भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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(रेखा-) जाल-युक्त और स्वस्तिक-चिह्न-युक्त हाथ से, जिसके बीच चक्र (का चिह्न) था, कुमार ने उसे स्पर्श किया और समवयस्क के समान कहाः- ॥54॥ मुञ्च कन्थक मा बाष्पं दर्शितैयं सदश्वता । मृष्यतां सफलः शीघ्रं श्रमस्तेऽयं भविष्यति ॥६.५५ “हे कन्थक आँसू मत बहाओ, तुमने यह सदश्वता (= अच्छे घोड़े का गुण) दिखाई। धैर्य रखो, शीघ्र ही तुम्हारा यह श्रम सफल होगा” ॥55॥ मणित्सरुं छन्दकहस्तसंस्थं ततः स धीरो निशितं गृहीत्वा । कोशादसिं काञ्चनभक्तिचित्रं बिलादिवाशीविषमुद्बबर्ह ॥६.५६ तब उस धीर (कुमार) ने मणियों की बेंटवाली, सोने से मढ़ी तेज तलवार, जो छन्दक के हाथों में थी, (अपने हाथ में) ले ली और उसे म्यान से ऐसे निकाला जैसे बिल से साँप को (निकाल रहा हो) ॥56॥ निष्कास्य तं चोत्पलपत्रनीलं चिच्छेद चित्रं मुकुटं सकेशम् । विकीर्यमाणांशुकमन्तरीक्षे चिक्षेप चैनं सरसीव हंसम् ॥६.५७ और, उत्पल के पत्तों के समान नीलवर्ण उस (तलवार) को निकालकर, केश-सहित चित्र-विचित्र मुकुट को काटा; और फैलती किरणों के साथ उसे आकाश में फेंका, जैसे हंस को सरोवर में (फेंक रहा हो) ॥57॥ पूजामिलाषेण च बाहुमान्याद्दिवौकसस्तं जगृहुः प्रविद्धम् । यथावदेनं दिवि देवसङ्घा दिव्यैर्विशेषैर्महयां च चक्रुः ॥६.५८ और, देवताओं ने उस फेंके हुए (मुकुट) को सम्मान के कारण पूजा (करने) की अभिलाषा से ले लिया और स्वर्ग में देव-सङ्घों ने दिव्य विशेषताओं के साथ उसकी यथावत् पूजा की ॥58॥ मुक्त्वा त्वलङ्कारकलत्रवत्सां श्रीविप्रवासं शिरसश्च कृत्वा । दृष्ट्वांशुकं काञ्चनहंसचिह्नं वन्यं स धीरोऽभिचकाङ्क्ष वासः ॥६.५९ अलङ्काररूप कलत्र का स्वामित्व छोड़कर और शिर की शोभा को निर्वासित कर, सुवर्ण-हंसों से चित्रित अपने अंशुक को देखकर, उस धीर ने तपोवन के योग्य वस्त्र की आकाङ्क्षा की ॥59॥ ततो मृगव्याधवपुर्दिवौका भावं विदित्वास्य विशुद्धभावः । काषायवस्त्रोऽभिययौ समीपं तं शाक्यराजप्रभवोऽभ्युवाच ॥६.६० तब उसका भाव जानकर, विशुद्धभाव देवता मृगों के व्याध के रूप में काषाय वस्त्र पहने हुए उसके समीप गया; शाक्यराज के पुत्र ने उसे कहाः- ॥60॥ शिवं च काषायमृषिध्वजस्ते न युज्यते हिंस्रमिदं धनुश्च । तत्सौम्य यद्यस्ति न सक्तिरत्र मह्यं प्रयच्छेदमिदं गृहाण ॥६.६१ “इस हिंसक धनुष के साथ तुम्हारा यह मङ्गलमय काषाय वस्त्र, जो ऋषियों का चिह्न है, मेल नहीं खाता। इसलिए, हे सौम्य, यदि इसमें आसक्ति नहीं है, तो मुझे यह (अपना) दो, और यह (मेरा) लो।” ॥