भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

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दुःख (तपस्या) में यदि सङ्कल्प पुण्य का कारण है तो सुख में भी वह सङ्कल्प करना चाहिए (जो कि-पुण्य का कारण है)। यदि सुख में सङ्कल्प प्रमाण नहीं है, तो दुःख में भी सङ्कल्प प्रमाण नहीं है ॥२9 ॥$^{३८}$

तथैव ये कर्मविशुद्धिहेतोः स्पृशन्त्यपस्तीर्थमिति प्रवृत्ताः । तत्रापि तोषो हृदि केवलोऽयं न पावयिष्यन्ति हि पापमापः ॥७.३०

उसी प्रकार कर्म की शुद्धि के लिए जो लोग जल को तीर्थ समझकर स्पर्श करते हैं, उनके हृदय में यह केवल सन्तोष ही है; क्योंकि पानी पाप को पवित्र नहीं कर सकता ॥३० ॥

स्पृष्टं हि यद्गुणवद्भिरम्भस्तत्तत्पृथिव्यां यदि तीर्थमिष्टम् । तस्माद्गुणानेव परैमि तीर्थमापस्तु निःसंशयमाप एव ॥७.३१

गुणवान् जिस-जिस जल का स्पर्श करते हैं यदि पृथिवी पर वही इष्ट तीर्थ है, तब गुणों को ही मैं तीर्थ समझता हूँ, पानी तो निस्सन्देह पानी ही है" ॥३१ ॥

इति स्म तत्तद्बहुयुक्तियुक्तं जगाद चास्तं च ययौ विवस्वान् । ततो हविर्धूमविवर्णवृक्षं तपःप्रशान्तं स वनं विवेश ॥७.३२

इस तरह उसने युक्ति-युक्त बहुत कुछ कहा और तब सूर्य अस्त हुआ। उसके बाद उसने वन में प्रवेश किया, जिसके वृक्ष होम के धुएँ से विवर्ण थे और तपस्या की शान्ति थी ॥३२ ॥

अभ्युद्धृतप्रज्वलिताग्निहोत्रं कृताभिषेकर्षि जनावकीर्णम् । जाप्यस्वनाकूजितदेवकोष्ठं धर्मस्य कर्मान्तमिव प्रवृत्तम् ॥७.३३

यहाँ प्रज्वलित अग्निहोत्र उठाये जा रहे थे, स्नान किये ऋषियों से वह वन भर रहा था, जप के शब्द से देव-मन्दिर कूजित थे, मानो वह वन धर्म का कर्मान्त हो गया था ॥३३ ॥$^{३९}$

काश्चिन्निशास्तत्र निशाकराभः परीक्षमाणश्च तपांस्युवास । सर्वं परीक्ष्य तपश्च मत्वा तस्मात्तपःक्षेत्रतलाज्जगाम ॥७.३४

वह चन्द्रोपम तपों की परीक्षा करता हुआ कई रातों तक वहाँ रहा। चारों ओर से सब तप को समझकर, वह उस तपोभूमि से चला गया ॥३४ ॥

अन्वव्रजन्नाश्रमिनस्तस्तं तद्रूपमाहात्म्यगतैर्मनोभिः । देशादनायैरभिभूयमानान्महर्षयो धर्ममिवापयानन्तम् ॥७.३५

उसके रूप तथा माहात्म्य से आकृष्टचित्त आश्रम-वासी उसके पीछे-पीछे गये, जैसे अनार्यों से जीते जाते देश से हटते धर्म के पीछे-पीछे महर्षिगण जा रहे हों ॥३५ ॥

ततो जटावल्कलचीरखेलांस्तपोधनांश्चैव स तान्ददर्श । तपांसि चैषामनुरुध्यमानस्तस्थौ शिवे श्रीमत्ति वृक्षमूले ॥७.३६

तब उसने जटा-वल्कल-चीर-वस्त्र-धारी उन तपस्वियों को आते देखा और उनके तपों का सम्मान करता हुआ वह मङ्गलमय सुन्दर वृक्ष के नीचे ठहर गया ॥३६ ॥

