बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैं विषयों की अवज्ञा नही करता हूँ, संसार को उनमें रत जानता हूँ। जगत् को अनित्य मानकर मेरा मन इसमें नही रम रहा है ॥85॥ जरा व्याधिश्च मृत्युश्च यदि न स्यादिदं त्रयम् । ममापि हि मनोज्ञेषु विषयेषु रतिर्भवेत् ॥४.८६ यदि जरा, व्याधि व मृत्यु, ये तीनों नही रहते, तो मनोज्ञ विषयों में मुझे भी आनन्द होता ॥86॥ नित्यं यद्यपि हि स्त्रीणामेतदेव वपुर्भवेत् । दोषवत्स्वपि कामेषु कामं रज्यते मे मनः ॥४.८७ यदि स्त्रियों का यही रूप नित्य (चिरस्थायी) होता, तो इन दोषयुक्त विषयों में भी मेरा मन अवश्य लगता ॥87॥ यदा तु जरयापीतं रूपमासां भविष्यति । आत्मनोऽप्यनभिप्रेतं मोहात्तत्र रतिर्भवेत् ॥४.८८ जब इनका रूप जरा के द्वारा पिया (नष्ट किया) जायगा तब (वह रूप) अपने लिए भी घृणाजनक ही होगा, मोह से ही उसमें आनन्द हो ॥88॥ मृत्युव्याधिजराधर्मो मृत्युव्याधिजरात्मभिः । रममाणो ह्यसंविग्नः समानो मृगपक्षिभिः ॥४.८९ मृत्यु, व्याधि व जरा के अधीन रहनेवाला मनुष्य यदि मृत्यु-व्याधि-जरा के अधीन रहनेवालों के साथ रमण करता हुआ संविग्न (= विरक्त, भयभीत) न हो तो वह पशु-पक्षियों के समान है ॥89॥ यदप्यात्थ महात्मानस्तेऽपि कामात्मका इति । संवेगोऽत्रैव कर्तव्यो यदा तेषामपि क्षयः ॥४.९० यह जो कहा है कि महात्मा भी कामी थे, इसमे तो संवेग ही करना चाहिए कि उनका भी विनाश हुआ ॥90॥ माहात्म्यं न च तन्मन्ये यत्र सामान्यतः क्षयः । विषयेषु प्रसक्तिर्वा युक्तिर्वा नात्मवत्तया ॥४.९१ मैं उसे माहात्म्य नही मानता हूँ जिसमें समान रूप से क्षय होता है। आत्मवान् (संयतात्मा) पुरुषों को विषयों में आसक्ति नहीं होती है और न वे विषयों के लिए युक्ति (तर्क या उपाय) ही करते हैं ॥91॥ यदप्यात्थानृतेनापि स्त्रीजने वर्त्यतामिति । अनृतं नावगच्छामि दाक्षिण्येनापि किञ्चन ॥४.९२ यह जो कहा है कि असत्यता से भी स्त्रियों से बरतना चाहिए, मैं असत्यता नही समझता हूँ (और) न उदारता से भी कुछ ॥92॥ न चानुवर्तनं तन्मे रुचितं यत्र नार्जवम् । सर्वभावेन सम्पर्कौ यदि नास्ति धिगस्तु तत् ॥४.९३ वह अनुकूल आचरण मुझे नही रुचता है जिसमें सरलता (निष्कपटता) नही। यदि सर्वभाव (हृदय) से सम्पर्क नही है, तो उसे धिक्कार है ॥93॥ अनृते श्रद्दधानस्य सक्तस्यादोषदर्शिनः । किं हि वञ्चयितव्यं स्याज्जातरागस्य चेतसः ॥४.९४ अधीर, विश्वास करनेवाले, आसक्त, दोषों को नहीं देख सकनेवाले तथा अनुरक्त चित्त को क्या वञ्चित करना (= ठगना) चाहिए? ॥94॥ वञ्चयन्ति च यद्येव जातरागाः परस्परम् । ननु नैव क्षमं द्रष्टुं नराः स्त्रीणां नृणां स्त्रियः ॥४.९५ यदि कामासक्त (लोग) एक दूसरे को इसी तरह वञ्चित करते हैं, तो पुरुष स्त्रियों के देखने योग्य नही और न स्त्रियाँ पुरुषों के ॥95॥ तदेवं सति दुःखार्त्तं जरामरणभागिनम् । न मां कामेष्वनार्येषु प्रतारयितुमर्हसि ॥४.९६ ऐसा होनेपर मुझे, जो दुःख से आर्त हैं और जिनके भाग्य में जरा और मरण हैं, अनार्य विषयों में लगाकर तुम्हें नही ठगना चाहिए ॥96॥ अहोऽतिधीरं बलवच्च ते मनश्श्लेषु कामेषु च सारदर्शिनः । भयेऽतितीव्रे विषयेषु सज्जसे निरीक्षमाणो मरणाध्वनि प्रजाः ॥४.९७ अहो! तुम्हारा मन अति धीर व बलवान् है जो चञ्चल कामोपभोगों में सार देखते हो। अति तीव्र भय के रहते हुए, मृत्यु-मार्ग पर प्रजाओं को देखते हुए तुम विषयों में आसक्त होते हो ॥97॥ अहं पुनर्भौरुरतीवविक्कवो जराविपद्व्याधिभयं विचिन्तयन् । लभे न शान्तिं न धृतिं कुतो रतिं निशामयन्दीप्तमिवाग्निना जगत् ॥४.९८ और, मैं जरा, मृत्यु व व्याधि की चिन्ता करता हुआ भयभीत और अति विकल हूँ। आग से मानो जलते जगत् को देखकर, न शान्ति पाता हूँ न धैर्य, आनन्द कहाँ से (पाऊँगा)? ॥98॥ असंशयं मृत्युरिति प्रजानतो नरस्य रागो हृदि यस्य जायते । अयोमयीं तस्य परैमि चेतनां महाभये रज्यति यो न रोदिति ॥४.९९ मृत्यु अवश्यंभावी है यह जानते हुए जिस मनुष्य के हृदय में काम पैदा होता है उसकी बुद्धि को लोहे की बनी समझता हूँ, क्योंकि (मृत्युरूपी) महाभय के रहते हुए, वह आनन्दित होता है, रोता नहीं" ॥99॥ अथौ कुमारश्च विनिश्चयात्मिकां चकार कामाश्रयघातिनीं कथाम् । जनस्य चक्षुर्गमनीयमण्डलो महीधरं चास्तमियाय भास्करः ॥४.१००
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