भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

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एवमाक्षिप्यमाणोऽपि स तु धैर्यावृतेन्द्रियः । मर्तव्यमिति सोद्वेगो न जहर्ष न विव्यथे ॥४.५४ इस प्रकार आकृष्ट किया जानेपर भी, वह धीर-इन्द्रियवाला (= जितेन्द्रिय) “मरना पड़ेगा” इस (विचार) से उद्वेग-युक्त होकर न आनन्दित हुआ और न व्यथित ॥५४ ॥ तासां तत्त्वेऽनवस्थानं दृष्ट्वा स पुरुषोत्तमः । ससं विघ्नेन धीरेण चिन्तयामास चेतसा ॥४.५५ तत्त्व में उसकी स्थिरता न देखकर उस पुरुषोत्तम ने एक ही साथ संविग्न व धीर चित्त से सोचा:- ॥५५ ॥ किं विमा नावगच्छन्ति चपलं यौवनं स्त्रियः । यतो रूपेण सम्पत्तं जरा यन्नाशयिष्यति ॥४.५६ “क्या ये स्त्रियाँ यौवन का क्षणिक नही समझ रही हैं? ये उन्मत्त हैं अपने रूप से, जिसे जरा नष्ट कर देगी ॥५६ ॥ नूनमेता न पश्यन्ति कस्यचिद्रोगसम्पप्लवम् । तथा हृष्टा भयं त्यक्त्वा जगति व्याधिधर्मिणि ॥४.५७ निश्चय ही यह किसी को रोग से आक्रान्त नही देखती हैं; (इसलिए) व्याधि-धर्मा जगत् में भय छोड़कर ये इस प्रकार आनन्दित हैं ॥५७ ॥^२९ अनभिज्ञाश्च सुव्यक्तं मृत्योः सर्वापहारिणः । ततः स्वस्था निरुद्विग्नाः क्रीडन्ति च हसन्ति च ॥४.५८ स्पष्ट ही सबको दूर ले जानेवाली मृत्यु से अनभिज्ञ हैं; इसीलिए स्वस्थ और और उद्वेग-रहित होकर ये खेलती व हँसती हैं ॥५८ ॥ जरां व्याधिं च मृत्युं च को हि जानन्सचेतनः । स्वस्थस्तिष्ठेन्निषीदेद्वा शयेद्वा किं पुनर्हसेत् ॥४.५९ जरा, व्याधि व मृत्यु को जानता हुआ कौन बुद्धिमान् स्वस्थ होकर खड़ा हो या बैठे या सोये, फिर हँसे ही क्यों? ॥५९ ॥ यस्तु दृष्ट्वा परं जीर्णं व्याधितं मृतमेव च । स्वस्थो भवति नोद्विग्नो यथाचेतास्तथैव सः ॥४.६० जो दूसरे को वृद्ध, रोगी या मृत देखकर स्वस्थ रहता है, उद्विग्न नही होता, वह वैसा ही है जैसा कि अचेतन ॥६० ॥ वियुज्यमाने हि तरौ पुष्पैर्अपि फलैरपि । पतति च्छिद्यमाने वा तरुरन्यो न शोचते ॥४.६१ क्योंकि फूलों और फलों से अलग होकर अब (एक) वृक्ष गिरता है या काटा जाता है, तब दूसरा वृक्ष शोक नही करता है” ॥६१ ॥ इति ध्यानपरं दृष्ट्वा विषयेभ्यो गतस्पृहम् । उदायी नीतिशास्त्रज्ञस्तमुवाच सुहृत्तया ॥४.६२ इस प्रकार उसे ध्यानमग्न और निरभिलाप देखकर नीति-शास्त्रज्ञ उदायी ने मित्रता से कहा:- ॥६२ ॥ अहं नृपतिना दत्तः सखा तुभ्यं क्षमः किल । यस्मात्त्वयि विवक्षा मे तया प्रणयवत्तया ॥४.६३ “मैं राजा के द्वारा नियुक्त किया गया तुम्हारा योग्य मित्र हूँ, इसलिए प्रेमपूर्वक मैं तुम्हें (कुछ) कहना चाहता हूँ ॥६३ ॥ अहितात्प्रतिषेधश्च हिते चानुप्रवर्तनम् । व्यसने चापरित्यागस्त्रिविधं मित्रलक्षणम् ॥४.६४ अहित से रोकना, हित में लगाना और विपत्ति में नही छोड़ना—मित्र के (ये) तीन लक्षण हैं ॥६४ ॥ सोऽहं मैत्रीं प्रतिज्ञाय पुरुषार्थात्पराङ्मुखम् । यदि त्वां समुपेक्षेय न भवेन्मित्रता मयि ॥४.६५ मैत्री की प्रतिज्ञाकर, पुरुषार्थ (=पुरुष के काम) से विमुख हो, यदि मैं तुम्हारी उपेक्षा करूँ, तो मुझमें मित्रता नही होगी ॥६५ ॥ तद्ब्रवीमि सुहृद्भूत्वा तरुणस्य वपुष्मतः । इदं न प्रतिरूपं ते स्त्रीष्वदाक्षिण्यमीदृशम् ॥४.६६ इसलिए मित्र होकर मैं कहता हूँ कि स्त्रियों के प्रति उदारता का यह ऐसा अभाव तुझ सुन्दर तरुण के अनुरूप नही है ॥६६ ॥ अनृतेनापि नारीणां युक्तं समनुवर्तनम् । तद्व्रीडापरिहारार्थमात्मरत्यर्थमेव च ॥४.६७ स्त्रियों के लज्जा-परित्याग तथा अपने आनन्द के लिए असत्यता से भी उनके अनुकूल आचरण करना उचित है ॥६७ ॥ सन्नतिश्चानुवृत्तिश्च स्त्रीणां हृदयबन्धनम् । स्नेहस्य हि गुणा योनिर्मानकामाश्च योषितः ॥४.६८ नम्रता व अनुकूल आचरण स्त्रियों के हृदय के लिए बन्धन हैं; क्योंकि सद्गुण ही स्नेह का उत्पत्ति-स्थान है और स्त्रियाँ सम्मान चाहती हैं ॥६८ ॥ तदर्हसि विशालाक्ष हृदयेऽपि पराङ्मुखे । रूपस्यानुरूपेण दाक्षिण्येनानुवर्तितुम् ॥४.६९


^२९- व्याधिधर्मा = व्याधि जिसका धर्म अर्थात् स्वभाव है ।

बुद्धचरित 23