अथोपसृत्याश्रमवासिनस्तं मनुष्यवर्यं परिवार्य तस्थुः । वृद्धश्च तेषां बहुमानपूर्वं कलेन साम्ना गिरमित्युवाच ॥७.३७

तब समीप जाकर, आश्रम-वासी उस नर-श्रेष्ठ को घेरकर खड़े हो गये और उनमें से वृद्ध ने अति सम्मानपूर्वक मधुरता एवं सान्त्वना से यह वचन कहाः- ॥३७ ॥

त्वय्यागते पूर्ण इवाश्रमोऽभूत्सम्पद्यते शून्य इव प्रयाते । तस्मादिमं नार्हसि तात हातुं जिजीविषोर्देहमिवेष्टमायुः ॥७.३८

"आपके आनेपर आश्रम मानो पूर्ण हो गया था, जानेपर मानो शून्य हो रहा है। इसलिए, हे तात, आपको इसे न छोड़ना चाहिए, जैसे जीने की इच्छा करनेवाले की देह को अभिलषित आयु (न छोड़े) ॥३८ ॥

ब्रह्मर्षिराजर्षिसुरर्षिजुष्टः पुण्यः समीपे हिमवान् हि शैलः । तपांसि तान्येव तपोधनानां यत्सन्निकर्षाद्बहुलीभवन्ति ॥७.३९

ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों और देवर्षियों से सेवित पवित्र हिमवान् पर्वत समीप में है, जिसकी निकटता से तपस्वियों की ये तपस्याएँ (प्रभाव में) बढ़ जाती हैं ॥३९ ॥

तीर्थानि पुण्यान्यभितस्तथैव सोपानभूतानि नभस्तलस्य । जुष्टानि धर्मात्मभिरात्मवद्भिर्देवर्षिमिश्रैश्च महर्षिमिश्रै ॥७.४०

उसी प्रकार स्वर्ग के सोपान-स्वरूप ये पवित्र तीर्थ चारों ओर हैं, जो धर्मात्मा तथा आत्मवान् देवर्षियों और महर्षियों से सेवित हैं ॥४० ॥

इतश्च भूयः क्षममुत्तरैव दिक्सेवितुं धर्मविशेषहेतोः । न तु क्षमं दक्षिणतो बुधेन पदं भवेदेकमपि प्रयातुम् ॥७.४१

और, यहाँ से फिर विशेष धर्म के हेतु उत्तर दिशा का ही सेवन करना उचित है, बुद्धिमान् के लिए दक्षिण की ओर एक पग भी जाना उचित नहीं होगा ॥४१ ॥

तपोवनेऽस्मिन्नथ निष्क्रियो वा सङ्कीर्णधर्मापतितोऽशुचिर्वा । दृष्टस्त्वया येन न ते विवत्सा तद्ब्रूहि यावद्रुचितोऽस्तु वासः ॥७.४२

यदि आपने इस तपोवन में (किसी को) निष्क्रिय, या सङ्कीर्ण धर्म में गिरा हुआ अपवित्र देखा है, जिससे आपकी यहाँ रहने की इच्छा नहीं, तो वैसा कहिये, और तबतक आप यहाँ रहें ॥४२ ॥


$^{३८}$ - इस श्लोक की व्याख्या यह होगी:- “तपस्या करते हुए जो पुण्य प्राप्त होता है उसका कारण यदि मानसिक संकल्प (intention) है, तो सुखोपभोग करते हुए भी वही संकल्प करना चाहिए जिससे पुण्य प्राप्त हो। यदि सुखोपभोग करते हुए संकल्प करने से पुण्य नहीं मिल सकता है तो तपस्या करते हुए भी संकल्प करने से पुण्य नहीं मिलना चाहिए।” $^{३९}$ - कर्मान्त = खलिहान, कारखाना, स्थली।


बुद्धचरित 39