भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

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ततो निवृत्तः स निवृत्तहर्षः प्रध्यानयुक्तः प्रविवेश वेश्म। तं द्विरस्तथा प्रेक्ष्य च सन्निवृत्तं पर्येषणं भूमिपतिश्चकार ॥३.४८ तब हर्ष-रहित होकर वह लौटा, चिन्तित होकर अपने महल में घुसा। और, उसे दो बार उस प्रकार लौटा देखकर, राजा ने जिज्ञासा की ॥48॥ श्रुत्वा निमित्तं तु निवर्तनस्य सन्त्यक्तमात्मानमनेन मेने। मार्गस्य शौचाधिकृताय चैव चुक्रोश रुष्टोऽपि च नोग्रदण्डः ॥३.४९ लौटने का कारण सुनकर उसने अपने को उससे परित्यक्त माना। और मार्ग के शौचाधिकारी की भर्त्सना की, रुष्ट होनेपर भी वह उग्रदण्ड नहीं हुआ अर्थात् कठोर दण्ड नहीं दिया ॥49॥ भूयश्च तस्मै विदधे सुताय विशेषयुक्तं विषयप्रचारम्। चलेन्द्रियत्वादपि नाम सक्तो नास्मान्विजह्यादिति नाथमानः ॥३.५० और फिर उस पुत्र के लिए विशेष विषय-सेवन का प्रबन्ध किया, इस आशा से कि- “शायद इन्द्रिय- चञ्चलता के कारण (विषयों में) आसक्त होकर (यह) हमें न छोड़े” ॥50॥ यदा च शब्दादिभिरिन्द्रियार्थैरन्तःपुरे नैव सुतोऽस्य रेमे। ततो बहिर्व्यादिशति स्म यात्रां रसान्तरं स्यादिति मन्यमानः ॥३.५१ और जब शब्द आदि इन्द्रिय-विषयों से अन्तःपुर में उसके पुत्र को आनन्द नहीं हुआ, तब (राजा ने) बाहर यात्रा करने का आदेश दिया, यह समझते हुए कि (इससे कहीं) रुचि-परिवर्तन हो जाय ॥51॥ स्नेहाच्च भावं तनयस्य बुद्ध्वा स रोगदोषानविचिन्त्य कांश्चित्। योग्याः समाज्ञापयति स्म तत्र कलास्वभिज्ञा इति वारमुख्याः ॥३.५२ और स्नेह से पुत्र का भाव समझकर तथा राग के किन्हीं दोषों का बिना विचार किए ही उसने कलाओं में निपुण योग्य वारमुख्याँ (= सम्मानित वेश्याओं) को वहाँ (रहने की) आज्ञा दी ॥52॥ ततो विशेषेण नरेन्द्रमार्ग स्वलङ्कृते चैव परीक्ष्यिते च। व्यत्यस्य सूतं च रथं च राजा प्रस्थापयामास बहिः कुमारम् ॥३.५३ तब विशेषता के साथ राज-मार्ग अलङ्कृत और परीक्षित होनेपर, सारथि एवं रथ को बदलकर राजा ने कुमार को बाहर प्रस्थान कराया ॥53॥ ततस्तथा गच्छति राजपुत्रे तैरेव देवैर्विहितो गतासुः। तं चैव मार्गे मृतमुह्यमानं सूतः कुमारश्च ददर्श नान्यः ॥३.५४ जब राजा का पुत्र उस प्रकार जा रहा था, तब उन्हीं देवों ने एक निष्प्राण (व्यक्ति) को बनाया। और, मार्ग में ढोये जाते उस मरे हुए को सारथि और कुमार ने देखा, दूसरे किसी ने नहीं ॥54॥ अथाब्रवीद्राजसुतः स सूतं नरैश्चतुर्भिर्हियते क एषः। दीनैर्मनुष्यैरनुगम्यमानो (वि)भूषितश्चाप्यवरुद्यते च ॥३.५५ तब उस राज-कुमार ने सारथि से कहा- “यह कौन है? इसे चार पुरुष लिये जा रहे हैं, दीन मनुष्य इसके पीछे-पीछे जा रहे हैं, और विशेषता से भूषित होनेपर भी इसके लिए रोया जा रहा है” ॥55॥ ततः स शुद्धात्मभिरेव देवैः शुद्धाधिवासैरभिभूतचेताः। अवाच्यमप्यर्थमिमं नियन्ता प्रव्याजहारार्थवदीश्वराय ॥३.५६ तब शुद्ध स्वभाववाले शुद्धाधिवास देवों ने जिसका चित्त अभिभूतकर दिया था उस सारथि ने यह अवाच्य बात भी (उस) पर-श्रेष्ठ से कही:- ॥56॥ बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः सुप्तो विसञ्ज्ञस्तृणकाष्ठभूतः। सम्वर्ध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैस्त्यज्यत एष कोऽपि ॥३.५७ “यह कोई है, जो बुद्धि इन्द्रियों प्राणों और गुणों से वियुक्त, (सदा के लिए) सोया हुआ और सञ्ज्ञा-हीन है, तथा तृण एवं काष्ठ (के समान) हो गया है। प्रयत्नपूर्वक संवर्धन और संरक्षण करके भी प्रिय (स्व-) जन इसे छोड़ रहे हैं” ॥57॥ इति प्रणेतुः स निशम्य वाक्यं सञ्चक्षुभे किञ्चिदुवाच चैनम्। किं केवलोऽस्यैव जनस्य धर्मः सर्वप्रजानामयमीदृशोऽन्तः ॥३.५८ सारथि का वाक्य सुनकर, वह कुछ संक्षुब्ध हुआ और उसे कहा- “क्या यह धर्म केवल इसी मनुष्य का है या सब प्रजाओं (=जीवों) का अन्त ऐसा ही है?” ॥58॥ ततः प्रणेता वदति स्म तस्मै सर्वप्रजानामिदमन्तकर्म। हीनस्य मध्यस्य महात्मनो वा सर्वस्य लोके नियतो विनाशः ॥३.५९ तब सारथि ने उससे कहा- “सब प्रजाओं (=जीवों) का यह अन्तिम कर्म है। हीन मध्य या महात्मा का, संसार में सबका, विनाश नियत है” ॥59॥ ततः स धीरोऽपि नरेन्द्रसूनुः श्रुत्वैव मृत्युं विषसाद सद्यः। अंसेन संशिष्य च कूबराग्रं प्रोवाच निह्लादवता स्वरेण ॥३.६० तब धीर होनेपर भी उस राजकुमार को, मृत्यु (की बात) सुनकर, तुरत विषाद हो गया। और कन्धे से कूबर²³ के अग्रभाग का सहारा लेकर, उसने गम्भीर स्वर से कहा:- ॥60॥ इयं च निष्ठा नियता प्रजानां प्रमाद्यति त्यक्तभयश्च लोकः। मनांसि शङ्के कठिनानि नृणां स्वस्थास्तथा ह्यध्वनि वर्तमानाः ॥३.६१ “प्रजाओं का यह विनाश नियत है और संसार भय छोड़कर असावधानी कर रहा है। मनुष्यों के मन, मैं सोचता हूँ, कठोर हैं, क्योंकि (मृत्यु-) मार्ग में रहते हुए वे उस प्रकार सुखी हैं ॥61॥ तस्माद्रथं सूत निवर्तयतां नो विहारभूमेनं हि देशकालः। जानन्विनाशं कथ मार्त्तिकाले सचेतनः स्यादिह हि प्रमत्तः ॥३.६२


²³ कूबर = रथ का कोई भाग।


18 अश्वघोष