं बत यज्जनः स्वयं सन्नवशो व्याधिजराविनाशधर्मा । जरयार्दितमातुरं मृतं वा परमन्यो विजुगुप्सते मदान्धः ॥५.१२ “यह दुःख की बात है कि व्याधि-जरा-मरणशील मनुष्य, स्वयं पराधीन होता हुआ, अज्ञानी व मदान्ध होकर, जरा से पीड़ित, व्याधि से ग्रस्त तथा मरे हुए व्यक्ति की अवहेलना करता है ॥१२॥ इह चेदहमीदृशः स्वयं सन्व्रिजुगुप्सेय परं तथास्वभावम् । न भवेत्सदृशं हि तत्क्षमं वा परमं धर्ममिमं विजानतो मे ॥५.१३ इस संसार में स्वयं ऐसा होता हुआ यदि वैसे (=व्याधि आदि) स्वभाववाले दूसरे की अवहेलना करूँ तो इस परम धर्म को जाननेवाले इस व्यक्ति के सदृश या योग्य यह नही होगा।” ॥१३॥ इति तस्य विपश्यतो यथावज्जगतो व्याधिजराविपत्तिदोषान् । बल्यौवनजीवितप्रवृत्तो विजगामात्मगतो मदः क्षणेन ॥५.१४ जगत् के व्याधि जरा-मरणरूप दोषों को वह ठीक-ठीक देख ही रहा था कि बल, यौवन व जीवन से होनेवाला उसका आत्मगत मद (अहङ्कार) एक ही क्षण में विलीन हो गया ॥१४॥ न जहर्ष न चापि चानुतेपे विचिकित्सां न ययौ न तन्द्रिनिद्रे । न च कामगुणेषु संररञ्जे न विदिद्वेष परं न चावमेने ॥५.१५ उसे न हर्ष हुआ न विषाद, न संशय, न आलस्य, न नींद। और, काम के आकर्षणों (= कामोपभोगों से) अनुराग नहीं हुआ, (मन में) दूसरे से न द्वेष किया और न दूसरे की अवज्ञा ॥१५॥ इति बुद्धिरियं च नीरजस्का ववृधे तस्य महात्मनो विशुद्धा । पुरुषैरपरैरदृश्यमानः पुरुषश्चोपससर्प भिक्षुवेषः ॥५.१६ उस महात्मा की यह निर्मल विशुद्ध बुद्धि बढ़ने लगी और दूसरे लोगों से नहीं देखा जाता हुआ एक मनुष्य सन्यासी के वेष में उसके समीप आ गया ॥१६॥ नरदेवसुतस्तमभ्यपृच्छद्वद कोऽसीति शशंस सोऽथ तस्मै । नरपुङ्गव जन्ममृत्युभीतः श्रमणः प्रव्रजितोऽस्मि मोक्षहेतोः ॥५.१७ राजा के पुत्र ने उसे पूछा- "कहो कौन हो?" तब उसने उसे कहा- "हे नर-श्रेष्ठ, श्रमण (= सन्यासी) हूँ, जन्म व मरण से डरकर मोक्ष हेतु सन्यासी हुआ हूँ ॥१७॥ जगति क्षयधर्मके मुमुक्षुर्मृगयेऽहं शिवमक्षयं पदं तत् । स्वजनेऽन्यजने च तुल्यबुद्धिर्विषयेभ्यो विनिवृत्तरागदोषः ॥५.१८ क्षयशील जगत् में मैं मोक्ष चाहनेवाला अक्षय एवं कल्याणकारी पद की खोज करता हूँ। स्वजन और पराये में मेरी बुद्धि तुल्य है, विषयों से अनुराग और द्वेष, दोनों ही मुझसे चले गये हैं ॥१८॥ निवसन् क्वचिदेव वृक्षमूले विजने वायतने गिरौ वने वा । विचराम्यपरिग्रहो निराशः परमार्थाय यथोपपन्नभैक्षुः ॥५.१९ जहाँ कहीं-वृक्ष के मूल में या विजन मन्दिर में, पर्वत पर या वन में-रहता हूँ। परिवार-हीन और तृष्णा- रहित होकर, परमार्थ (=मोक्ष) के लिए विचरण करता हूँ; जो कुछ भी भिक्षा मिलती है उसे ही ग्रहण करता हूँ” ॥१९॥ इति पश्यत एव राजसूनोरिदमुक्त्वा स नभः समुत्पपात । स हि तद्वपुरन्यबुद्धदर्शी स्मृतये तस्य समेयिवान्दिवौकाः ॥५.२० राजकुमार के समक्ष ही इतना कह वह आकाश में उड़ गया। वह देवता, जिसने उस शरीर से अन्य बुद्धों को देखा था, उसकी स्मृति (जगाने) के लिए आया था ॥२०॥ गगनं खगवद्गते च तस्मिन्नृवरः सञ्जहृषे विसिस्मिये च । उपलभ्य ततश्च धर्मसञ्ज्ञामभिनिर्याणविधौ मतिं चकार ॥५.२१ पक्षी के समान उसके आसमान में उड़ जानेपर, उस नरश्रेष्ठ को हर्ष और विस्मय हुआ। और, उसके धर्म का ज्ञान पाकर उसने “(घर से) कैसे निकलूँ” इसपर विचार किया ॥२१॥ तत इन्द्रसमो जितेन्द्रियाश्व प्रविविक्षुः परमाश्वमारुरोह । परिवारजनं त्ववेक्षमाणस्तत एवाभिमतं वनं न भेजे ॥५.२२ तब वह इन्द्र-तुल्य, जिसने इन्द्रिय-रूप अश्वों को जीत लिया था, नगर में प्रवेश करने की इच्छा से घोड़े पर चढ़ा। साथियों का ख्याल करता हुआ वह वहीं से इच्छित वन को नही चला गया ॥२२॥ स जरामरणक्षयं चिकीर्षुर्वनवासाय मतिं स्मृतौ निधाय । प्रविवेश पुनः पुरं न कामाद्वनभूमेरिव मण्डलं द्विपेन्द्रः ॥५.२३ जरा मरण का विनाश करने की इच्छा से वन में रहने का अपना निश्चय याद रखते हुए उसने उसी प्रकार अनिच्छा से नगर मे प्रवेश किया, जिस प्रकार जङ्गल से हाथी (घरेलू हाथियों के) घेर में ॥२३॥ बुद्धचरित 27

सुखिता बत निर्वृता च सा स्त्री पतिरीदृक्ष इहायताक्ष यस्याः । इति तं समुदीक्ष्य राजकन्या प्रविशन्तं पथि साञ्जलिर्जगाद ॥५.२४ उसे मार्ग में प्रवेश करते देखकर (किसी) राज-कन्या ने हाथ जोड़कर कहा—“सुखी और धन्य (निर्वृत) है वह स्त्री, जिसका पति इस संसार में, हे विशालाक्ष, ऐसा है” ॥२४॥ अथ घोषमिमं महाभ्रघोषः परिशुश्राव शमं परं च लेभे । श्रुतवान्स हि निर्वृतेति शब्दं परिनिर्वाणविधौ मतिं चकार ॥५.२५ तब महामेघ की-सी ध्वनिवाले ने यह शब्द सुना और परम शान्ति पाई। “धन्य (निर्वृत)” यह शब्द सुनकर, उसने “परिनिर्वाण कैसे प्राप्त करूँ” इसपर विचार किया ॥२५॥ अथ काञ्चनशैलशृङ्गधर्मा गजमेघर्षभबाहुनिस्वनाक्षः । क्षयमक्षयधर्मजातरागः शशिसिंहाननविक्रमः प्रपेदे ॥५.२६ तब सुवर्ण-गिरि-शिखर के समान (कान्तिमान्) शरीरवाला, हाथी की-सी बाहुवाला, मेघ की-सी ध्वनिवाला वृषभ की-सी आँखोंवाला, चन्द्रमा का-सा मुखवाला तथा सिंह के समान पराक्रमी कुमार, जिसे अक्षय धर्म से अनुराग हो गया था, महल में गया ॥२६॥ मृगराजगतिस्ततोऽभ्यगच्छन्नृपतिं मन्त्रिगणैरुपास्यमानम् । समितौ मरुतामिव ज्वलन्तं मघवन्तं त्रिदिवे सनत्कुमारः ॥५.२७ तब सिंह-गति (कुमार) मन्त्रियों से सेवित होते नृपति के समीप गया, जैसे स्वर्ग में मरुतों की सभा में प्रज्वलित होते इन्द्र के समीप सनत्कुमार (जा रहा हो) ॥२७॥ प्रणिपत्य च साञ्जलिर्बभाषे दिश मह्यं नरदेव साध्वनुज्ञाम् । परिविव्रजिषामि मोक्षहेतोर्नियतो ह्यस्य जनस्य विप्रयोगः ॥५.२८ और, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए उसने कहा—“हे राजन्! कृपाकर मुझे आज्ञा दीजिए। मोक्ष के हेतु मैं परिव्राजक होना चाहता हूँ; क्योंकि इस व्यक्ति का वियोग नियत है” ॥२८॥ इति तस्य वचो निशम्य राजा करिणेवाभिहतो द्रुमश्चचाल । कमलप्रतिमेऽञ्जलौ गृहीत्वा वचनं चेदमुवाच बाष्पकण्ठः ॥५.२९ उसका वचन सुनकर राजा वैसे ही काँपा, जैसे हाथी से आहत वृक्ष। और कमल-सदृश हाथों से उसे पकड़कर बाष्प से रुकती वाणी में यह वचन कहा:– ॥