भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

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इसलिए, हे विशालाक्ष, हृदय विमुख होनेपर भी अपने रूप के अनुरूप उदारता से तुम्हें उनके अनुकूल आचरण करना चाहिए ॥69 ॥ दाक्षिण्यमौषधं स्त्रीणां दाक्षिण्यं भूषणं परम् । दाक्षिण्यरहितं रूपं निष्पुष्पमिव कानम् ॥४.७० उदारता स्त्रियों के लिए औषध है, उदारता श्रेष्ठ भूषण है; उदारता-रहित रूप पुण्य-विहीन उद्यान के समान है ॥70 ॥ किं वा दाक्षिण्यमात्रेण भावेनास्तु परिग्रहः । विषयान्दुर्लभाँल्लब्ध्वा न ह्यवज्ञातुमर्हसि ॥४.७१ केवल उदारता से क्या? (भीतरी) भाव से ग्रहण करो। दुर्लभ विषयों को पाकर तुम्हें तिरस्कृत नही करना चाहिए ॥71 ॥ कामं परमिति ज्ञात्वा देवोऽपि हि पुरन्दरः । गौतमस्य मुनेः पत्नीमहल्यां चकमे पुरा ॥४.७२ प्राचीन काल में काम (प्रेम) को श्रेष्ठ जानकर, इन्द्रदेव ने गौतम मुनि की पत्नी अहल्या को चाहा ॥72 ॥ अगस्त्यः प्रार्थयामास सोमभार्यां च रोहिणीम् । तस्मात्तत्सदृशीं लेभे लोपामुद्रामिति श्रुतिः ॥४.७३ और, अगस्त्य ने सोम की भार्या रोहिणी के लिए प्रार्थना की। इस कारण उसने उसी (रोहिणी) के सदृश लोपामुद्रा पाई, ऐसी अनुश्रुति है ॥73 ॥ उतथ्यस्य च भार्यायां ममतायां महातपः । मारुत्यां जनयामास भरद्वाजं बृहस्पतिः ॥४.७४ और, उतथ्य की भार्या, मरुत की पुत्री ममता में, महातपस्वी बृहस्पति ने भरद्वाज को उत्पन्न किया ॥74 ॥ बृहस्पतेर्महिष्यां च जुहुत्यां जुह्वतां वरः । बुधं विबुधर्माणं जनयामास चन्द्रमाः ॥४.७५ और हवन करनेवाली बृहस्पति की पत्नी में हवन करनेवालों में श्रेष्ठ चन्द्रमा ने बुध को उत्पन्न किया, जिसके कर्म देवता के-से थे ॥75 ॥ कालीं चैव पुरा कन्यां जलप्रभवसम्भवाम् । जगाम यमुनातीरे जातरागः पराशरः ॥४.७६ और पूर्वकाल में काम (-वासना) उत्पन्न होनेपर, पराशर यमुना-तटपर मछली से उत्पन्न हुई कन्या काली के पास गया ॥76 ॥ मातङ्ग्यामक्षमालायां गर्हितायां रिरंसया । कपिञ्जलादं तनयं वसिष्ठोऽजनयन्मुनिः ॥४.७७ रमण करने की इच्छा से वशिष्ठ मुनि ने निन्दित चाण्डाल जाति की (कन्या) अक्षमाला में कपिञ्जलाद नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥77 ॥ ययातिश्चैव राजर्षिर्वयस्यपि विनिर्गते । विश्वाच्याप्सरसा सार्धं रेमे चैत्ररथे वने ॥४.७८ और, उम्र ढलने पर भी राजर्षि ययाति ने विश्वाची अप्सरा के साथ चैत्ररथ वन में रमण किया ॥78 ॥ स्त्रीसंसर्गं विनाशान्तं पाण्डुर्ज्ञात्वापि कौरवः । माद्रीरूपगुणाक्षिप्तः सिषेवे कामजं सुखम् ॥४.७९ स्त्री-संसर्ग को विनाशकारी जानकर भी कुरुवंश पाण्डु ने माद्री के रूप-गुण से आकृष्ट होकर काम-ज सुख का सेवन किया ॥79 ॥ करालजनकश्चैव हृत्वा ब्राह्मणकन्यकाम् । अवाप भ्रंशमप्येवं न तु सेजे न मन्मथम् ॥४.८० और करालजनक ने ब्राह्मण-कन्या का हरण किया और इस प्रकार भ्रष्ट होकर भी वह काम में आसक्त ही रहा ॥80 ॥ एवमाद्या महात्मानो विषयान् गर्हितानपि । रतिहेतोर्भुभुजिरे प्रागेव गुणसंहितान् ॥४.८१ इस प्रकार आद्य महात्माओं ने रति (सम्भोग, आनन्द) हेतु निन्दित विषयों का भी उपभोग किया, निर्दोष विषयों का तो पहले ही ॥81 ॥ त्वं पुनर्न्यायतः प्राप्तान् बलवान्रूपवान्युवा । विषयानवजानासि यत्र सक्तमिदं जगत् ॥४.८२ तुम बलवान् रूपवान् युवा फिर न्याय से प्राप्त विषयों की अवहेलना करते हो, जिनमें कि यह जगत् आसक्त है ॥82 ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य श्लक्ष्णमागमसंहितम् । मेघस्तनितनिर्घोषः कुमारः प्रत्यभाषत ॥४.८३ शास्त्रों से एकत्र किये गए उसके मनोहर वचन सुनकर, मेघ-गर्जन की-सी वाणी में कुमार ने उत्तर दियाः- ॥83 ॥ उपपन्नमिदं वाक्यं सौहार्दव्यञ्जकं त्वयि । अत्र च त्वानुनेष्यामि यत्र मा दुष्ठु मन्यसे ॥४.८४ “यह सौहार्द-सूचक बात तुम्हारे ही योग्य है। मैं तुमसे कुछ अनुनय करूँगा, जिन बातों में कि तुम मुझे बुरा मानते हो ॥84 ॥ नावजानामि विषयान् जाने लोकं तदात्मकम् । अनित्यं तु जगन्मत्वा नात्र मे रमते मनः ॥४.८५ 24 अश्वघोष