बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंता भ्रूभिः प्रेक्षितैर्हावैर्हसितैर्ललितैर्गतैः। चक्रुराक्षेपिकाश्चेष्टा भीतभीता इवाङ्गनाः ॥४.२५ भय-भीत सी उन स्त्रियों ने भौंहों, दृष्टि-पातों, हावों, हासों, विलासों और चालों से आकर्षण चेष्टाएँ कीं ॥25॥ राज्ञस्तु विनियोगेन कुमारस्य च मार्दवात्। जहुः क्षिप्रमविश्रम्भं मदेन मदनेन च ॥४.२६ राजा के आदेश और कुमार की मृदुता के कारण मद व मदन के वश होकर उन्होंने शीघ्र ही अविश्वास छोड़ा ॥26॥ अथ नारीजनवृतः कुमारो व्यचरद्वनम्। वासितायूथसहितः करीव हिमवद्वनम् ॥४.२७ तब स्त्रियों से घिरे कुमार ने वन में विचरण किया, जैसे हथिनियों के साथ हाथी हिमालय के वन में ॥27॥ स तस्मिन् कानने रम्ये जज्वल स्त्रीपुरःसरः। आक्रीड इव विभ्राजे विवस्वानप्सरोवृतः ॥४.२८ उस रम्य कानन में स्त्रियों के आगे-आगे जानेवाला वह वैसे ही प्रज्वलित हुआ, जैसे विभ्राज (=वैभ्राज) उद्यान में अप्सराओं से घिरा विवस्वान् (=देवता या सूर्य) ॥28॥ मदेनावर्जिता नाम तं काश्चित्तत्र योषितः। कठिनैः पस्पृशुः पीनैः संहतैर्वल्गुभिः स्तनैः ॥४.२९ मद से अनवत कुछ स्त्रियों ने अपने कठिन, पीन, दृढ़ और सुन्दर स्तनों से उसे स्पर्श किया ॥29॥ स्रस्तांसकोमललम्बमृदुबाहुलताबला। अनृतं स्खलितं काचित्कृत्वैनं सस्वजे बलात् ॥४.३० झुके हुए कन्धे से कोमलतापूर्वक लटकती मृदु बाहुलताओंवाली किसी अबला ने बनावटी गिरना दिखाकर उसे बलात् आलिङ्गन किया ॥30॥ काचित्ताम्राधरोष्ठेन मुखेनासवगन्धिना। विनिशश्वास कर्णेऽस्य रहस्यं श्रूयतामिति ॥४.३१ किसी ने मदिरा गन्ध-युक्त मुख से, जिसका निचला होंठ ताम्रवर्ण का था, उसके कान में धीरे-धीरे कहा— “रहस्य सुनिये” ॥31॥$^{27}$ काचिदाज्ञापयन्तीव प्रोवाचार्द्रानुलेपना। इह भक्तिं कुरुष्वेति हस्तसंश्लेषलिप्सया ॥४.३२ गीला अनुलेपवाली किसी ने (उसके) हाथ का स्पर्श पाने की इच्छा से मानो आज्ञा देते हुए कहा—“यहाँ भक्ति करो” ॥32॥$^{28}$ मुहुर्मुहुर्मदव्याजस्रस्तनीलांशुकापरा। आलक्ष्येरशना रेजे स्फुरद्विद्युदिव क्षपा ॥४.३३ मद के बहाने बार-बार नीला अञ्चल गिरानेवाली दूसरी स्त्री, जिसकी करधनी कुछ-कुछ दिखाई पड़ती थी, चमकती बिजलीवाली रात के समान शोभित हुई ॥33॥ काश्चित्कनककाञ्चीभिर्मुखराभिरितस्ततः। बभ्रमुर्दर्शयन्त्योऽस्य श्रोणीस्तन्वंशुकावृताः ॥४.३४ मुखर सुवर्ण कटि-भूषणों से, महीन कपड़ों से ढँके अपने नितम्बों को दिखाती हुई कोई इधर-उधर घूमीं ॥34॥ चूतशाखां कुसुमितां प्रगृह्यान्या ललम्बिरे। सुवर्णकलशप्रख्यान्दर्शयन्त्यः पयोधरान् ॥४.३५ दूसरी (स्त्रियाँ) आम की कुसुमित डाल पकड़कर, सुवर्ण-कलश सदृश अपने स्तनों को दिखाती हुई, लटकीं ॥35॥ काचित्पद्मवनादेत्य सपद्मा पद्मलोचना। पद्मवक्त्रस्य पार्श्वेऽस्य पद्मश्रीरिव तस्थुषी ॥४.३६ कोई कमलाक्षी कमल-वन से कमल के साथ आकर कमल-मुख के पास कमल की श्री के समान खड़ी हुई ॥36॥ मधुरं गीतमन्वर्थं काचित्साभिनयं जगौ। तं स्वस्थं चोदयन्तीव वञ्चितोऽसीत्यवेक्षितैः ॥४.३७ किसी ने स्पष्ट अर्थ से युक्त मधुर गीत अभिनयपूर्वक गाया, और उस स्वस्थ को दृष्टि-पातों से उत्तेजित करते हुए माना कहा—“तुम वंचित हो रहे हो” ॥37॥ शुभेन वदनेनान्या भ्रूकार्मुकविकर्षिणा। प्रावृत्यानुचकारास्य चेष्टितं धीरलीलया ॥४.३८ दूसरी ने लौटकर भौंहरूप तीर खींचनेवाले सुन्दर मुख से इसकी चेष्टा का स्थिर लीला से अनुकरण किया ॥38॥
$^{27}$- विनिशश्वास = साँसें छोड़ी, वचन से नही कहकर साँसों से कहा अर्थात् इतना धीरे-धीरे कहा कि केवल साँसें ही सुन पड़ती थीं। $^{28}$- भक्ति = शोभा के लिए शरीर पर की जानेवाली रेखा-रचना; श्रद्धा, प्रेम।
बुद्धचरित 21