बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखिता बत निर्वृता च सा स्त्री पतिरीदृक्ष इहायताक्ष यस्याः । इति तं समुदीक्ष्य राजकन्या प्रविशन्तं पथि साञ्जलिर्जगाद ॥५.२४ उसे मार्ग में प्रवेश करते देखकर (किसी) राज-कन्या ने हाथ जोड़कर कहा—“सुखी और धन्य (निर्वृत) है वह स्त्री, जिसका पति इस संसार में, हे विशालाक्ष, ऐसा है” ॥२४॥ अथ घोषमिमं महाभ्रघोषः परिशुश्राव शमं परं च लेभे । श्रुतवान्स हि निर्वृतेति शब्दं परिनिर्वाणविधौ मतिं चकार ॥५.२५ तब महामेघ की-सी ध्वनिवाले ने यह शब्द सुना और परम शान्ति पाई। “धन्य (निर्वृत)” यह शब्द सुनकर, उसने “परिनिर्वाण कैसे प्राप्त करूँ” इसपर विचार किया ॥२५॥ अथ काञ्चनशैलशृङ्गधर्मा गजमेघर्षभबाहुनिस्वनाक्षः । क्षयमक्षयधर्मजातरागः शशिसिंहाननविक्रमः प्रपेदे ॥५.२६ तब सुवर्ण-गिरि-शिखर के समान (कान्तिमान्) शरीरवाला, हाथी की-सी बाहुवाला, मेघ की-सी ध्वनिवाला वृषभ की-सी आँखोंवाला, चन्द्रमा का-सा मुखवाला तथा सिंह के समान पराक्रमी कुमार, जिसे अक्षय धर्म से अनुराग हो गया था, महल में गया ॥२६॥ मृगराजगतिस्ततोऽभ्यगच्छन्नृपतिं मन्त्रिगणैरुपास्यमानम् । समितौ मरुतामिव ज्वलन्तं मघवन्तं त्रिदिवे सनत्कुमारः ॥५.२७ तब सिंह-गति (कुमार) मन्त्रियों से सेवित होते नृपति के समीप गया, जैसे स्वर्ग में मरुतों की सभा में प्रज्वलित होते इन्द्र के समीप सनत्कुमार (जा रहा हो) ॥२७॥ प्रणिपत्य च साञ्जलिर्बभाषे दिश मह्यं नरदेव साध्वनुज्ञाम् । परिविव्रजिषामि मोक्षहेतोर्नियतो ह्यस्य जनस्य विप्रयोगः ॥५.२८ और, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए उसने कहा—“हे राजन्! कृपाकर मुझे आज्ञा दीजिए। मोक्ष के हेतु मैं परिव्राजक होना चाहता हूँ; क्योंकि इस व्यक्ति का वियोग नियत है” ॥२८॥ इति तस्य वचो निशम्य राजा करिणेवाभिहतो द्रुमश्चचाल । कमलप्रतिमेऽञ्जलौ गृहीत्वा वचनं चेदमुवाच बाष्पकण्ठः ॥५.२९ उसका वचन सुनकर राजा वैसे ही काँपा, जैसे हाथी से आहत वृक्ष। और कमल-सदृश हाथों से उसे पकड़कर बाष्प से रुकती वाणी में यह वचन कहा:– ॥२९॥ प्रतिसंहर तात बुद्धिमैतां न हि कालस्तव धर्मसंश्रयस्य । वयसि प्रथमे मतौ चलायां बहुदोषां हि वदन्ति धर्मचर्याम् ॥५.३० “हे तात, इस बुद्धि का रोको, धर्म की शरण (में जाने) का समय तुम्हारा नहीं है; क्योंकि प्रथम वयस में बुद्धि चञ्चल होने के कारण धर्माचरण में बहुत दोष बताये हैं ॥३०॥ विषयेषु कुतूहलेन्द्रियस्य व्रतखेदेष्वसमर्थनिश्चयस्य । तरुणस्य मनश्चलत्यरण्यादनभिज्ञस्य विशेषतो विवेके ॥