भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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इस प्रकार, हे सौम्य, तुम्हें राजा से निवेदन करना चाहिए और वैसा ही प्रयत्न करो जिससे वह मुझे स्मरण भी न करें ॥23 ॥ अपि नैर्गुण्यमस्माकं वाच्यं नरपतौ त्वया । नैर्गुण्यात्त्यज्यते स्नेहः स्नेहत्यागान्न शोच्यते ॥६.२४ तुम्हें नरपति से हमारी निर्गुणता (=दोष) भी कहना चाहिए। निर्गुणता के कारण स्नेह छोड़ते हैं, स्नेह छोड़ने से शोक नहीं होता है।" ॥24 ॥ इति वाक्यमिदं श्रुत्वा छन्दः सन्तापविक्लवः । बाष्पग्रथितया वाचा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ॥६.२५ यह वाक्य सुनकर सन्ताप से विकल छन्दक ने हाथ जोड़कर बाष्प-ग्रथित वाणी में रोकर उत्तर दियाः- ॥25 ॥ अनेन तव भावेन बान्धवायासदायिना । भर्तः सीदति मे चेतो नदीपङ्क इव द्विपः ॥६.२६ “बान्धवों को कष्ट देनेवाले आपके इस मनोभाव से, हे स्वामिन, मेरा चित्त नदी-पङ्क में (फँसे) हाथी के समान दुख रहा है ॥26 ॥ कस्य नोत्पादयेद्वाष्पं निश्चयस्तेऽयमीदृशः । अयोमयेऽपि हृदये किं पुनः स्नेहविक्लवे ॥६.२७ आपका यह ऐसा निश्चय किसके लोहे से भी बने हृदय को द्रवीभूत नहीं करेगा, फिर स्नेह-विकल (हृदय) का क्या कहना? ॥27 ॥ विमानशयनाहं हि सौकुमार्यमिदं क्व च । खरदर्भाङ्कुरवती तपोवनमही क्व च ॥६.२८ कहाँ प्रासाद की शय्या के योग्य यह सुकुमारता और कहाँ तीक्ष्ण तृण-अङ्कुरों से युक्त तपोवन की भूमि! ॥28 ॥ श्रुत्वा तु व्यवसायं ते यदश्वोऽयं मयाहृतः । बलात्कारेण तन्नाथ दैवेनैवास्मि कारितः ॥६.२९ आपका निश्चय सुनकर मैं घोड़ा जो ले आया, हे नाथ, वह तो दैव ने मुझसे बलात् कराया ॥29 ॥ कथं ह्यात्मवशो जानन् व्यवसायमिमं तव । उपानयेयं तुरगं शोकं कपिलवास्तुनः ॥६.३० यदि मैं अपने वश में होता तो आपका यह निश्चय जानकर मैं कपिलवस्तु का शोक-(यह) घोड़ा- (आपके समीप) कैसे लाता? ॥30 ॥ तन्नार्हसि महाबाहो विहातुं पुत्रलालसम् । स्निग्धं वृद्धं च राजानं सद्धर्ममिव नास्तिकः ॥६.३१ इसलिए, हे महाबाहो, पुत्र के लिए उत्सुक स्नेही और वृद्ध राजा को, जैसे सद्धर्म को नास्तिक (छोड़ता है), आपको न छोड़ना चाहिए ॥31 ॥ संवर्धनपरिश्रान्तां द्वितीयां तां च मातरम् । देवीं नार्हसि विस्मर्तुं कृतघ्न इव सत्क्रियाम् ॥६.३२ और, पालन-पोषण करने में थकी उस दूसरी माता रानी को, जैसे सत्क्रिया को कृतघ्न (भूलता है), आपको न भूलना चाहिए ॥32 ॥ बालपुत्रां गुणवतीं कुलश्लाघ्यां पतिव्रताम् । देवीमर्हसि न त्यक्तुं क्लीबः प्राप्तामिव श्रियम् ॥६.३३ बाल-पुत्रवाली, गुणवती, तथा श्लाघ्य कुलवाली पतिव्रता देवी (=पत्नी) को, जैसे क्लीब आई हुई लक्ष्मी को (छोड़ता है), आपको न छोड़ना चाहिए ॥33 ॥ पुत्रं यशोधरं श्लाघ्यं यशोधर्मभृतां वरम् । बालमर्हसि न त्यक्तुं व्यसनीवोत्तमं यशः ॥६.३४ यशोधरा के बालपुत्र को, जो प्रशंसा के योग्य है और जो यश एवं धर्म धारण करनेवालों में श्रेष्ठ है, जैसे उत्तम यश को व्यसनी (छोड़ता है), आपको न छोड़ना चाहिए ॥34 ॥ अथ बन्धुं च राज्यं च त्यक्तुमेव कृता मतिः । मां नार्हसि विभो त्यक्तुं त्वत्पादौ हि गतिर्मम ॥६.३५ अथवा यदि बन्धु एवं राज्य को छोड़ने का ही विचार है, तो हे विभो, आपको मुझे न छोड़ना चाहिए; क्योंकि मेरी गति तो आपके ही चरणों में है ॥35 ॥ नास्मि यातुं पुरं शक्तो दह्यमानेन चेतसा । त्वामरण्ये परित्यज्य सुमन्त्र इव राघवम् ॥६.३६ आपको जङ्गल में, जैसे सुमन्त्र ने राघव को (छोड़ा था), छोड़कर जलते चित्त से मैं नगर को नहीं जा सकता हूँ ॥36 ॥ किं हि वक्ष्यति मां राजा त्वदृते नगरं गतम् । वक्ष्याम्युचितदर्शित्वात्किं त्वन्तःपुराणि वा ॥६.३७ आपके बिना नगर में जानेपर राजा मुझसे क्या कहेंगे? या उचित (=शुभ) के दर्शन का अभ्यास होने के कारण अन्तःपुर में मैं क्या कहूँगा? ॥37 ॥ यदप्यात्थापि नैर्गुण्यं वाच्यं नरपताविति । किं तद्वक्ष्याम्यभूतं ते निर्दोषस्य मुनेरिव ॥६.३८ यह जो कहा है कि "राजा से मेरी निर्गुणता कहना; तो क्या मुनि के समान आप निर्दोष के बारे में असत्य कहूँगा? ॥38 ॥


34 अश्वघोष