२९॥ प्रतिसंहर तात बुद्धिमैतां न हि कालस्तव धर्मसंश्रयस्य । वयसि प्रथमे मतौ चलायां बहुदोषां हि वदन्ति धर्मचर्याम् ॥५.३० “हे तात, इस बुद्धि का रोको, धर्म की शरण (में जाने) का समय तुम्हारा नहीं है; क्योंकि प्रथम वयस में बुद्धि चञ्चल होने के कारण धर्माचरण में बहुत दोष बताये हैं ॥३०॥ विषयेषु कुतूहलेन्द्रियस्य व्रतखेदेष्वसमर्थनिश्चयस्य । तरुणस्य मनश्चलत्यरण्यादनभिज्ञस्य विशेषतो विवेके ॥५.३१ विषयों के प्रति उत्सुक इन्द्रियवाले, व्रत के श्रम सहने में असमर्थ निश्चयवाले तरुण का मन वन से चलायमान होता है, विशेषतः जब कि वह विवेक (=एकान्त) से अनभिज्ञ रहता है ॥३१॥ मम तु प्रियधर्म धर्मकालस्त्वयि लक्ष्मीमवसृज्य लक्ष्मभूते । स्थिरविक्रम विक्रमेण धर्मस्तव हित्वा तु गुरुं भवेदधर्मः ॥५.३२ हे प्रियधर्म, योग्य हुए तुझपर लक्ष्मी को छोड़कर मेरा धर्म (करने) का समय (आ गया) है। हे स्थिरपराक्रम पराक्रम (के कार्य) से तुम्हें धर्म होगा, पिता को छोड़ने से तो अधर्म ही होगा ॥३२॥ तदिमं व्यवसायमुत्सृज त्वं भव तावन्निरतो गृहस्थधर्मे । पुरुषस्य वयःसुखानि भुक्त्वा रमणीयो हि तपोवनप्रवेशः ॥५.३३ इसलिए इस निश्चय को तुम छोड़ो। तबतक के लिए गृहस्थ-धर्म में लगो। जवानी के सुख भोगने के बाद मनुष्य का तपोवन-प्रवेश रमणीय होता है।” ॥३३॥ इति वाक्यमिदं निशम्य राज्ञः कलविङ्कस्वर उत्तरं बभाषे । यदि मे प्रतिभूश्चतुर्षु राजन् भवसि त्वं न तपोवनं श्रयिष्ये ॥५.३४ राजा का यह वचन सुनकर, कलविङ्क-(नामक पक्षी के) कण्ठ से उसने उत्तर दिया—“हे राजन्, यदि आप चार (बातों) में मेरा प्रतिभू होइये, तो मैं तपोवन की शरण न जाऊँगा ॥३४॥ न भवेन्मरणाय जीवितं मे विहरेत्स्वास्थ्यमिदं च मे न रोगः । न च यौवनमाक्षिपेज्जरा मे न च सम्पत्तिमिमां हरेद्विपत्तिः ॥५.३५ मेरा जीवन मरण के लिए न हो, और न रोग मेरे इस स्वास्थ्य का हरण करे, और न जरा मेरे यौवन को नष्ट करे, और न विपत्ति मेरी इस सम्पत्ति को हरे” ॥३५॥ इति दुर्लभमर्थमूचिवांसं तनयं वाक्यमुवाच शाक्यराजः । त्यज बुद्धिमिमामतिप्रवृत्तामवहास्योऽतिमनोरथोऽक्रमश्च ॥५.३६ अपने पुत्र को, जिसने ये दुर्लभ बातें कहीं, शाक्यराज ने यह वचन कहा—“इस अत्यन्त बढ़ी हुई बुद्धि को तजो, क्रम-हीन (अनुचित) मनोरथ का उपहास होता है” ॥३६॥³³ अथ मेरुरुरुर्गुरुं बभाषे यदि नास्ति क्रम एष नास्मि वार्यः । शरणाज्ज्वलनेन दह्यमानान्न हि निष्क्रमितुं क्षमं ग्रहीतुम् ॥५.३७ तब मेरु-सदृश गौरवपूर्ण कुमार ने पिता से कहा—“यदि यह क्रम नहीं है तो मुझे न रोकिये; क्योंकि आग से जलते घर से निकलने की इच्छा करनेवाले को पकड़ना उचित नहीं ॥३७॥ जगतश्च यदा ध्रुवो वियोगो ननु धर्माय वरं स्वयंवियोगः । अवशं ननु विप्रयोजयेन्मामकृतस्वार्थमतृप्तमेव मृत्युः ॥५.३८


³³ - क्रमहीनः—जवानी में अर्थ और काम का सेवन न करके धर्म-अर्जन करने का मथोरथ क्रमहीन है।


28 अश्वघोष