भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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हृदयेन सलज्जेन जिह्वया सज्जमानया । अहं यद्यपि वा ब्रूयां कस्तच्छ्रद्घातुमर्हति ॥६.३९ लज्जा-युक्त हृदय से और (किसी किसी तरह) सजित (= उद्यत) होती जीभ से यदि मैं कहूँ भी, तो कौन विश्वास करेगा? ॥39॥ यो हि चन्द्रमसस्तैक्ष्ण्यं कथयेच्छ्रद्दधीत वा । स दोषांस्तव दोषज्ञ कथयेच्छ्रद्दधीत वा ॥६.४० जो चन्द्रमा की तीक्ष्णता कहेगा या उसपर विश्वास करेगा, हे दोषज्ञ, वही आपके दोष कहे या उसपर विश्वास करे ॥40॥ सानुक्रोशस्य सततं नित्यं करुणवेदिनः । स्निग्धत्यागो न सदृशो निवर्तस्व प्रसीद मे ॥६.४१ जो सदा दयावान् है, नित्य करुणा अनुभव करता है, उसके लिए स्नेही का त्याग योग्य नही। लौटिये, मुझपर प्रसन्न होइये" ॥41॥ इति शोकाभिभूतस्य श्रुत्वा छन्दस्य भाषितम् । स्वस्थः परमया धृत्या जगाद वदतां वरः ॥६.४२ शोक से अभिभूत छन्द (= छन्दक) का वचन सुनकर, वक्ताश्रेष्ठ ने स्वस्थ (=शान्त) होकर अत्यन्त धैर्यपूर्वक कहाः- ॥42॥ मद्वियोगं प्रति च्छन्द सन्तापस्त्यज्यतामयम् । नानाभावो हि नियतं पृथग्जातिषु देहिषु ॥६.४३ “मेरे वियोग के प्रति, हे छन्दक, यह सन्ताप छोड़ो; देह-धारियों का पृथक् होना नियत है, क्योंकि (मृत्यु के बाद) उनका पृथक् जन्म होता है ॥43॥ स्वजनं यद्यपि स्नेहान्न त्यजेयमहं स्वयम् । मृत्युरन्योन्यमवशानस्मान् सन्त्याजयिष्यति ॥६.४४ यदि स्नेह के कारण स्वजन को मैं स्वयं न भी छोड़ूँ, तो मृत्यु हम विवशों से एक दूसरे को त्याग करावेगी ॥44॥ महत्या तृष्णया दुःखैर्गर्भेणास्मि यया धृतः । तस्या निष्फलयत्नायाः क्वाहं मातुः क्व सा मम ॥६.४५ बड़ी तृष्णा से कष्ट-पूर्वक जिसके द्वारा मैं गर्भ में धारण किया गया, उस निष्फल-यत्ना माता का मैं कहाँ, मेरी वह कहाँ? ॥45॥ वासवृक्षे समागम्य विगच्छन्ति यथाण्डजाः । नियतं विप्रयोगान्तस्तथा भूतसमागमः ॥६.४६ जिस प्रकार वास-वृक्षपर समागम होने के बाद पक्षी पृथक्-पृथक् दिशा में चले जाते हैं, अवश्य ही उसी प्रकार प्राणियों के समागम का अन्त वियोग है ॥46॥ समेत्य च यथा भूयो व्यपयान्ति बलाहकाः । संयोगो विप्रयोगश्च तथा मे प्राणिनां मतः ॥६.४७ और, जिस प्रकार बादल एकत्र होकर, फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणियों का संयोग और वियोग है, (ऐसा) मैं समझता हूँ ॥47॥ यस्माद्याति च लोकोऽयं विप्रलभ्य परस्परम् । ममत्वं न क्षमं तस्मात्स्वप्नभूते समागमे ॥६.४८ और, क्योकि लोग एक-दूसरे को ठगकर चले जाते हैं, इसलिए स्वप्न-सदृश समागम में ममता उचित नही ॥48॥ सहजेन वियुज्यन्ते पर्णरागेन पादपाः । अन्येनान्यस्य विश्लेषः किं पुनर्न भविष्यति ॥६.४९ साथ पैदा होनेवाली पत्तों की लाली से पोधों का वियोग होता है, फिर क्या दूसरे से दूसरे का वियोग न होगा? ॥49॥ तदेवं सति सन्तापं मा कार्षीः सौम्य गम्यताम् । लम्बते यदि तु स्नेहो गत्वापि पुनराव्रज ॥६.५० तब ऐसा होनेपर, हे सौम्य, सन्ताप मत करो, जाओ। यदि स्नेह बना ही रहे तो जाकर भी फिर आओ ॥50॥ ब्रूयाश्चास्मत्कृतापेक्षं जनं कपिलवस्तुनि । त्यज्यतां तद्गतः स्नेहः श्रूयतां चास्य निश्चयः ॥६.५१ कपिलवस्तु में मेरी आशा (=प्रतीक्षा) करनेवाले लोगों से कहना—उसके प्रति स्नेह छोड़िये और उसका निश्चय सुनिये ॥51॥ क्षिप्रेमष्यति वा कृत्वा जन्ममृत्युक्षयं किल । अकृतार्थो निरारम्भो निधनं यास्यतीति वा ॥६.५२ जन्म और मृत्यु का क्षय करके या तो वह शीघ्र ही आवेगा, या प्रयत्नहीन और असफल होकर मृत्यु को प्राप्त होगा” ॥52॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा कन्थकस्तुरगोत्तमः । जिह्वया लिलिहे पादौ बाष्पमुष्णं मुमोच च ॥६.५३ उसका वचन सुनकर, तुरग-श्रेष्ठ कन्थक ने जीभ से उसके पाँव चाटे और गर्म आँसू बहाये ॥53॥ जालिना स्वस्तिकाङ्केन चक्रमध्येन पाणिना । आममर्श कुमारस्तं बभाषे च वयस्यवत् ॥६.५४ बुद्धचरित 35