भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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इन गुणों से उत्तरकुरुओं को भी शोभित कर सकती हो, कुबेर के उद्यान को भी, इस वसुधा को तो पहले ही ॥10 ॥$^{25}$ शक्ताश्चालयितुं यूयं वीतरागानृषीनपि । अप्सरोभिश्च कलितान् ग्रहीतुं विबुधानपि ॥४.११ तुम लोग वीतराग ऋषियों को भी चलायमान कर सकती हो और अप्सराओं के वशीभूत देवों को भी आकृष्ट कर सकती हो ॥11 ॥ भावज्ञानेन हावेन रूपचातुर्यसम्पदा । स्त्रीणामेव च शक्ताः स्थ संरागे किं पुनर्नृणाम् ॥४.१२ भाव-ज्ञान से, हाव-भाव से, तथा रूप व चतुरता की सम्पत्ति से स्त्रियों को भी अनुरक्त कर सकती हो, फिर पुरुषों का क्या कहना ॥12 ॥ तासामेवंविधानां वो नियुक्तानां स्वगोचरे । इयमेवंविधा चेष्टा न तुष्टोऽस्म्यार्जवेन वः ॥४.१३ ऐसी तुम लोगों में से उनका, जो अपने अपने विषय (= अधिकार-क्षेत्र) में जुट नहीं रही हैं, यह ऐसा आचरण! तुम लोगों की सरलता से मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ ॥13 ॥ इदं नववधूनां वो हीनिकुञ्चितचक्षुषाम् । सदृशं चेष्टितं हि स्यादपि वा गोपयोषिताम् ॥४.१४ तुम लोगों का यह आचरण लाज से आँख मींचनेवाली नव-वधुओं या गोप-स्त्रियों के योग्य है ॥14 ॥ यद्यपि स्यादयं धीरः श्रीप्रभावान्महानिति । स्त्रीणामपि महत्तेज इतः कार्योऽत्र निश्चयः ॥४.१५ यद्यपि यह धीर तथा बड़ा ही श्रीमान् और तेजस्वी हो सकता है, स्त्रियों का भी तेज महान् है। इसलिए इस (विषय) में निश्चय करो ॥15 ॥ पुरा हि काशिसुन्दर्या वेशवध्वा महानृषिः । ताडितोऽभूत्पदा व्यासो दुर्धर्षो देवतैरपि ॥४.१६ प्राचीन काल में काशि-सुन्दरी (नामक) वेश्या ने महर्षि व्यास को, जो देवताओं के लिए भी दुर्धर्ष था, पाँव से मारा ॥16 ॥ मन्थालगौतमो भिक्षुर्जङ्गया वारमुख्यया । पिप्रीषुश्च तदर्थार्थं व्यसून्रिरहरत्पुरा ॥४.१७ पूर्वकाल में जङ्घा नामक वेश्या से सम्भोग करने की इच्छा से और उसे प्रसन्न करने की इच्छा से, मन्थाल गौतम ने उसके धन के लिए लाशों को ढोया ॥17 ॥$^{26}$


गौतमं दीर्घतपसं महर्षिं दीर्घजीविनम् । योषित्सन्तोषयामास वर्णस्थानावरा सती ॥४.१८ दीर्घतपस गौतम (नामक) महर्षि को, जो दीर्घकाल तक जीवन धारण कर चुका था, नीच वर्ण व स्थिति की स्त्री ने सन्तुष्ट किया ॥18 ॥ ऋष्यशृङ्गं मुनिसुतं तथैव स्त्रीष्वपण्डितम् । उपायैर्विविधैः शान्ता जग्राह च जहार च ॥४.१९ उसी प्रकार मुनि-तनय ऋष्यशृङ्ग को, जो स्त्रियों (के विषय) में अज्ञानी था, शान्ता विविध उपायों से पकड़कर ले गई ॥19 ॥ विश्वामित्रो महर्षिश्च विगाढोऽपि महत्तपः । दश वर्षाण्यहर्मेने घृताच्याप्सरसा हतः ॥४.२० महा-तपस्या में अवगाहन करनेपर भी महर्षि विश्वामित्र घृताची अप्सरा के द्वारा हरण किया गया और उस महर्षि ने उसके साथ (बिताये गये) दश वर्षों को एक दिन माना ॥20 ॥ एवमादीनृषींस्तांस्ताननयन्विक्रियां स्त्रियः । ललितं पूर्ववयसं किं पुनर्नृपतेः सुतम् ॥४.२१ इस प्रकार के उन अनेक ऋषियों को स्त्रियों ने विकृत किया। फिर राजा के सुन्दर और तरुण पुत्र का क्या कहना ॥21 ॥ तदेवं सति विश्रब्धं प्रयतध्वं तथा यथा । इयं नृपस्य वंशश्रीरितो न स्यात्पराङ्मुखी ॥४.२२ ऐसा होनेपर विश्वासपूर्वक वैसा प्रयत्न करो जिससे राजा की यह वंश-लक्ष्मी यहाँ से विमुख न हो जाय ॥22 ॥ या हि काश्चिद्युवतयो हरन्ति सदृशं जनम् । निकृष्टोत्कृष्टयोर्भावं या गृह्णन्ति ता तु स्त्रियः ॥४.२३ जो कोई भी युवतियाँ (अपने) सदृश जन का (चित्त) हरण कर सकती है; किन्तु निकृष्ट और उत्कृष्ट के (मनो-) भाव को जो आकृष्ट करती हैं वे ही (वास्तविक) स्त्रियाँ हैं" ॥23 ॥ इत्युदायिवचः श्रुत्वा ता विद्धा इव योषितः । समारुरुहुरात्मानं कुमारग्रहणं प्रति ॥४.२४ उदायी के ये वचन सुनकर (बाण-) विद्ध-सी वे स्त्रियाँ कुमार को आकृष्ट करने के लिए अपने ऊपर आरूढ़ हुईं (तुल गईं) ॥24 ॥


$^{25}$ - उत्तरकुरु एक वर्गाकार द्वीप है, जो मेरु के उत्तर भाग में स्थित है-अ० को० 3.55 $^{26}$ - भज् + सन् + ड = भिक्षुः। सम्भवतः उस वेश्या के यहाँ जानेवाले धनवान् पुरुषों की धन के लोभ से हत्या की जाती होगी और मन्थाल गौतम शवों को ढोता होगा। यह श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ता है।

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