61॥ व्याधोऽब्रवीत्कामद काममारादनेन विश्वास्य मृगान्हिनस्मि । अर्थस्तु शक्रोपन यद्यनेन हन्त प्रतीच्छानय शुक्रमैतत् ॥६.६२ व्याध ने कहा- “हे कामनाओं की पूर्ति करनेवाले, समीप से इसके द्वारा विश्वास पैदाकर मृगों को मारता हूँ। किन्तु, हे इन्द्र-तुल्य, यदि इससे प्रयोजन हो, तो लो और यह श्वेत (वस्त्र) लाओ” ॥62॥ परेण हर्षेण ततः स वन्यं जग्राह वासोंऽशुकमुत्ससर्ज । व्याधस्तु दिव्यं वपुरेव बिभ्रत्तच्छुक्लमादाय दिवं जगाम ॥६.६३ तब परम हर्ष से उसने वन-योग्य वस्त्र ग्रहण किया और अंशुक को छोड़ दिया। व्याध दिव्य शरीर धारण कर, श्वेत (वस्त्र) ले, स्वर्ग को चला गया ॥63॥ ततः कुमारश्च स चाश्वगोपस्तस्मिंस्तथा याति विसिस्मिताये । आरण्यके वाससि चैव भूयस्तस्मिन्नकार्षां बहुमानमाशु ॥६.६४ तब उसके उस प्रकार जानेपर, कुमार और वह अश्व-रक्षक विस्मित हुए और उन्होंने वन-योग्य वस्त्र के प्रति (मन में) बड़ा सम्मान किया ॥64॥ छन्दं ततः साश्रुमुखं विसृज्य काषायसंभृद्धतिकीर्तिभृत्सः । येनाश्रमस्तेन ययौ महात्मा सन्ध्याभ्रसंवीत इवोडुराजः ॥६.६५ तब अश्रुमुख छन्द को विदाकर, काषाय-धारी धृतिमान् कीर्तिमान् वह महात्मा, सन्ध्या-कालीन मेघों से आवृत चन्द्रमा के समान, जहाँ आश्रम था वहाँ गया ॥65॥ ततस्तथा भर्तरि राज्यनिःस्पृहे तपोवनं याति विवर्णवाससि । भुजौ समुत्क्षिप्य ततः स वाजिभृद्भृशं विचुक्रोश पपात च क्षितौ ॥६.६६ राज्य (-भोग की) इच्छा से मुक्त हुआ उसका स्वामी जब विवर्ण वस्त्र पहनकर वहाँ से तपोवन की ओर गया, तब भुजाओं को फैलाकर रोते-रोते वह अश्व-रक्षक पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥66॥ विलोक्य भूयश्च रुरोद सस्वरं हयं भुजाभ्यामुपगृह्य कन्थकम् । ततो निराशो विलपन्मुहुर्मुहुर्ययौ शरीरेण पुरं न चेतसा ॥६.६७ फिर (पीछे) देखकर, भुजाओं से कन्थक घोड़े को पकड़कर जोर-जोर से रोया। तब निराश होकर बार- बार रोता हुआ वह, शरीर से, न कि चित्त से, नगर की ओर गया ॥67॥ क्वचित्प्रदध्यौ विललाप च क्वचित् क्वचित्प्रचस्खाल पपात च क्वचित् । अतो व्रजन् भक्तिवशेन दुःखितश्चचार बह्वीरवशः$^{३५}$ पथि क्रियाः ॥६.६८ कहीं ध्यान किया और कहीं विलाप, कहीं फिसला और कहीं गिरा। अतः भक्ति-वश दुःखी होकर जाते हुए, उस बेबस ने मार्ग में बहुत-सी क्रियाएँ कीं ॥68॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये छन्दकनिवर्तनं नाम षष्ठः सर्गः ॥६॥


$^{३५-}$ चतुर्थ पाद में “अवसः” की जगह “अवशः” रक्खा गया है। 36 अश्वघोष