भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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निषसाद स यत्र शौचवत्यां भुवि वैडूर्यविकाशशाद्वलायाम् । जगतः प्रभवव्ययौ विचिन्वन्मनसश्च स्थितिमार्गमाललम्बे ॥५.९ वह वहा स्वच्छ भूमि पर बैठा गया, जिसके हरे तृण वैडूर्य-मणि के समान देख पड़ते थे। और, जगत् के जन्म और विनाश की खोज करते हुए उसने मानसिक स्थिरता के उपाय का अवलम्बन किया ॥९॥ समवाप्तमनः स्थितिश्च सद्यो विषयेच्छादिभिराधिभिश्च मुक्तः । सवितर्कविचारमाप शान्तं प्रथमं ध्यानमनास्रवप्रकारम् ॥५.१० तुरन्त मानसिक स्थिरता प्राप्त कर वह विषयों की इच्छा आदि (मानसिक) आधियों से मुक्त हो गया। और, प्रथम शान्त ध्यान प्राप्त किया, जो वितर्क विचारों से युक्त और आस्रवों (राग, द्वेष आदि चित्त-मलों से) मुक्त था ॥१०॥ अधिगम्य ततो विवेकजं तु परमप्रीतिसुखं मनःसमाधिम् । इदमेव ततः परं प्रदध्यौ मनसा लोकगतिं निशम्य सम्यक् ॥५.११ तब उसने विवेक से पैदा होनेवाली तथा परम प्रसन्नता व सुख से समन्वित मानसिक समाधि पाई। और, तब से मन द्वारा जगत् की गति को अच्छी तरह से देखते हुए इसी बात का ध्यान कियाः- ॥११॥ कृपणं बत यज्जनः स्वयं सन्नवशो व्याधिजराविनाशधर्मा । जरयार्दितमातुरं मृतं वा परमन्यो विजुगुप्सते मदान्धः ॥५.१२ “यह दुःख की बात है कि व्याधि-जरा-मरणशील मनुष्य, स्वयं पराधीन होता हुआ, अज्ञानी व मदान्ध होकर, जरा से पीड़ित, व्याधि से ग्रस्त तथा मरे हुए व्यक्ति की अवहेलना करता है ॥१२॥ इह चेदहमीदृशः स्वयं सन्व्रिजुगुप्सेय परं तथास्वभावम् । न भवेत्सदृशं हि तत्क्षमं वा परमं धर्ममिमं विजानतो मे ॥५.१३ इस संसार में स्वयं ऐसा होता हुआ यदि वैसे (=व्याधि आदि) स्वभाववाले दूसरे की अवहेलना करूँ तो इस परम धर्म को जाननेवाले इस व्यक्ति के सदृश या योग्य यह नही होगा।” ॥१३॥ इति तस्य विपश्यतो यथावज्जगतो व्याधिजराविपत्तिदोषान् । बल्यौवनजीवितप्रवृत्तो विजगामात्मगतो मदः क्षणेन ॥५.१४ जगत् के व्याधि जरा-मरणरूप दोषों को वह ठीक-ठीक देख ही रहा था कि बल, यौवन व जीवन से होनेवाला उसका आत्मगत मद (अहङ्कार) एक ही क्षण में विलीन हो गया ॥१४॥ न जहर्ष न चापि चानुतेपे विचिकित्सां न ययौ न तन्द्रिनिद्रे । न च कामगुणेषु संररञ्जे न विदिद्वेष परं न चावमेने ॥५.१५ उसे न हर्ष हुआ न विषाद, न संशय, न आलस्य, न नींद। और, काम के आकर्षणों (= कामोपभोगों से) अनुराग नहीं हुआ, (मन में) दूसरे से न द्वेष किया और न दूसरे की अवज्ञा ॥१५॥ इति बुद्धिरियं च नीरजस्का ववृधे तस्य महात्मनो विशुद्धा । पुरुषैरपरैरदृश्यमानः पुरुषश्चोपससर्प भिक्षुवेषः ॥