५.३१ विषयों के प्रति उत्सुक इन्द्रियवाले, व्रत के श्रम सहने में असमर्थ निश्चयवाले तरुण का मन वन से चलायमान होता है, विशेषतः जब कि वह विवेक (=एकान्त) से अनभिज्ञ रहता है ॥३१॥ मम तु प्रियधर्म धर्मकालस्त्वयि लक्ष्मीमवसृज्य लक्ष्मभूते । स्थिरविक्रम विक्रमेण धर्मस्तव हित्वा तु गुरुं भवेदधर्मः ॥५.३२ हे प्रियधर्म, योग्य हुए तुझपर लक्ष्मी को छोड़कर मेरा धर्म (करने) का समय (आ गया) है। हे स्थिरपराक्रम पराक्रम (के कार्य) से तुम्हें धर्म होगा, पिता को छोड़ने से तो अधर्म ही होगा ॥३२॥ तदिमं व्यवसायमुत्सृज त्वं भव तावन्निरतो गृहस्थधर्मे । पुरुषस्य वयःसुखानि भुक्त्वा रमणीयो हि तपोवनप्रवेशः ॥५.३३ इसलिए इस निश्चय को तुम छोड़ो। तबतक के लिए गृहस्थ-धर्म में लगो। जवानी के सुख भोगने के बाद मनुष्य का तपोवन-प्रवेश रमणीय होता है।” ॥३३॥ इति वाक्यमिदं निशम्य राज्ञः कलविङ्कस्वर उत्तरं बभाषे । यदि मे प्रतिभूश्चतुर्षु राजन् भवसि त्वं न तपोवनं श्रयिष्ये ॥५.३४ राजा का यह वचन सुनकर, कलविङ्क-(नामक पक्षी के) कण्ठ से उसने उत्तर दिया—“हे राजन्, यदि आप चार (बातों) में मेरा प्रतिभू होइये, तो मैं तपोवन की शरण न जाऊँगा ॥३४॥ न भवेन्मरणाय जीवितं मे विहरेत्स्वास्थ्यमिदं च मे न रोगः । न च यौवनमाक्षिपेज्जरा मे न च सम्पत्तिमिमां हरेद्विपत्तिः ॥५.३५ मेरा जीवन मरण के लिए न हो, और न रोग मेरे इस स्वास्थ्य का हरण करे, और न जरा मेरे यौवन को नष्ट करे, और न विपत्ति मेरी इस सम्पत्ति को हरे” ॥३५॥ इति दुर्लभमर्थमूचिवांसं तनयं वाक्यमुवाच शाक्यराजः । त्यज बुद्धिमिमामतिप्रवृत्तामवहास्योऽतिमनोरथोऽक्रमश्च ॥५.३६ अपने पुत्र को, जिसने ये दुर्लभ बातें कहीं, शाक्यराज ने यह वचन कहा—“इस अत्यन्त बढ़ी हुई बुद्धि को तजो, क्रम-हीन (अनुचित) मनोरथ का उपहास होता है” ॥३६॥³³ अथ मेरुरुरुर्गुरुं बभाषे यदि नास्ति क्रम एष नास्मि वार्यः । शरणाज्ज्वलनेन दह्यमानान्न हि निष्क्रमितुं क्षमं ग्रहीतुम् ॥५.३७ तब मेरु-सदृश गौरवपूर्ण कुमार ने पिता से कहा—“यदि यह क्रम नहीं है तो मुझे न रोकिये; क्योंकि आग से जलते घर से निकलने की इच्छा करनेवाले को पकड़ना उचित नहीं ॥३७॥ जगतश्च यदा ध्रुवो वियोगो ननु धर्माय वरं स्वयंवियोगः । अवशं ननु विप्रयोजयेन्मामकृतस्वार्थमतृप्तमेव मृत्युः ॥५.३८
³³ - क्रमहीनः—जवानी में अर्थ और काम का सेवन न करके धर्म-अर्जन करने का मथोरथ क्रमहीन है।
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