भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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इमे हि वाञ्छन्ति तपःसहायं तपोनिधानप्रतिमं भवन्तम्। वास्तव्यता हीन्द्रसमेन सार्धं बृहस्पतेरभ्युदयावहः स्यात् ॥७.४३ क्योंकि ये (तपस्वी) आप तप-निधान सदृश को तप का साथी (बनाना) चाहते हैं, क्योंकि इन्द्र-तुल्य आपके साथ निवास करना बृहस्पति के लिए भी उदयप्रद होगा।” ॥43 ॥ इत्येवमुक्ते स तपस्विमध्ये तपस्विमुख्येन मनीषिमुख्यः । भवप्रणाशाय कृतप्रतिज्ञः स्वं भावमन्तर्गतमाचचक्षे ॥७.४४ तपस्वियों के बीच उस प्रकार तपस्वी द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस श्रेष्ठ मनीषी ने, जिसने जन्म- विनाश के लिए प्रतीक्षा की थी, अपना आन्तरिक भाव बतायाः- ॥44 ॥ ऋज्वात्मनां धर्मभृतां मुनीनामियातिथित्वान्स्वजनोपमानाम्। एवंविधैर्मां प्रति भावजातैः प्रीतिः परा मे जनितश्च मानः ॥७.४५ “सरल तथा धर्मपालक मुनि अपनी आतिथ्य प्रियता के कारण स्वजनों के समान है, मेरे प्रति उनके ऐसे भावों से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैं सम्मानित हुआ ॥45 ॥ स्निग्धाभिराभिर्हृदयङ्गमाभिः समासतः स्नात इवास्मि वाग्भिः । रतिश्च मे धर्मनवग्रहस्य विस्पन्दिता सम्प्रति भूय एव ॥७.४६ संक्षेप में, स्नेह-भरे हृदय-स्पर्शी इन वचनों से मैंने मानो स्नान किया; और हाल में ही धर्म को ग्रहण करनेपर भी (धर्म के प्रति) मेरा आनन्द इस समय फिर बढ़ रहा है ॥46 ॥ एवं प्रवृत्तान् भवतः शरण्यानतीव सन्दशितपक्षपातान् । यास्यामि हित्वेति ममापि दुःखं यथैव बन्धूंस्त्यजतस्तथैव ॥७.४७ इस प्रकार (तपस्या में) लगे हुए आप लोगों को, जो आश्रय देनेवाले हैं और जिन्होंने मेरे प्रति अत्यन्त पक्षपात (ममत्व) दिखाया है, छोड़कर जाऊँगा-इससे मुझे भी वैसा ही दुःख है जैसा कि बन्धुओं को छोड़ते समय मुझे (हुआ था) ॥47 ॥ स्वर्गाय युष्माकमयं तु धर्मो ममाभिलाषस्त्वपुनर्भवाय । अस्मिन्वने येन न मे विवत्सा भिन्नः प्रवृत्त्या हि निवृत्तिधर्मः ॥७.४८ आप लोगों का यह धर्म स्वर्ग के लिए है, मेरी अभिलाषा पुनर्जन्म के अभाव के लिए (=पुनर्जन्म न हो, इसके लिए) है, इसी कारण इस वन में मेरी रहने की इच्छा नहीं; क्योंकि निवृत्ति-धर्म प्रवृत्ति से भिन्न है ॥48 ॥ तन्नारतिर्मे न परापचारो वनादितो येन परिव्रजामि । धर्मे स्थिताः पूर्वयुगानुरूपे सर्वे भवन्तो हि महर्षिकल्पाः ॥७.४९ यह न मेरी अरुचि है न दूसरों की आचार-हीनता, जिससे मैं इस वन से जा रहा हूँ; क्योंकि महर्षि-तुल्य आप सब पूर्व युग के अनुरूप धर्म में स्थित हैं।” ॥49 ॥

