बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआपकी जो अगाध गम्भीरता है, जो दीप्ति है, और जो लक्षण हैं (इनसे प्रकट है कि) आप पृथिवी पर वह आचार्य-पद प्राप्त करेंगे, जो ऋषियों ने पूर्व युग में भी नही पाया" ॥57 ॥ परममिति ततो नृपात्मजस्तमृषिजनं प्रतिनन्द्य निर्ययौ । विविधवदनुविधाय तेऽपि तं प्रविविशुराश्रममस्तपोवनम् ॥७.५८ तब “अच्छा" कह और उन ऋषियों को प्रणाम कर, राजा का पुत्र चला गया । उन आश्रम-वासियों ने भी उसका विधिवत् सम्मान कर तपोवन में प्रवेश किया ॥58 ॥
इति बुद्धचरिते महाकाव्ये तपोवनप्रवेशो नाम सप्तमः सर्गः ॥७ ॥
अष्टम सर्ग अन्तःपुर-विलाप
ततस्तुरङ्गावचरः स दुर्मनास्तथा वनं भर्तरि निर्ममे गते । चकार यत्नं पथि शोकनिग्रहे तथापि चैवाश्रु न तस्य चिक्षिये ॥८.१ तब निर्मम स्वामी के उस प्रकार वन चले जानेपर उस उदास अश्व-रक्षक ने रास्ते में अपने शोक-निग्रह का यत्न किया; तो भी उसका आँसू क्षीण नही हुआ ॥1 ॥ यमेकरात्रेण तु भर्तुराज्ञया जगाम मार्गं सह तेन वाजिना । इयाय भर्तुर्विरहं विचिन्तयंस्तमेव पन्थानमहोभिरष्टभिः ॥८.२ स्वामी की आज्ञा से उस घोड़े के साथ जिस मार्ग से वह एक दिन में गया था, स्वामि-वियोग की चिन्ता करता हुआ उसी रास्ते से वह आठ दिनों में आया ॥2 ॥ हयश्च सौजा विचचार कन्थकस्तताम भावेन बभूव निर्मदः । अलङ्कृतश्चापि तथैव भूषणैर्बभूवतश्रीरिव तेन वर्जितः ॥८.३ ओजस्वी घोड़ा कन्थक चला, (दुःख के) भाव से थक गया, मद-रहित हो गया । भूषणों से उसी प्रकार अलङ्कृत होनेपर भी अपने स्वामी के बिना वह मानो श्री-हीन था ॥3 ॥ निवृत्य चैवाभिमुखस्तपोवनं भृशं जिहेषे करुणं मुहुर्मुहुः । क्षुधान्वितोऽप्यध्वनि शष्पमम्बु वा यथा पुरा नाभिननन्द नाददे ॥८.४ और, तपोवन की ओर मुड़कर वह दुःख के साथ बार-बार खूब हिनहिनाया । रास्ते में भूख लगनेपर भी वह तृण या जल से पहले की तरह न आनन्दित हुआ न उसे ग्रहण किया ॥4 ॥ ततो विहीनं कपिलाह्वयं पुरं महात्मना तेन जगद्धितात्मना । क्रमेण तौ शून्यमिवोपजग्मतुर्दिवाकरेणेव विनाकॄतं नभः ॥८.५ तब वे दोनों, जगत् के हित में ही जिसकी आत्मा थी, उस महात्मा से रहित कपिल नामक नगर के समीप क्रम से गये, जो (नगर) सूर्य-रहित आकाश के समान सूना-सा था ॥5 ॥
सपुण्डरीकेरपि शोभितं जलैरलङ्कृतं पुष्पधरैर्नगैरपि । तदेव तस्योपवनं वनोपमं गतप्रहर्षैर्न रराज नागरैः ॥८.६ कमल-युक्त जलाशयों से शोभित होनेपर भी, पुष्पयुक्त वृक्षों से अलङ्कृत रहनेपर भी उसका वही उपवन जङ्गल के समान जान पड़ा; आनन्द-रहित नगर-निवासियों से वह दीप्त नही हुआ ॥6 ॥ ततो भ्रमद्भिर्दिशि दीनममानसैरनुज्ज्वलैर्बाष्पहितेक्षणैर्नरैः । निवार्यमाणाविव तावुभौ पुरं शनैरपस्नातमिवाभिजग्मतुः ॥८.७ तब चारों ओर घूमते हुए उदास लोगों से, जिनके चित्त दुःखी थे और आँखें आँसू से आकुल थीं, मानो मना किये जानेपर भी वे दोनों धीरे-धीरे उस नगर में गये जो मृत-स्नात (= किसी के मरनेपर स्नान किये हुए पुरुष) के समान था ॥7 ॥ निशम्य च स्रस्तशरीरगामिनौ विनागतौ शाक्यकुलर्षभेण तौ । मुमोच बाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते ॥८.८ शिथिल शरीर से जानेवाले वे दोनों शाक्य-कुल के बिना ही आये, यह देखकर नगर की जनता ने मार्ग में आँसू बहाये, जैसे प्राचीन काल में राम का रथ (वन से खाली लौट) आनेपर (आँसू बहाये थे) ॥8 ॥ अथ ब्रुवन्तः समुपेतमन्यवो जनाः पथि च्छन्दकमागतश्रवः । क्व राजपुत्रः पुराग्रनन्दनो हतस्त्वयासाविति पृष्टतोऽन्वयुः ॥८.९ तब शोकित लोग, जिन्हें आँसू आ गये थे, रास्ते में छन्दक से कहने लगे—"नगर व राष्ट्र को आनन्दित करनेवाला राज-पुत्र कहाँ है? तुमने उसका हरण किया है।" इस तरह कहते हुए वे उसके पीछे-पीछे चले ॥9 ॥ ततः स तान् भक्तिमतोऽब्रवीज्जनान्नरेन्द्रपुत्रं न परित्यजाम्यहम् । रुदन्नहं तेन तु निर्जने वने गृहस्थवेशश्च विसर्जिताविति ॥८.१० तब उसने उन भक्त लोगों से कहा—"मैंने राजा के पुत्र को नही छोड़ा, किन्तु निर्जन वन में उसने ही मुझे रोते हुए को और अपने गृहस्थ वेश को विसर्जित किया" ॥10 ॥ इदं वचस्तस्य निशम्य ते जनाः सुदुष्करं खल्विति निश्चयं ययुः । पतद्भि जहुः सलिलं न नेत्रजं मनो निनिन्दुश्च फलोत्थमात्मनः ॥८.११ उसका यह वचन सुनकर, उन लोगों ने विचारा—"निश्चय ही (राजकुमार का) यह दुष्कर काम है।" वे अपने आँसू न रोक सके और फलासक्ति (स्वार्थपरता) से उत्पन्न अपनी मानसिक स्थिति की उन्होंने निन्दा की ॥11 ॥ अथोचुरद्यैव विशाम तद्वनं गतः स यत्र द्विपराजविक्रमः । जिजीविषा नास्ति हि तेन नो विना यथेन्द्रियाणां विगमे शरीरिणाम् ॥८.१२
बुद्धचरित 41