बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“जल में उत्पन्न अग्राम्य (= जङ्गली) अन्न, पत्ते, जल, फल और मूल, जैसा कि शास्त्र कहता है, यही मुनियों की वृत्ति (= आहार) है; तपस्याओं के भिन्न-भिन्न बहुत से प्रकार हैं ॥14॥ उञ्छेन जीवन्ति खगा इवान्ये तृणानि केचिन्मृगवच्चरन्ति । केचिद्भुजङ्गैः सह वर्तयन्ति वल्मीकभूता वनमारुतेन ॥७.१५ दूसरे (तपस्वी) चिड़ियों की तरह चुने हुए (अन्न) पर जीते हैं, (तो) कुछ मृगों के समान तृण चरते हैं। वल्मीक (मिट्टी के ढेर) हुए कुछ (तपस्वी) साँपों के साथ जङ्गली हवा पर रहते हैं ॥15॥ अश्मप्रयत्नार्जितवृत्तयोऽन्ये केचित्स्वदन्तापहतान्नभक्षाः । कृत्वा परार्थं श्रपणं तथान्ये कुर्वन्ति कार्यं यदि शेषमस्ति ॥७.१६ दूसरे पत्थरों से कूटकर जीविका चलाते हैं, कोई अपने दाँतों से छिले अन्न खाते हैं। तथा दूसरे दूसरों के लिए पाक करते हैं और यदि शेष रहता है, तो (अपना) कार्य (= भोजन आदि) करते हैं ॥16॥ केचिज्जलक्लिन्नजटाकलापा द्विः पावकं जुह्वति मन्त्रपूर्वम् । मीनैः समं केचिदपो विगाह्य वसन्ति कूर्मोल्लिखितैः शरीरैः ॥७.१७ कोई जल से जटा-कलाप भिंगोकर दो बार मन्त्रपूर्वक अग्नि में हवन करते हैं। कोई जल में प्रवेश कर मछलियों के साथ रहते हैं, कछुओं से उनके शरीर विद्ध होते रहते हैं ॥17॥ एवंविधैः कालचितैस्तपोभिः परैर्दिवं यान्त्यपरैर्नृलोकम् । दुःखेन मार्गेण सुखं ह्युपैति सुखं हि धर्मस्य वदन्ति मूलम् ॥७.१८ (उचित) काल में अर्जित ऐसी उत्तम तपस्याओं से वे स्वर्ग जाते हैं और निकृष्ट तपस्याओं से मर्त्यलोक। दुःख के मार्ग में सुख प्राप्त होता है; (लोग) सुख को ही धर्म का मूल (= उद्देश्य) कहते हैं” ॥18॥ इत्येवमादि द्विपदेन्द्रवत्सः श्रुत्वा वचस्तस्य तपोधनस्य । अदृष्टतत्त्वोऽपि न सन्तुतोष शनैरिदं चात्मगतं बभाषे ॥७.१९ उस तपस्वी का ऐसा वचन सुनकर, राज-कुमार को, यद्यपि उसने तत्त्व को नही देखा था, सन्तोष नही हुआ और उसने धीरे-धीरे अपने को यों कहा:- ॥19॥ दुःखात्मकं नैकविधं तपश्च स्वर्गप्रधानं तपसः फलं च । लोकाश्च सर्वे परिणामवन्तः स्वल्पे श्रमः खल्वयमाश्रमाणाम् ॥७.२० “अनेक प्रकार की तपस्याएँ दुःखात्मक हैं, और तपस्या का प्रधान फल स्वर्ग है, और सब लोक विकारवान् (परिवर्तनशील) है; (तब) आश्रमों (= आश्रमवासियों) का यह श्रम निश्चय ही स्वल्प (उद्देश्य) के लिए है ॥20॥ श्रियांश्च बन्धून्विषयांश्च हित्वा ये स्वर्गहेतोर्नियमं चरन्ति । ते विप्रयुक्ताः खलु गन्तुकामा महत्तरं बन्धनमेव भूयः ॥७.२१ जो प्रिय बन्धुओं और विषयों को छोड़कर स्वर्ग प्राप्त करने के लिए नियम का पालन करते हैं; वे उससे बिछुड़कर फिर भी बड़े बन्धन में जाना चाहते हैं ॥