५.१६ उस महात्मा की यह निर्मल विशुद्ध बुद्धि बढ़ने लगी और दूसरे लोगों से नहीं देखा जाता हुआ एक मनुष्य सन्यासी के वेष में उसके समीप आ गया ॥१६॥ नरदेवसुतस्तमभ्यपृच्छद्वद कोऽसीति शशंस सोऽथ तस्मै । नरपुङ्गव जन्ममृत्युभीतः श्रमणः प्रव्रजितोऽस्मि मोक्षहेतोः ॥५.१७ राजा के पुत्र ने उसे पूछा- "कहो कौन हो?" तब उसने उसे कहा- "हे नर-श्रेष्ठ, श्रमण (= सन्यासी) हूँ, जन्म व मरण से डरकर मोक्ष हेतु सन्यासी हुआ हूँ ॥१७॥ जगति क्षयधर्मके मुमुक्षुर्मृगयेऽहं शिवमक्षयं पदं तत् । स्वजनेऽन्यजने च तुल्यबुद्धिर्विषयेभ्यो विनिवृत्तरागदोषः ॥५.१८ क्षयशील जगत् में मैं मोक्ष चाहनेवाला अक्षय एवं कल्याणकारी पद की खोज करता हूँ। स्वजन और पराये में मेरी बुद्धि तुल्य है, विषयों से अनुराग और द्वेष, दोनों ही मुझसे चले गये हैं ॥१८॥ निवसन् क्वचिदेव वृक्षमूले विजने वायतने गिरौ वने वा । विचराम्यपरिग्रहो निराशः परमार्थाय यथोपपन्नभैक्षुः ॥५.१९ जहाँ कहीं-वृक्ष के मूल में या विजन मन्दिर में, पर्वत पर या वन में-रहता हूँ। परिवार-हीन और तृष्णा- रहित होकर, परमार्थ (=मोक्ष) के लिए विचरण करता हूँ; जो कुछ भी भिक्षा मिलती है उसे ही ग्रहण करता हूँ” ॥१९॥ इति पश्यत एव राजसूनोरिदमुक्त्वा स नभः समुत्पपात । स हि तद्वपुरन्यबुद्धदर्शी स्मृतये तस्य समेयिवान्दिवौकाः ॥५.२० राजकुमार के समक्ष ही इतना कह वह आकाश में उड़ गया। वह देवता, जिसने उस शरीर से अन्य बुद्धों को देखा था, उसकी स्मृति (जगाने) के लिए आया था ॥२०॥ गगनं खगवद्गते च तस्मिन्नृवरः सञ्जहृषे विसिस्मिये च । उपलभ्य ततश्च धर्मसञ्ज्ञामभिनिर्याणविधौ मतिं चकार ॥५.२१ पक्षी के समान उसके आसमान में उड़ जानेपर, उस नरश्रेष्ठ को हर्ष और विस्मय हुआ। और, उसके धर्म का ज्ञान पाकर उसने “(घर से) कैसे निकलूँ” इसपर विचार किया ॥२१॥ तत इन्द्रसमो जितेन्द्रियाश्व प्रविविक्षुः परमाश्वमारुरोह । परिवारजनं त्ववेक्षमाणस्तत एवाभिमतं वनं न भेजे ॥५.२२ तब वह इन्द्र-तुल्य, जिसने इन्द्रिय-रूप अश्वों को जीत लिया था, नगर में प्रवेश करने की इच्छा से घोड़े पर चढ़ा। साथियों का ख्याल करता हुआ वह वहीं से इच्छित वन को नही चला गया ॥२२॥ स जरामरणक्षयं चिकीर्षुर्वनवासाय मतिं स्मृतौ निधाय । प्रविवेश पुनः पुरं न कामाद्वनभूमेरिव मण्डलं द्विपेन्द्रः ॥५.२३ जरा मरण का विनाश करने की इच्छा से वन में रहने का अपना निश्चय याद रखते हुए उसने उसी प्रकार अनिच्छा से नगर मे प्रवेश किया, जिस प्रकार जङ्गल से हाथी (घरेलू हाथियों के) घेर में ॥२३॥ बुद्धचरित 27