बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“आप आयुष्मान् की भी यह वृद्धावस्था कालवश निःसन्देह होगी। ऐसी रूप-विनाशिनी जरा को लोग जानते हैं और इसे चाहते हैं” ॥३३॥ ततः स पूर्वाशयशुद्धबुद्धिर्विस्तीर्णकल्पाचितपुण्यकर्मा । श्रुत्वा जरां संविविजे महात्मा महाशनेर्घोषमिवान्तिके गौः ॥३.३४ तब वह महात्मा, पूर्व के विचारों से जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गई थी, और अनेक कल्पों में जिसके पुण्य कर्म एकत्र हुए थे, जरा को सुनकर वैसे ही संविग्न हुआ, जैसे समीप में महावज्र का शब्द सुनकर गाय ॥३४ ॥ निःश्वस्य दीर्घं स्वशिरः प्रकंप्य तस्मिंश्च जीर्णे विनिवेश्य चक्षुः । तां चैव दृष्ट्वा जनतां सहर्षां वाक्यं स संविग्न इदं जगाद ॥३.३५ लम्बी साँसे लेकर, अपना शिर कँपाकर, उस वृद्ध की ओर दृष्टि लगाये हुए, उस जनता को प्रसन्न देखकर, उस संविग्न ने यह वाक्य कहा:- ॥३५ ॥ एवं जरा हन्ति च निर्विशेषं स्मृतिं च रूपं च पराक्रमं च। न चैव संवेगमुपैति लोकः प्रत्यक्षतोऽपीदृशमीक्षमाणः ॥३.३६ “इस प्रकार जरा, स्मृति रूप और पराक्रम की बिना भेद-भाव के हत्या करती है; और प्रत्यक्ष ऐसा देखते हुए भी लोगों को संवेग नही होता ॥३६॥ एवं गते सूत निवर्त्तयाश्वान् शीघ्रं गृहाण्येव भवान्प्रयातु । उद्यानभूमौ हि कुतो रतिर्मे जरामये चेतसि वर्तमाने ॥३.३७ ऐसा होनेपर, हे सारथि, घोड़ों को लौटाइये, शीघ्र घर को ही आप चलें; चित्त में जरा का भय रहनेपर उद्यान-भूमि में मुझे कहाँ से आनन्द होगा?” ॥३७॥ अथाज्ञया भर्तुसुतस्य तस्य निवर्तयामास रथं नियन्ता । ततः कुमारो भवनं तदेव चिन्तावशः शून्यमिव प्रपेदे ॥३.३८ अनन्तर उस स्वामि पुत्र की आज्ञा से सारथि ने रथ को लौटाया। तब कुमार उसी महल में पहुँचा, जो उस चिन्तित के लिए शून्य-सा था ॥३८ ॥ यदा तु तत्रैव न शर्म लेभे जरा जरेति प्रपरीक्षमाणः । ततो नरेन्द्रानुमतः स भूयः क्रमेण तेनैव बहिर्जगाम ॥३.३९ “जरा-जरा (क्या है)” इस प्रकार (इसे) परखते हुए जब उसने वहाँ भी शान्ति नहीं पाई, तब राजा की अनुमति से वह फिर उसी क्रम से बाहर गया ॥३९॥ अथापरं व्याधिपरीतदेहं त एव देवाः ससृजुर्मनुष्यम् । दृष्ट्वा च तं सारथिमाबभाषे शौद्धोदनिस्तद्गतदृष्टिरेव ॥३.४० तब उन्हीं देवों ने रोग से ग्रस्त देहवाले दूसरे मनुष्य का सृजन किया और उसे देखकर शुद्धोदन के पुत्र ने उसी की ओर दृष्टि किये हुए सारथि से कहा:- ॥४०॥ स्थूलोदरः श्वासचलच्छरीरः स्रस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः । अम्बेति वाचं करुणं ब्रुवाणः परं समाश्रित्य नरः क एषः ॥३.४१ “यह कौन मनुष्य है? इसका पेट फूला हुआ है, साँस से शरीर काँप रहा है, कन्धे और बाहुएँ ढीली हैं, गात दुबला और पीला है। दूसरे का सहारा लेकर करुण स्वर से ‘माँ माँ’ कह रहा है” ॥४१॥ ततोऽब्रवीत्सार्थिरस्य सौम्य धातुप्रकोपप्रभवः प्रवृद्धः । रोगाभिधानः सुमहाननर्थः शक्तोऽपि येनैष कृतोऽस्वतन्त्रः ॥३.४२ तब सारथि ने इसे कहा- “हे सौम्य (त्रि-) धातु-प्रकोप से उत्पन्न होकर बढ़ा हुआ यह रोगनामक महा- अनर्थ है, जिसने इस शक्तिमान् को भी परतन्त्र कर दिया है” ॥४२॥²² इत्यूचिवान् राजसुतः स भूयस्तं सानुकम्पो नरमीक्षमाणः । अस्यैव जातो पृथगेष दोषः सामान्यतो रोगभयं प्रजानाम् ॥३.४३ उस मनुष्य की अनुकम्पा के साथ देखते हुए उस नृपात्मज ने पुनः पूछा- “यह दोष केवल इसी को हुआ है या रोग का भय समान रूप से (सब) प्रजाओं को है?” ॥४३॥ ततो बभाषे स रथप्रणेता कुमार साधारण एष दोषः । एवं हि रोगैः परिपीड्यमानो रुजातुरो हर्षमुपैति लोकः ॥३.४४ तब बह सारथि बोला- “हे कुमार, यह दोष साधारण है। इस प्रकार रोगों से परिपीड़ित होता हुआ, कष्ट से आतुर संसार हर्ष को प्राप्त होता है” ॥४४॥ इति श्रुतार्थः स विषण्णचेताः प्रावेपताम्बूर्भिगतः शशीव । इदं च वाक्यं करुणायमानः प्रोवाच किञ्चिन्मृदुना स्वरेण ॥३.४५ यह व्याख्या सुनकर, वह विषण्ण-चित्त (हो गया और) जल-तरङ्ग में पड़ते चन्द्र (-प्रतिबिम्ब) के समान काँपने लगा और दया से द्रवीभूत होते हुए उसने कुछ मृदु स्वर से यह वाक्य कहा:- ॥४५॥ इदं च रोगव्यसनं प्रजानां पश्यंश्च विश्रम्भमुपैति लोकः । विस्तीर्णविज्ञानमहो नराणां हसन्ति ये रोगभयैरमुक्ताः ॥३.४६ “प्रजाओं की यह रोगरूप विपत्ति देखते हुए भी संसार विश्वस्त (=निर्भीक) रहता है। अहो, (कितना) विशाल अज्ञान है (इन) मनुष्यों का, जो रोग-भय से अमुक्त होकर भी हँस रहे हैं ॥४६॥ निवर्त्यतां सूत बहिःप्रयाणान्नरेन्द्रसद्मैव रथः प्रयातु । श्रुत्वा च मे रोगभयं रतिभ्यः प्रत्याहतं सङ्कुचतीव चेतः ॥३.४७ हे सारथि, बाहर जाने से रथ को लौटाइये, यह राज-महल को ही चले। और रोग-भय सुनकर विषयों से प्रत्याहत मेरा मन सिकुड़-सा रहा है” ॥४७॥
²²- त्रिधातु = कफ, पित्त, वायु। बुद्धचरित 17