बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुमार ने वैराग्य पैदा करनेवाली (= काम-आश्रय-विनाशिनी) ये निश्चयात्मक बातें कहीं और तब संसार का नेत्रस्वरूप सूर्य, जो कि दर्शनीय हो रहा था, अस्ताचल पर गया ॥100 ॥³⁰ ततो वृथाधारितभूषणस्रजः कलागुणैश्च प्रणयैश्च निष्फलैः। स्व एव भावे विनिगृह्य मन्मथं पुरं ययुर्भग्नमनोरथाः स्त्रियः ॥४.१०१ तब वे स्त्रियाँ, जिन्होंने व्यर्थ ही आभूषण और मालाएँ पहनी थीं, उत्कृष्ट कलाओं और प्रणय-चेष्टाओं के निष्फल होनेपर अपने ही मन में कामदेव का निग्रह कर, भग्नमनोरथ हो, नगर को लौट गईं ॥101 ॥³¹ ततः पुरोद्यानगतां जनश्रियं निरीक्ष्य सायं प्रतिसंहृतां पुनः। अनित्यतां सर्वगतां विचिन्तयन्निवेश धिष्ण्यं क्षितिपालकात्मजः ॥४.१०२ तब नगर-उद्यान की जन-शोभा को फिर संध्या समय समेटी गई देखकर, सर्वव्यापिनी अनित्यता की चिन्ता करते हुए राज-कुमार ने महल में प्रवेश किया ॥102 ॥ ततः श्रुत्वा राजा विषयविमुखं तस्य तु मनो न शिश्ये तां रात्रिं हृदयगतशल्यो गज इव। अथ श्रान्तो मन्त्रे बहुविविधमार्गे ससचिवो न सोऽन्यत्कामेभ्यो नियमनमपश्यत्सुतमतेः ॥४.१०३ तब उसका मन विषयों से विमुख हुआ सुनकर राजा (उस) हाथी के समान जिसकी छाती में बर्छी गड़ी हुई हो, उस रात को न सोया। तब सचिवों के साथ विविध उपायों की मन्त्रणा करने में थककर उसने पुत्र-बुद्धि के नियन्त्रण के लिए काम के अतिरिक्त दूसरा उपाय न देखा ॥103 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये स्त्रीविघातातो नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥ पञ्चम सर्ग अभिनिष्क्रमण स तथा विषयैर्विलोभ्यमानः परमार्हैरपि शाक्यराजसूनूः। न जगाम धृतिं न शर्म लेभे हृदये सिंह इवातिदिग्धविद्धः ॥५.१ बहुमूल्य विषयों से उस प्रकार लुभाये जानेपर भी उस शाक्य-राज-पुत्र को (उस) सिंह के समान, जिनका हृदय विष-लिप्त तीर से अत्यन्त विद्ध हो, न धैर्य हुआ न चैन ॥1 ॥ अथ मन्त्रिसुतैः क्षमैः कदाचित्सखिभिश्चित्रकथैः कृतानुयात्रः। वनभूमिदिदृक्षया शमेप्सुर्नरदेवानुमतो बहिः प्रतस्थे ॥५.२ तब एक बार शान्ति-प्राप्ति के उस इच्छुक ने, राजा से अनुमति पाकर, वन-भूमि देखने के लिए बाहर प्रस्थान किया; मन्त्रियों के पुत्र, जो उसके योग्य मित्र थे और जो चित्र-विचित्र कथाएँ जानते थे, उसके साथ गये ॥2 ॥ नवरुक्मखलीनकिङ्किणीकं प्रचलच्चामरचारुहेमभाण्डम्। अभिरुह्य स कन्थकं सदश्वं प्रययौ केतुमिव द्रुमाब्जकेतुः ॥५.३ नये सोने की लगाम व घुँघुरूवाले तथा हिलते हुए चामरों से शोभित सुवर्ण अलङ्कारोंवाले अच्छे घोड़े कन्थक पर चढ़कर, वह बाहर गया, जैसे पताका दण्ड पर कनेल फूल का चिह्न विराजमान हो ॥3 ॥³² स विकृष्टतरां वनान्तभूमिं वनलोभाच्च ययौ महीगुणेच्च। सलिलोर्मिविकारसीरमार्गां वसुधां चैव ददर्श कृष्यमाणाम् ॥५.४ जङ्गल की लालच व पृथ्वी की उत्कृष्टता से आकृष्ट होकर वह अत्यन्त दूर की जङ्गल भूमि की ओर गया और जोती जा रही धरती को देखा, जिसपर हलों (की जुताई) के मार्ग जलतरङ्गों के समान देख पड़ते थे ॥4 ॥ हलभिन्नविकीर्णशष्पदभ्भां हतसूक्ष्मकृमिकीटजन्तुकीर्णाम्। समवेक्ष्य रसां तथाविधां तां स्वजनस्येव वधे भृशं शुशोच ॥५.५ जिसपर हलों से कटे बाल-तृण व कुश तथा मरे हुए छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े बिखरे हुए थे वैसी उस धरती को देखकर उसने वैसे ही शोक किया, जैसे कि स्वजन की हत्या होनेपर ॥5 ॥ कृषतः पुरुषांश्च वीक्षमाणः पवनांशुंरजसाविभिन्नवर्णान्। वहनक्रमविक्लवांश्च धुर्यान् परमार्यः परमां कृपां चकार ॥५.६ हवा, सूर्यकिरण व धूल से विवर्ण हुए कृषक पुरुषों तथा हल में बहने के श्रम से विकल हुए बैलों को देखकर उस परम आर्य (कुमार) को बड़ी करुणा हुई ॥6 ॥ अवतीर्य ततस्तुरङ्गपृष्ठाच्छनकैर्गां व्यचरच्छुचा परीतः। जगतो जननव्ययं विचिन्वन् कृपणं खल्विदमित्युवाच चार्तः ॥५.७ तब घोड़े की पीठ से उतरकर उसने पृथ्वी पर शोकित हो धीरे-धीरे विचरण किया और जगत् के जन्म और विनाश की छानबीन करते हुए आर्त्त होकर कहा— "यह जगत् निश्चय ही दीन है।" ॥7 ॥ मनसा च विविक्ततामभीप्सुः सुहृदस्ताननुयायिनो निवार्य। अभितश्चलचारुपर्णवत्या विजने मूलमुपेयिवान् स जम्ब्वाः ॥५.८ मानसिक पवित्रता (या एकान्त) पाने की इच्छा से उन अनुयायी मित्रों को रोककर, वह विजन भूमि में जम्बू-वृक्ष के मूल के समीप गया, जिसके सुन्दर पत्ते चारों ओर हिल रहे थे ॥8 ॥ ³⁰- गमनीयमण्डल = दर्शनीय मण्डल्य दर्शनीय = सुन्दर होने के कारण देखने योग्य या तेज क्षीण होने के कारण आसानी से देखा जाने योग्य। ³¹- भाव = उत्पत्ति-स्थान; काम का उत्पत्ति-स्थान है मन। ³²- केतुपर द्रुमाब्ज-केतु = पताका-दण्ड (या स्तम्भ) पर (द्रुमाब्ज= द्रुमोत्पल) कनेल फूल का चिह्न; वास्तव में इस वाक्यांश का अर्थ स्पष्ट नहीं है। 26 अश्वघोष