21॥ कायक्लमैर्येश्च तपोऽभिधानैः प्रवृत्तिकामाङ्क्षति कामहेतोः । संसारदोषानपरीक्षमाणो दुःखेन सोऽन्विच्छति दुःखमेव ॥७.२२ जो तप नामक शरीरिक क्लेशों से कामोपभोग के हेतु प्रवृत्ति (जीवन) की आकाङ्क्षा करता है, वह भव-चक्र के दोषों को नही देखता हुआ (तपरूप) दुःख से (जीवनरूप) दुःख की ही इच्छा करता है ॥22॥ त्रासश्च नित्यं मरणात्प्रजानां यत्नेन चेच्छन्ति पुनःप्रसूतिम् । सत्यां प्रवृत्तौ नियतश्च मृत्युस्तत्रैव मग्नो यत एव भीताः ॥७.२३ मृत्यु से जीव बराबर डरते हैं और यत्नपूर्वक पुनर्जन्म चाहते हैं। प्रवृत्ति होनेपर मृत्यु निश्चित है। अतः वे जिससे डरते हैं उसी मे डूबते हैं ॥23॥ इहार्थमेके प्रविशन्ति खेदं स्वर्गार्थमन्ये श्रमाप्नुवन्ति । सुखार्थमाशाकृपणोऽकृतार्थः पतत्यनर्थे खलु जीवलोकः ॥७.२४ कोई इस लोक के लिए कष्ट करते हैं, दूसरे स्वर्ग के लिए श्रम करते हैं। निश्चय ही सुख की आशा से दीन प्राणि-जगत् अकृतार्थ होकर विपत्ति में पड़ता है ॥24॥ न खल्वयं गर्हित एव यत्नो यो हीनमुत्सृज्य विशेषगामी । प्राज्ञैः समानेन परिश्रमेण कार्यं तु तद्यत्र पुनर्न कार्यम् ॥७.२५ अवश्य ही यह यत्न निन्दित नही जो हीन को छोड़कर विशेष (= उत्तम) की ओर जाता है। बुद्धिमानों को समान परिश्रम से वह करना चाहिए जिसमें फिर उन्हें (कुछ) न करना पड़े ॥25॥ शरीरपीडा तु यदीह धर्मः सुखं शरीरस्य भवत्यधर्मः । धर्मेण चाप्नोति सुखं परत्र तस्मादधर्मं फलतीह धर्मः ॥७.२६ यदि इस लोक में शरीर-पीड़ा (क्लेश, तप) धर्म है, तो शरीर का सुख अधर्म। धर्म से पर-लोक में (जीव) सुख प्राप्त करता है, इसलिए धर्म, इस लोक में, अधर्म को फल धारण करता है ॥26॥ यतः शरीरं मनसो वशेन प्रवर्तते चापि निवर्तते च । युक्तो दमश्चेतस एव तस्माच्चित्तादृते काष्ठसमं शरीरम् ॥७.२७ क्योंकि मन की प्रभुता से शरीर (कर्म में) प्रवृत्त और (कर्म से) निवृत्त होता है; इसलिए चित्त का ही दमन उचित है, चित्त के बिना शरीर काठ के समान है ॥27॥ आहारशुद्ध्या यदि पुण्यमिष्टं तस्मान्मृगाणामपि पुण्यमस्ति । ये चापि बाह्याः पुरुषाः फलेभ्यो भाग्यापराधेन पराङ्मुखार्थाः ॥७.२८ आहार की शुद्धि से यदि अभिलषित पुण्य हो, तब मृगों को भी पुण्य होता है और उन लोगों को भी, जो (धर्म के) फल (= सुख) से रहित हैं और भाग्य-दोष से धन जिनसे विमुख है (क्योंकि ऐसे दुःखी तथा निर्धन मनुष्य तपस्वी ही आहार करते हैं) ॥28॥ दुःखेऽभिसन्धित्वथ पुण्यहेतुः सुखेऽपि कार्यो ननु सोऽभिसन्धिः । अथ प्रमाणं न सुखेऽभिसन्धिर्दुःखे प्रमाणं ननु नाभिसन्धिः ॥७.२९ 38 अश्वघोष