ततो वचः सूनृतमर्थवच्च सुश्लक्ष्णमोजस्वि च गर्वितं च। श्रुत्वा कुमारस्य तपस्विनस्ते विशेषयुक्तं बहुमानमीयुः ॥७.५० तब कुमार का प्रिय, अर्थ-पूर्ण, स्निग्ध, ओजस्वी तथा गौरव-पूर्ण वचन सुनकर वे तपस्वी अत्यन्त सम्मानित हुए ॥50 ॥ कश्चिद्विज्रस्तत्र तु भस्मशायी प्रांशुः शिखी दारवचीरवासाः। आपिङ्गलाक्षस्तनुदीर्घघोणः कुण्डैकहस्तो गिरमित्युवाच ॥७.५१ वहाँ राख में सोनेवाले, लम्बा शरीरवाले, शिखावाले, वल्कल वस्त्रवाले, पीली आँखोंवाले, पतली व लम्बी नाकवाले, किसी द्विज ने, जिसके हाथ में पात्र था, यह वचन कहाः- ॥51 ॥ धीमन्नुदारः खलु निश्चयस्ते यस्त्वं युवा जन्मनि दृष्टदोषः । स्वर्गापवर्गों हि विचार्य सम्यग्यस्यापवर्गे मतिरस्ति सोऽस्ति ॥७.५२ “हे मेधाविन्, आपका निश्चय उदार (उत्तम) है, आपने युवा होकर जन्म में दोष देखा है; क्योंकि स्वर्ग व अपवर्ग का सम्यक् विचार कर अपवर्ग में जिसकी बुद्धि है, (वास्तव में) वही है ॥52 ॥ यज्ञैस्तपोभिर्नियमैश्च तैस्तैः स्वर्गं यियासन्ति हि रागवन्तः । रागेण सार्धं रिपुणेव युद्धा मोक्षं परीप्सन्ति तु सत्त्ववन्तः ॥७.५३ रागी (पुरुष) उन उन यज्ञों, तपों और नियमों से स्वर्ग जाने की इच्छा करते हैं; किन्तु सत्त्ववान् (पुरुष) राग के साथ, शत्रु के समान, युद्ध कर मोक्ष पाने की इच्छा करते हैं ॥53 ॥ तद्बुद्धिरेषा यदि निश्चिता ते तूर्णं भवान् गच्छतु विन्ध्यकोष्ठम्। असौ मुनिस्तत्र वसत्यराडो यो नैष्ठिके श्रेयसि लब्धचक्षुः ॥७.५४ इसलिए यदि आपकी यह निश्चित बुद्धि है, तो शीघ्र ही आप विन्ध्यकोष्ठ जाइये। वहाँ वह मुनि अराड रहता है जिसने नैष्ठिक कल्याण में दृष्टि पाई है ॥54 ॥ तस्माद्भवाञ्छ्रोष्यति तत्त्वमार्गं सत्यां रुचौ सम्प्रतिपत्स्यते च । यथा तु पश्यामि मतिस्तथैषा तस्यापि यास्यत्यवधूय बुद्धिम् ॥७.५५ उससे आप तत्त्व-मार्ग सुनेंगे और रुचि होनेपर स्वीकार करेंगे; किन्तु जैसा मैं देखता हूँ आपकी यह बुद्धि ऐसी है कि उसकी भी बुद्धि का तिरस्कार कर आप चले जायेंग ॥55 ॥ स्पष्टोच्छ्रघोणं विपुलायताक्षं ताम्राधरौष्ठं सिततीक्ष्णदंष्ट्रम्। इदं हि वक्त्रं तनुरक्तजिह्वं ज्ञेयार्णवं पास्यति कृत्स्नमेव ॥७.५६ स्पष्ट व ऊँची नाकवाला, बड़ी व लम्बी आँखोंवाला, लाल ओठवाला, सफेद व तेज दाँतोंवाला, पतली व लाल जीभवाला (आपका) यह मुख सम्पूर्ण ही ज्ञान-सागर का पान करेगा ॥56 ॥ गम्भीरता या भवतस्त्वगाधा या दीप्तता यानि च लक्षणानि । आचार्यकं प्राप्स्यसि तत्पृथिव्यां यन्नर्षिभिः पूर्वयुगेऽप्यवाप्तम् ॥७.५७

40 अश्वघोष